दिलरुबा फिर से : भाग एक
उतना मन मेरा पढ़ाई में नहीं लगता था जितना रुबा को देखने मे लगता था। वो थी ही इतनी प्यारी कि उस पर से नजरें हटाने का मन ही नहीं करता था।
मैं तो दूर से ही उसे जी भर के देख लेता क्योंकि उसका सामना करने की मेरी हिम्मत नहीं थी मुझमें।
कभी कभार वो ही मेरे पास आकर बैठ जाती और खूब बातें करती। वास्तव में वो स्वयं अच्छी होने के साथ-साथ बातें भी बहुत अच्छी कर लेती थी। बिल्कुल सीधी सादी न किसी से कुछ बुरा कहना ना भला कहना सुनना।
मेरा मन तो पढ़ाई में तो लगता ही नहीं था। सारा दिन उसके बारे में ही सोचना। घर पर भी मेरा यही हाल था, पापा जी कोई काम कहते लेकिन मैं भूल जाता। आये दिन पापा से भी डांट खा ही लेता था।
फिर एक दिन मैं उसे उसी टकटकी से देख रहा था लेकिन उसकी सहेली और मेरी बहन रमा ने देख लिया और उसे बता दिया ।
वो मेरे पास आई । बोली, 'तुम मुझे चोरी चोरी क्यों ताकते रहते हो?
मैंने कहा, नहीं...नहीं... किसने कहा अपको ?
रमा ने...
मैं रमा की तरफ देख कर थोड़ा सा मुस्करा दिया।
'सॉरी' लेकिन तुम बहुत अच्छी लगती हो मुझे...
क्या अच्छा लगता है तुम्हे मुझ में?
तेरी प्यारी सी आंखे, नाक, कान, मुँह सब कुछ अच्छा लगता है।
चल पागल सा...
(वो शर्मा कर भाग गई)
मैंने जाकर रमा के कान खेंच दिये... मजाक में वो कहने लगी भाई पापा को भी बताना बाकी ही अभी तो...
मैंने रमा के कान छोड़कर अपने कान पकड़ लिये...
चल नहीं बताती ....
घर पर जब भी रमा पापा को कुछ कहती तो मेरे दिमाग मे वही बात घूमने लगती।
एक दिन रमा और मेरा किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया जैसा कि अमूमन भाई बहन में होता रहता है...
वो पापा को मुझे व्यंग्यात्मक लहजे से देखते हुए बोली 'पापा दिल की शिकायत लगानी है आपसे....
क्या बेटा क्या कर दिया अब दिल ने...
मैंने उसे सौ का नोट दिखाते हुए न बताने का इशारा किया...
वो मिंट में बदल गयी,' कुछ नहीं पापा दिल ना मुझे मारता रहता है'।
ये तो आप दोनों का रोज का काम है...चल भाग यहां से, मैंने सोचा पता नहीं क्या कर दिया दिल ने..
रमा सीधी मेरे पास आई ' दे रुपये अब...' मैं वो सौ रुपये लेकर बाहर भाग गया।
लेकिन थोड़ी देर बाद घर आकर मैंने उसे वो सौ रुपये का नोट दे दिया।
कोई बात नहीं भाई, लेकिन अपने माँ-बाप की इज्ज़त का ख्याल रखना आये दिन अखबारों में बच्चों से तंग आकर खुदखुशी करने की खबरें छपती है...इतना कह वो सौ रुपये मुझे वापिस देकर घर के काम में लग गई।
मेरी बहन छोटी थी लेकिन बात वो बहुत बड़ी कह गयी।
पर मैं जब स्कूल आ जाता तो फिर उसकी वो भोली सी सूरत को देखकर रमा की कही सारी बातें भूल जाता।
हमारे स्कूल में 'रोज-डे' के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करने के उद्देश्य से सभी बच्चों ने एक दूसरे को 'रेड-रोज' दिया ।
मैंने रुबा को और रुबा ने मुझे भी 'रेड-रोज' दिया ।
स्कूल पूरा होने के बाद हम दोनों ने एक ही कॉलेज में एडमिशन ले लिया।
वहां तो हम दोनों काफी घुल मिल गए थे । रमा (कवाब में हड्डी) भी हमारे साथ थी ।
लेकिन कॉलेज के आखरी साल में मेरी मंगनी हो गयी ।
रुबा को अभी पता नहीं था... मैंने रुबा से बात करनी कम कर दी।
रमा को मेरा बदला व्यवहार अच्छा नहीं लगा वो उसने रमा से पूछ ही लिया था लेकिन रमा बिना कुछ कहे वहां से चली गई....
फिर उसने मेरे से पूछा...
मैंने कहा रुबा अब छुट्टी हो चुकी है कॉलेज की कल बात करते है...
उसने अपनी कसम दे दी इस कारण मुझे सब बताना पड़ा।
वो मेरे गले लग कर रोने लग गई कहने लगी मैंने तो तेरे अलावा किसी ऒर के बारे में सोचा भी नहीं था...तू आज मुझे छोड़कर जा रहा है...
मेरी बहन रमा ने, 'आज के बाद आप दोनों का यों मिलना सही नहीं है' कहते हुए हमें एक दूसरे से अलग किया।
आज मैं जहां सगाई हुई है ना उन्हें मना कर सकता ना मैं अपने पहले प्यार को भूल सकता।
फिर भी मैं राशि (जिससे सगाई हुई है) से बातें करता हूँ कभी कभी राशि भी मेरा दिल तोड़ देती है यह कह कर कि 'मैं मेरी मर्जी से नहीं बल्कि उसके माँ-बाप के कहने पर कर रही है।(बिल्कुल मेरी तरह)
लेकिन बहुत जल्दी सॉरी भी मांग लेती है।
हां, अब लगता है कि राशि मेरे साथ खुश है लेकिन मैं कई बार सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ कि 'शादी के लिए उसने हां नहीं की है तो कहीं राशि भी किसी और से प्यार ना करती हो उसे भूल गई हो अब...'
सगाई और प्यार में फस गया हूँ
अब देखते है आगे क्या होगा? सगाई और प्यार : भाग 2....जरूर पढ़ें...
बहुत जल्द प्रितिलिपि पर पोस्ट करूंगा (ये कहानी मेरी काल्पनिक कहानी है इसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है)