December 31, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

आओ साथी

यादगार बनाते है,
हसीन पलों को।
आओ साथी,
इस साल के अंतिम दिन
आओ साथी ,आ जाओ साथी।

दिल की सुनाते है
एक दूजे को हम
आओ साथी,
आमने सामने बैठकर
आओ साथी, आ जाओ साथी।

चलो आज भूल जाते है
बुरे बीते वक्त को हम।
आओ साथी,
रात गई बात गई कहकर
आओ साथी, आ जाओ साथी।

चलो आज मुस्करा लेते है
याद कर कुछ किस्सों को हम।
आओ साथी,
बतियाते है साथ बैठकर
आओ साथी, आ जाओ साथी

हा, यादगार बनाते है
आज के अंतिम क्षणों को हम।
आओ साथी,
दो पल साथ बैठकर
आओ साथी आ जाओ साथी।

मांग लेते है माफी
एक दूजे को दी निराशा की हम।
आओ साथी,
नही जीना अब दूर रहकर
आओ साथी आ जाओ साथी।

दे देते क्षमा एक दूजे को
जाने अनजाने में की गलतियों की हम।
आओ साथी,
क्या कर लेंगे हम नाराज हो कर
आओ साथी आ जाओ साथी।

शुरू करते है एक नई जिंदगी
पुरानी को अलविदा कह देते है हम।
आओ साथी,
नव वर्ष की सुभकामनाएँ देकर
आओ साथी आ जाओ साथी।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा

December 31, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

दो अनजाने अजनबी

दो अनजाने,  अजनबी  जा  रहे  थे आज  मिलने।
दिल में अजब सी बेचैनी, अजब सी व्याकुलता है।।

निगाहें  सजनिया  को ढूंढ  रही थी, प्रणाम  करते हुए।
दिल  और  दिमाग, जहन  की तरंगें, आह!  भरते हुए।।

कामयाब  हुई  निगाहें  उसे ढूंढ़ने में , मैं होश खो बैठा।
उसका  नूरानी  चेहरा  देख, दिमाग  मदहोश हो बैठा।।

हां,माँ की चिमटियों से मैं सम्भल रहा था थोड़ा-थोड़ा।
दूसरे ही पल देखने पहुंच जाता उसे, मन दौड़ा-दौड़ा।।

बड़ो के लव हिलते दिखाई दे रहे थे, कर्ण सुन न रहे थे।
ध्यान तो वहीं था मेरा लव मेरे हां,हूं में जवाब  दे रहे थे।।

व्याकुल हो उठा था मेरा मन उसे अपने सामने न पाकर।
फिर चाय लाती देख सुकून मिला दिल को अब जाकर।।

हम व्याह बंधन में बंधने जा रहे है बस शेष है कुछ दिन।
सोचा न  था ये 'चैन'  इतना  बेचैन हो जाएगा इक दिन।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा 'चैन'


December 29, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

दिल की सौदेबाज़ी

आज उन्होंने मेरे दिल की सौदेबाज़ी की।
कहा, दौलत के बदले ये दिल तेरा हुआ।।

गरीबी का हवाला दिया, पैसे देखे नही है।
दौलत के बदले ही उनका दिल मेरा हुआ।।

मानता हूं कि आज की जरूरत है दौलत।
पर, दौलत  की रात का कब सवेरा हुआ।।

मेरा दिल कोई बिकने का समान नही है।
जो दौलत  के  सौदे  मात्र से  तेरा हुआ।।

प्रेम की दौलत कमा कर देखो कभी तुम।
भूल जाओगी दौलत जब 'चैन' तेरा हुआ।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


December 29, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

परिंदा व शिकारी

परिंदा
है बुद्धिजीवी ज़रा तरस कर
मुझे रिहा कर इस जंजीर से।..
है बुद्धिजीवी ज़रा रहम कर
बाहर निकाल सोच गंभीर से।।

शिकारी
कर्म को कैसे भूलूँ ऐ परिंदे..?
तूने कर्म कर लिया मैं करूँगा।(पिछले जन्म में)
अब डाह ना कर मेरी राह में
शिकारी हूँ शिकार करूँगा

परिंदा
मेरी मान ले एक बात ज़रा..
दम घुट रहा है रे मेरा कैद में।
उन्मुक्त गगन का पंछी हूँ..
क्या तुं रह लेगा छोटे *छेद में?।।

* निहायती छोटा सा घर

शिकारी
नहीं रह पाऊँ, प्राणी कुल का मैं
तूने जान देनी है मैंने जान लेनी।
फिर शिकारी कौन कहेगा मुझे?
छोड़ दूँ गर तुझे, देख तेरी बेचैनी।

परिंदा
तो तुं ज़रा सा तरस नहीं करेगा?
मुझ बे सहारा पर, ज़रा ये बता।
मार देगा किसी के हाथ बेचकर,
ले मार दे अभी मुझे, मेरा सर झुका।।

(उस परिंदे ने अपनी गर्दन शिकारी के आगे।)

शिकारी
कोई अच्छे कर्म किये हे परिंदे.
जो मेरे मन में आ गई है दया ।
जा,  उड़ जा उन्मुक्त गगन में
मानुस हूँ पहले, शिकारी न रहा

परिंदा  : थंक्स (खुशी से)
मनुष्य(शिकारी): वेलकम 😊😊😊
(शिकारी तो रहा ही नहीं बेचारा हार जो गया परिंदे से)

-:-स्वरचित-:-

सुखचैन मेहरा


December 29, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

धरती माँ

क्या हुआ धरती माँ ???
कुछ नही बेटा...
फिरी तेरी आंखों में आंसू कैसे?
बस ऐसे ही निकल आये बेटा...
फिर भी कुछ तो बात होगी।
चल ले फिर सुन बेटा...
हा.... माँ (ध्यान लगा मैं सुनने लगा)
आप लोग मुझे माँ कहते हो ना??
हा, माँ....कहते है
तो फिर क्यों वन क्यों काट रहे हो
मेरे शरीर के अंगों को क्यो आपस मे बांट रहे हो.?
कई किसान तो पराली को जलाते है
मेरे सीने में आग लगाते है
ले सुन अब...कुछ लोग मुझ पर
कूड़ा करकट फेंकते है।
जहा जी किया वहा फेंकते है।
ट्यूबेल लगाकर मेरा सीना छलनी करते है
इस तरह मुझे चोट पहुँचाते,
लोग मनमानी करते है ।
अब तू बता क्या करूँ मैं ?
रोने के अलावा कुछ कर भी नही सकती।
ओह! माँ आँखो में नीर बह आया है
तेरी दुखदायी कहानी सुनकर
अपने आप को जगाया है
जितना होगा मैं करूँगा
माँ तेरी इस कहानी का
प्रसार जन जन तक मैं करूँगा।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


December 29, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

आओ प्रिया

ओह!  प्रिया  आज तुम  आओ  मोहे  घर
एक अरसा हो गया तुम्हे बतलाया नहीं है ।
बस तेरा  प्यार  पाने को  तरस  रहा  हूँ मैं,
याद में डूबा है दिल, चैन से सोया नहीं है।।

बेवसी  के  आलम  को  समझो जरा तुम
जैसे तड़फ रहा हूँ मैं, तुम्हें  तड़फ नही है?
कैसे हमसफर  हो  तुम जो  बेदर्दी बने हो
विकल रहा हूँ मैं, क्या तुम्हे फर्क नही है??

ये दिल बस तेरे ही बारे सोचता रहता है
क्या तेरा  दिल मेरे बारे में नही सोचता।
बस पल-पल तेरी ही याद में तड़फता है
क्या तेरा दिल मेरे लिए नही तड़फता।।

ओह! प्रिया अब बस बहुत हो गया है 
इस बेसमझी के  दौर को टूट जाने दो ।
तेरे तन से ज्यादा तेरी रूह की जरूरत है
रोको मत अपने आप को आ जाने दो।।

मिलेगा सुकून तेरे  पास आ  जाने से ही
आ जाओ अब तुम इतनी देर न लगाओ।
हा, दे रहा ये बेकरार दिल आवाज तुम्हे
अब तुम जहाँ भी हो तुरन्त चले आओ।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


December 29, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

त्योहारों का देश हमारा

त्योहारों का है देश हमारा अनेकों त्योहार मनाए जाते है।
हम सब मिलकर  हर  त्योहार  मनाते, अकेले तो नही।।

आज है पच्चीस दिसम्बर जन्म दिन है ईसा मसीह का।
सब मिलकर है देते एक दूजे बधाइयां, अकेले तो नही।।

सांता क्लॉज है पूछ रहा हरेक नन्हे बच्चे से कौन हूँ मैं।
सब बच्चे मिलकर बोले मेरे अंकल, वो अकेले तो नही।।

ना है जात पात, न कोई लिंग भेद, न है छोटा या बड़ा।
सब मिलकर है त्योहार मनाते , अकेले अकेले तो नही।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


December 29, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

सांता क्लॉज आया है

आओ प्यारे प्यारे बच्चो
देखो सांता क्लॉज आया है।
हाथ करो सारे आगे
पॉकेट में खुशियां भरकर लाया हैम
लो चिंता में डूबे लोगो
आज जी भर के आशीष पालो
आज खुद खुदा का पुत्र
रहमत बरसाने आया है।
कोई मन मे कपट नही कोई धर्म गलत नही
बस यही पाठ पढ़ाने आया है।
सांता क्लॉज का प्यार किसी एक को नही
बल्कि वो सब पर प्यार लुटाने आया है।
सब जात पात को बुलाकर
हिन्द एकता का पाठ पढ़ाने आया है।
वो स्वर्ग छोड़कर आपके साथ
क्रिसमस डे मनाने आया है।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


December 28, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

नया साल मुबारक

नया  साल,  नई  उमंग
नया  उत्साह  नई तरंग।
मन प्रफुल्लित,
भाव उमड़े है
नए साल के संग।।

नया रंग, नई सवेर
नई पसन्द तारिखों का फेर।
दिल उत्साहित,
है नया साल
ना तेर ना मेर।

नया रास्ता, नई मंजिल
नया कर्म है आशाएं स्वप्निल।
आंखें चंचलित,
अच्छी आदते हो उजागर,
बुरी हो धूमिल।

किसी को हंसाया, रुलाया
दिल दुखाया, माफ करना भाया।
मन क्षमा प्रार्थी,
पिछली बातों का
तुम करना सफाया।

नई सोच, नई जिंदगी
हो नई राह, नई बंदगी।
मन अभिलाषित,
पूरे हो मनोरथ,
आगे की जिंदगी।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


December 17, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

न जाने कहा गए संस्कार

आज   माँ   है   बेटों   पर भार।
न   जाने   कहाँ   गए  संस्कार।।

गरीबों पर अमीरों की फटकार।
न   जाने   कहाँ   गए  संस्कार।।

छोटे बड़ों पर  कर  रहे  है  वार।
न   जाने   कहाँ   गए  संस्कार।।

बेटी का जन्म है, दोनों में दरार।
न   जाने   कहाँ   गए  संस्कार।।

जहाँ बुजुर्गों का नही है सत्कार।
न    जाने।  कहा  गए  संस्कार।।

है रब अर्ज करूं मैं किस दरबार।
ताकि लौट  आये  फिर  संस्कार।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


December 16, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

एक साक्षात्कार

(उम्मीदवार का साक्षात्कार ले रही है जनता।
चलिये देखते है  क्या  कह रही है जनता।।)

जनता
आप आराम से बैठिये घबराइए नही।
साक्षात्कार बीच  में न रह जाए कही।।

उम्मीदवार
नही घबरा रहा ठीक हूँ मैं।
साक्षात्कार में शरीक हूँ मैं।।

(पसीना छूट रहा है)

जनता
ठीक है  तो  आओ  आगे  बढ़ते है।
क्या नाम है आपका?क्या करते है?

उम्मीदवार
स्याणा राम है मेरा नाम।
जन सेवा  है  मेरा काम।।

जनता
जी  काम  तो  आपका है,  खरा।
कितना अनुभव है बताओ जरा??

उम्मीदवार
साठ साल, हमारी पीढ़ी समर्पित है।
आगे  भी मेरा  जीवन  जनार्पित  है।।

जनता
अच्छा! तभी आज मेरा भारत महान है।
विकासशील है देश, भ्रष्टाचार  प्रवान है।।

उम्मीदवार
अब हम कुछ  करेंगे ये  वादा है।
अपनो की फुट थोड़ी ज्यादा है।।

जनता
साठ  सालों में  तो  कुछ नही  कर  पाए।
अब क्या कहीं से जादू की छड़ी ले आए??

उम्मीदवार
विपक्ष में  बैठे है  पिछले  दस  सालो से।
उभरेंगे हम अब राजनीतिक जंजालों से।।

जनता
चलो अच्छा  है, उभर  जायोगे तो ठीक है।
नही तो फिर बदल देंगे, यही हमारी रीत है।।

जनता
बधाई हो तुम्हे चुना  है  हमने  रीतानुसार।

उम्मीदवार
धन्यवाद आपका, आपको मेरा नमस्कार।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


December 13, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

शहीद पतवार

एक दिन, मरम्मत   के   बहाने।
अलग की थी, पतवार नाव से।।

जगह ली  थी  पतवार  नयी  ने।
मल्लाह ने स्वीकार था, चाव से।।

कोने में लगी वो  पुरानी पतवार।
जूझ  रही  थी, बस  तनाव   से।।

डूब  गई वो  नाव भी  वियोग  में।
उस पुरानी पतवार के अभाव से।।

है  मल्लाह!  क्यो  अलग  किया?
बता, हमें एक दूजे के जुड़ाव से।।

बता   क्या  मिल   जायेगा   तुझे।
है  मल्लाह,   हमारे  अलगाव से।।

माफ करो  मुझ मूर्ख, अज्ञानी को।
बोला   मल्लाह,   क्षमा   भाव से।।

कैसे  ले  लूं मैं  तेरी  जगह, बहन?
गिर गई  खुद, अलग  हो नाव से।।

शहीद पतवार आंखे नम कर गई।
पर मिला गई पतवार को नाव से।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


December 08, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

दिलरुबा फिर से: भाग 2

सच बताऊं तो मैं रुबा को चाह कर भी भूला नहीं पा रहा था।
ऊपर से वो किताब में छिपाया हुआ 'रेड रोज' आज अचानक मेरे सामने आ गया। तब तो मैं रो ही पड़ा था।

राशि का संदेश आया लेकिन मैंने नहीं देखा, मेरा मन तो बस रुबा के बारे में ही सोच रहा था।

फिर एक दिन राशि का फोन आया कि 'मेरे माता पिता को राशि के माता पिता ने शादी की तारीख पक्की करने के लिए बुलाया है'

मैंने अपने माँ-बाप को बता दिया वो अगले ही दिन शादी पक्की कर आये।

दो महीनों बाद हम दोनों को शादी के बंधन में बंधने वाले थे ।

अब मैं ये फैंसला ले चुका था कि अब कभी भी रुबा से बात नहीं करूंगा अपने वर्तमान हमसफर के साथ खुश रहूँगा..

रुबा के मैसेज पर मैसेज आ रहे थे लेकिन मैंने रिप्लाई नहीं किया

मुझे राशि से बात करना अच्छा लगने लगा । लेकिन मेरी बात राशि से होना धीरे धीरे कम होने लगी। मैं तरसने लगा राशि से बात करने के लिए।

मैन राशि को पूछा कि मुझ से बात क्यों नहीं करती?

उनका जवाब था घर का काम बहुत है और पापा से फ़ोन का भी मिलना बहुत मुश्किल है ।

एक दिन मैंने राशि को बाजार में मिलने को कहा। वो आ गई।

लेकिन वो मुझसे मिलते ही रोने लग गयी....मैंने पूछा "क्या हुआ???"

वो कहने लगी...'मैं किसी और से प्यार करती हूँ...'

मैंने कहा "तो उसमें दिक्कत क्या है? मैं मना कर देता हूँ'

शादी की दिनाँक पक्की हो चुकी है कार्ड भी छप चुके है ...

फिर क्या हुआ...मैंने कहा

कुछ नहीं होता यदि अपने दोनों की शादी हो भी जाये तो क्या तुम मुझे उस लड़के जितना प्यार दे पाओगी...

नहीं.... राशि ने सर् हिलाते हुए कहा।(आंखों में आंसू है)

इस लिए कह रहा हूँ पहला प्यार पहला ही होता है उसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए...

अब मैं उससे(उमंग) बात नहीं करना चाहती क्योंकि मेरे माता पिता की इज्ज़त का सवाल है...राशि ने कहा

'देख लो फिर मत पछताना...'मैंने कहा

'नहीं, तुम भी बहुत अच्छे हो...'राशि ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा

अब मैं तुम से रोज बात किया करूंगी...वो किसी ने सच ही कहा है कि  'जिसे हम हासिल करना चाहते है उसे अगर न हासिल कर पाए तो जो हासिल हो गया है उसे कभी नही गवाना चाहिए।'

अब मैं तुझे गवाना नहीं चाहती हूँ...

अब हमारी तो बात बहुत अच्छे से होने लग गयी लेकिन दूसरी तरफ रुबा के पेरेंट्स को मेरे और रुबा के प्यार के बारे में पता चल गया।

उन्होंने एक बार मेरे माता पिता जी को मिलने का फैसला लिया। लेकिन जब वो मेरे पेरेंट्स से मिलने आये तो वो दिन बदकिस्मती से मेरी और राशि शादी का दिन था..

वो लोग यहां से जाने लगे लेकिन मैंने उन्हें थोड़ी देर और रुकने को कहा। और मेरे पापा से मिलवाया।

सब लोग खुश थे एक मेरे और रुबा के पेरेंट्स के अलावा।

चारों ओर खुशियों का माहौल था।

राशि को प्यार करने वाला लड़का उमंग वहां पहुंच गया।

पहुंचते ही वो राशि के पिता को साइड में ले जा कर उनके पैरों में गिर गया और सारी बात सच-सच बता दी।राशि का पिता ने उसे उठाया।

रुबा के पापा ने उन्हें देख लिया।

थोड़ी देर उन्हें बात करते देख रुबा के पिता जी भी वहीं चले गए और मेरी व रुबा के बारे में भी सब कुछ बता दिया ।

सयोंग से मेरे पापा भी उनमें शामिल हो गए।

यहां तीनों परिवार (मेरे, रुबा व राशि के) के मुखियाओं ने रुबा की शादी मेरे साथ तथा राशि की शादी उमंग के साथ करने का एक सराहनीय निर्णय लिया।

उमंग, शादी लिए तैयार हो रही राशि के पास चला गया।

राशि घबरा गई... तू यहां क्या करने आया है? तुम्हे किसने बुलाया यहाँ ?

पापा को देख और ज्यादा घबरा गई... पापा आप जहां मेरी शादी करोगे में वहीं शादी करूंगी..

पक्की बात है ..? पापा ने कहा।

पक्की....पापा (रो कर पापा के गले लगते हुए)

तो तेरी शादी उमंग से करवा देता हूँ और तुझे करवानी पड़ेगी।

राशि हस पड़ी।

उमंग मैंने तो तुझे कभी नही बताया कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ... फिर...

रोजी ने बताया था...

इस प्रकार दिल व रुबा तथा राशि व उमंग एक हो गए ।

किसी ने सच ही कहा है प्यार अगर सच्चा हो तो उसे खुद भगवान भी नहीं अलग कर सकता है...

"दिलरुबा फिर से: भाग 1", को प्रतिलिपि पर पढ़ें :
https://hindi.pratilipi.com/story/xVawVy9CWkXx?utm_source=android&utm_campaign=content_share

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


December 08, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

सही नहीं है

आज समय नहीं है, अपनो के लिए अपनों को
गैर फिर भी वक्त  निकाल लेते है, सही नहीं है।

तरकीबें  पूछते है  गैरों  से वो, हमें  लुभाने  की
पर हमें इशारा  भी  नही कर पाते, सही नही है।

हम तो  उनकी  सादगी  पर मरते  है  मेरे दोस्त
वो  चेहरा देखकर प्यार  करते है, सही  नहीं है।

उनको  कोई  फर्क  ही ना पड़े हम बिलखते रहे
पल-पल याद में भी हम ही तडफें, सही नही है।

कुछ मजबूरियां  होंगी  उनकी चलो  मान लिया
पर पूरे दिन में  पल भी बात न हो, सही नही है।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


December 08, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

उस दिन...?

आंखें    जब   मिली  थी   उनसे    पहली   बार मेरी।
बेकाबू  दिल  ने  पहली  बार  मेरा  साथ  छोड़ा था।।

कहा  अब मैं   तेरे लिए  नहीं, उसके लिए धड़कूँगा ।
उस दिन मेरी आंखों ने भी, तार उन्ही से जोड़ा था।।

मत पूछो यारो उस  दिन आगे  क्या-क्या  हुआ था।
बस मेरी  सांसे चल रही  थी, मैं बुत्त बन खड़ा था।।

उनकी काली, कजरारी आंखें दुपट्टे से झांक रही थी।
उसके पिता के 'चलो' शब्द ने, ये सिलसिला तोड़ा था।।

मैं तो कुछ वक्त ऒर ठहर जाता वहां, पर क्या करूँ?
वो यहां से जा चुके थे, बस. कुछ वक्त भी थोड़ा था।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


December 02, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

दिलरुबा फिर से : भाग एक

उतना मन मेरा पढ़ाई में नहीं लगता था जितना रुबा को देखने मे लगता था। वो थी ही इतनी प्यारी कि उस पर से नजरें हटाने का मन ही नहीं करता था।

 मैं तो दूर से ही उसे जी भर के देख लेता क्योंकि उसका सामना करने की मेरी हिम्मत नहीं थी मुझमें। 

कभी कभार वो ही मेरे पास आकर बैठ जाती और खूब बातें करती। वास्तव में वो स्वयं अच्छी होने के साथ-साथ बातें भी बहुत अच्छी कर लेती थी। बिल्कुल सीधी सादी न किसी से कुछ बुरा कहना ना  भला कहना सुनना।

 मेरा मन तो पढ़ाई में तो लगता ही नहीं था। सारा दिन उसके बारे में ही सोचना। घर पर भी मेरा यही हाल था, पापा जी कोई काम कहते लेकिन मैं भूल जाता। आये दिन पापा से भी डांट खा ही लेता था। 


फिर एक दिन मैं उसे उसी टकटकी से देख रहा था लेकिन उसकी सहेली और मेरी बहन रमा ने देख लिया और उसे बता दिया ।

वो मेरे पास आई । बोली, 'तुम मुझे चोरी चोरी क्यों ताकते रहते हो?

मैंने कहा, नहीं...नहीं... किसने कहा अपको ?

रमा ने...

मैं रमा की तरफ देख कर थोड़ा सा मुस्करा दिया।

'सॉरी' लेकिन तुम बहुत अच्छी लगती हो मुझे...

क्या अच्छा लगता है तुम्हे मुझ में?

तेरी प्यारी सी आंखे, नाक, कान, मुँह सब कुछ अच्छा लगता है।

चल पागल सा...

(वो शर्मा कर भाग गई)

मैंने जाकर रमा के कान खेंच दिये... मजाक में वो कहने लगी भाई पापा को भी बताना बाकी ही अभी तो...

मैंने रमा के कान छोड़कर अपने कान पकड़ लिये...

चल नहीं बताती ....

घर पर जब भी रमा पापा को कुछ कहती तो मेरे दिमाग मे वही बात घूमने लगती।

एक दिन रमा और मेरा किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया जैसा कि अमूमन भाई बहन में होता रहता है...

वो पापा को मुझे व्यंग्यात्मक लहजे से देखते हुए बोली 'पापा दिल की शिकायत लगानी है आपसे....

क्या बेटा क्या कर दिया अब  दिल ने...

मैंने उसे सौ का नोट दिखाते हुए न बताने का इशारा किया...

वो मिंट में बदल गयी,' कुछ नहीं पापा दिल ना मुझे मारता रहता है'।

ये तो आप दोनों का रोज का काम है...चल भाग यहां से, मैंने सोचा पता नहीं क्या कर दिया दिल ने..

रमा सीधी मेरे पास आई ' दे रुपये अब...' मैं वो सौ रुपये लेकर बाहर भाग गया।

लेकिन थोड़ी देर बाद घर आकर मैंने उसे वो सौ रुपये का नोट दे दिया।

कोई बात नहीं भाई, लेकिन अपने माँ-बाप की इज्ज़त का ख्याल रखना आये दिन अखबारों में बच्चों से तंग आकर खुदखुशी करने की खबरें छपती है...इतना कह वो सौ रुपये मुझे वापिस देकर घर के काम में लग गई।

मेरी बहन छोटी थी लेकिन बात वो बहुत बड़ी कह गयी।

पर मैं जब स्कूल आ जाता तो फिर उसकी वो भोली सी सूरत को देखकर रमा की कही सारी बातें भूल जाता।

हमारे स्कूल में 'रोज-डे' के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करने के उद्देश्य से सभी बच्चों ने एक दूसरे को 'रेड-रोज' दिया ।

मैंने रुबा को और रुबा ने मुझे भी 'रेड-रोज' दिया ।

स्कूल पूरा होने के बाद हम दोनों ने एक ही कॉलेज में एडमिशन ले लिया।

वहां तो हम दोनों काफी घुल मिल गए थे । रमा (कवाब में हड्डी) भी हमारे साथ थी ।

लेकिन कॉलेज के आखरी साल में मेरी मंगनी हो गयी ।

रुबा को अभी पता नहीं था... मैंने रुबा से बात करनी कम कर दी।

रमा को मेरा बदला व्यवहार अच्छा नहीं लगा वो उसने रमा से पूछ ही लिया था लेकिन रमा बिना कुछ कहे वहां से चली गई....

फिर उसने मेरे से पूछा...

मैंने कहा रुबा अब छुट्टी हो चुकी है कॉलेज की कल बात करते है...

उसने अपनी कसम दे दी इस कारण मुझे सब बताना पड़ा।

वो मेरे गले लग कर रोने लग गई कहने लगी मैंने तो तेरे अलावा किसी ऒर के बारे में सोचा भी नहीं था...तू आज मुझे छोड़कर जा रहा है...

मेरी बहन रमा ने, 'आज के बाद आप दोनों का यों मिलना सही नहीं है' कहते हुए हमें एक दूसरे से अलग किया।

आज मैं जहां सगाई हुई है ना उन्हें मना कर सकता ना मैं अपने पहले प्यार को भूल सकता।

फिर भी मैं राशि (जिससे सगाई हुई है) से बातें करता हूँ कभी कभी राशि भी मेरा दिल तोड़ देती है यह कह कर कि 'मैं मेरी मर्जी से नहीं बल्कि उसके माँ-बाप  के कहने पर कर रही है।(बिल्कुल मेरी तरह)

लेकिन बहुत जल्दी सॉरी भी मांग लेती है।

हां, अब लगता है कि राशि मेरे साथ खुश है लेकिन मैं कई बार सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ कि  'शादी के लिए उसने हां नहीं की है तो कहीं राशि भी किसी और से प्यार ना करती हो उसे भूल गई हो अब...'

सगाई और प्यार में फस गया हूँ

अब देखते है आगे क्या होगा?  सगाई और प्यार : भाग 2....जरूर पढ़ें...

बहुत जल्द प्रितिलिपि पर पोस्ट करूंगा (ये कहानी मेरी काल्पनिक कहानी है इसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है)

स्वरचित

सुखचैन मेहरा # 9460914014

November 30, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

 शेर-4

1.
मेरे शब्दों ने खामोशी धारण की है
इसका मतलब ये नहीं है कि
मेरी खामोशी का कोई अर्थ नहीं है
बस समझने वाला समझ जाएगा
बाकी मेरे न चाहने वालो में से एक होगा

2.
तेरी सूरत पर है भोलापन
      पर तेरी अदाओं में शरारत है।

3.
बत्तीसी दिखाने में थोड़ा समय लगेगा हजूर,
क्योंकि उनकी चाल से थोड़ा देर से वाकिफ हुआ हूँ।
कुछ दिन यादों का काफिला साथ रहेगा,
और कुछ दिन उसकी बेवफ़ाई को याद कर रोऊंगा।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 25, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

झूठे यकीन के सहारे

"आज आखरी बार मिलना चाहती हूँ आपसे"  ये संदेश था... सुजल से बेइंतहा मुहब्बत करने वाली करिश्मा का।

सुजल संदेश पढ़कर विचलित हो उठा...उसने हाथोंहाथ करिश्मा को फ़ोन लगाया लेकिन उसने नहीं उठाया।

फिर सुजल बिना देर किए उस जगह चला गया जहां वह रोज मिला करते थे।

करिश्मा वहां बैठी आंसू बहा रही थी। 'क्या बात हो गयी है, बात तो बताओ??'सुजल ने आगे से उसके कंधों पर हाथ रखते हुए कहा।

करिश्मा बस लगातार रो रही थी...

'अरे! यार कुछ तो बताओ..' सुजल ने करिश्मा को झझकोरते हुए कहा।

सुजल...मेरी...मेरी.....

हां... हां... बताओ..

मेरी सगाई हो गयी है और कुछ दिन बाद शादी है...

सुजल अपना माथा पकड़कर बैठ गया। कहने लगा तूने तो मरते दम तक साथ निभाने की कसम खाई थी उसका क्या..???

इसमें मैं कुछ नहीं कर सकती...मैं तुझे बताने आयी थी कि आज के बाद मैं आपसे नहीं मिलने आऊंगी।

बात तो कर लिया करना।

'ठीक है' कहकर करिश्मा चली गई।

सुजल बैठा देखता रहा...जब तक वो आंखों से ओझल नहीं हो गई....

करिश्मा की शादी एक प्रद्युमन नाम के लड़के के साथ हो गई।

पहली रात तो ठीक से निकल गयी । क्योकि करिश्मा ने अपने पिछले जीवन का राज नहीं खोला था अभी तक।

बीच मे किसी अजनबी के फोन आया करते थे प्रद्युमन को कि 'तूने जिस लड़की से शादी की है वो किसी और के साथ प्यार करती है...💐💐💐

प्रद्युमन ने पूछा क्या सबूत है??

मेरे पास कुछ फोटोग्राफ्स है तुम राज भवन के पीछे आ जाओ।

मिलने पर उसने वो सारी फोटोज प्रद्युमन के हवाले कर दी...

लेकिन प्रद्युमन इतनी जल्दी किसी पर विश्वास करने वाला नही था उसने सोचा आज कल डिजिटल जमाना है किसी ने फ़ोटो एडिट कर दी होगी।

लेकिन उसे धीरे धीरे सक होने लगा कि करिश्मा उसके साथ थोड़ा सा भी वक्त नहीं निकालती  वो फ्री समय में मोबाइल पर ही व्यस्त हो जाती है।

पर प्रद्युमन करिश्मा को कुछ नहीं कहता क्योकि करिश्मा अब माँ बनने वाली थी।

(दो महीने बाद, गोवर्नमेंट हॉस्पिटल, जयपुर)

करिश्मा को प्रसव पीड़ा उठने के कारण हॉस्पिटल में भर्ती करवाया।

डॉक्टर ने कहा बड़े ऑपरेशन से बच्चा होगा।

प्रद्युमन घर पर आया था कुछ सामान की व्यवस्था के लिए क्योंकि प्रद्युमन को आज रात हॉस्पिटल में ही रुकना था।

प्रद्युमन शर्दी के कपड़े व अन्य जरूरी सामान इक्कठा कर ही रहा था कि उसे करिश्मा का मोबाइल दिखाई दिया।

वहां उसे सब कुछ पता चल गया और उस अजनबी की बातों पर भी यकीन हो गया था। सब संदेश पढ़ लिए थे प्रद्युमन ने सुजल व करिश्मा के...

उसने उसी वक्त गले में रस्सी डाली और भगवान को प्यारा हो गया।

(एक चिट्ठी करिश्मा के लिए छोड़ गया । और आखिरी तमन्ना लिखी की इसे करिश्मा ही पढ़े कोई और नहीं )

उधर उसी के पुत्र ने जन्म लिया ले लिया । करिश्मा को जब पता चला तो वो अपने किये पर पछता रही थी।

उसने वो चिट्ठी पड़ी तो लिखा था, ' मैंने तुम्हें शादी से पहले ही कहा था 'तुझे मैं पसन्द हूँ तो ही शादी करना लेकिन तू नहीं मानी जूठे यकीन के सहारे मुझे से शादी कर ली'

करिश्मा के आंखों में आंसू बह रहे थे और बच्चा रो रहा था ऐसा लग रहा था कि वो भी अपने पिता के जाने का शोक मना रहा हो....

जी वास्तव जिसे हम प्यार(दोनों तरफ से) करते है उसी से शादी करनी चाहिये , क्योंकि किसी दूसरे के साथ शादी करके तीन जिंदगियां खराब हो जाती है। एक स्वयं की दूजी उन दोनों की (जिसे छोड़ दिया है, जिसके साथ शादी हो रही है)

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 25, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

संघर्ष

मेरा तो सारा जीवन
संघर्षों से भरा पड़ा है
जब छोटा था तो
स्कूल जाता लेकिन
लिखने के लिए
पेंसिल नहीं थी
पेंसिल के लिए संघर्ष
छीना झपटी में
माथे पर घाव भी सहे
घर आता तो  बीमार माँ
को संभालने की जिम्मेदारी
भगवान के आगे हाथ जोड़े
शायद भगवान तक
पहुंची नहीं मेरी बात
मैने तो थे तरले तोड़े।
बचपन में मेरी जिम्मेदारियां बड़ी
मैं था छोटा।
गरीबी में भी संघर्ष जारी था
नहीं रुका।
बड़ा हुआ तो
अपने ही हक के लिए
संघर्ष किया।
साहूकारों ने था, हमारी भूमि पर..
कब्जा किया।
और आज तो
संघर्ष करने की
आदत सी पड़ गई है
जिंदगी एक संघर्ष है ये
खुद जिंदगी भी समझ गई है।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 20, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

सालगिरह

ऐ हमसफर  याद है  वो  पल,
जो हमने एक साथ बिताए थे।
क्या  याद  है  तुम्हे  वो  लम्हे,
जो मिलकर खास  बनाए  थे।।

हां, आज तारीख वही है लेकिन,
साल का अक्षर एक बढ़ गया है।
आज भी प्यार कम  नहीं  हुआ,
बल्कि ऒर ज्यादा बढ़ गया है।।

हां, यह  तन  का  रिश्ता नहीं है
दो  पाक  रूहों   का   रिश्ता  है।
उम्र   के   इस   पड़ाव   में   भी
मेरे  अन्तर्मन  की  मधुलिका  है।।

ये  सालगिरह  मुबारक हो प्रिया
कुछ  उपहार   है   तुम्हारे  लिए।
मुझे कुछ नही चाहिए  ओ प्रिया
तेरा  प्यार ही काफी  है मेरे लिए।।

उम्र नहीं  होती  प्यार   की  दोस्तो
प्यार  तो  बस  दिल  से   होता है।
दुया करो कि दिल  सदा जवां  रहे
ये रिश्ता बस दिल से ही निभता है।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 20, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

शब्द संग अर्थ

वर्ण से वर्ण मिला तूने  शब्द तो  बना लिया
अभी उन शब्दों का अर्थ समझना बाकी है।

लिख  डाली है  पंक्ति  "सोच अपनी-अपनी"
सहमति है, या स्वार्थीपन, समझना बाकी है।

गहराई में डूब गए गर  तुम  निकल न पयोगे।
कैसे पार करेंगे शब्दसागर, समझना बाकी है।

कुछ शब्द 'ठोकर' से है, कुछ वजह है जीने की
पर है कौन कौनसे वो  शब्द,  समझना  बाकी है।।

कुछ शब्द 'अहिंसा' से है, कुछ हिंसा के रखवाले।
हम किन शब्दों को  अपनाएं, समझना  बाकी है।।

कुछ शब्दों में  संसार  तो कुछ  में  है अकेलापन।
आप समझो, मेरे लिए तो 'माँ' शब्द ही काफी है।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 20, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

शरारतें

कुछ शरारतें है मन  मे, कुछ आशाएं  भी पाली है।
उतरी हुईं है जहन में, एक अवसर की ताक में हूँ।

मन विचलित हो उठा है तेरी  शरारती नजरें देख
मिलने को करता मन, हां उस पल की ताक में हूँ।

कभी कभी डर भी लगता है, ये मेरा बहम ही न हो
वो कभी आकर मिलेंगे, इसी आशा की ताक में हूँ।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 20, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

कुछ पंक्तियां - 3

आसान नही होता जिंदगी का सफर काटना
अगर जिंदगी में हमसफर का साथ न हो तो।

न जाने कहां खो गया है बचपन मेरा
जहां रोने मात्र से मनोकामना पूरी हो जाती थी
आज सोच रहा हूँ शायद कोई बचपन का बैकअप
होता तो अपनी जिंदगी गिरवी रखकर खरीद लेता।

बड़ी खमोशी से रहता था मैं गुमसुम
फिर।  हमसफर के    आ   जाने   से
जिंदगी के  मायने   ही   बदल।  गए।

बीतें पलों की यादें रह जाती है बस
पल तो न जाने कहाँ उड़ जाते है पंख लगाकर

अकसर याद करता हूँ उन पलों को
जो मैंने मेरे हमसफर के साथ बिताए थे
लेकिन अब उन्हें मेरी याद दिलाने के लिए
किसी खास लम्हें की फिर

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 18, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

तिरंगा

1.
तीन रंग का ये कैसा संगम
सर्वधर्म है इस में समाए
हरा खुशहाली का
केसरिया बलिदान का
पाठ पढ़ाये।
सद्भाव का  प्रतीक है सफेद
शान्ति का भाव जगाए।
2.
चले है विजयपथ पर तिरंगा लेकर
हम मंजिल को पा जाएंगे।
तिरंगा झंडा है हमारा सबसे प्यारा
हम इसकी शान बढ़ाएंगे।
3.
उस देश का मैं वासी हूँ,
तिरंगा है जिसकी शान।
जहां भगवान समान है
घर       के      मेहमान।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 17, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

तिरंगे की शान

कुछ पल  याद  आते  है हमें
जब  देश  मे  जंग  लगी  थी।
घर  पर सुरक्षित  थे हम सब
सरहद, मौत के संग लगी थी।।

वो तिरंगे  में   लिपटी  लाशें
मचा था हर तरफ कोहराम।
वो देखा था मौत  का मंजर
1857 का स्वतंत्रता संग्राम।।

वीरता  से  लड़  रहे  थे वीर
घर जैसे था  ही नहीं उनका।
हां,देश ही देश दिख रहा था
कुल तो जैसे नही था उनका

तिरंगे की शान  बचाने  को
जान न्यौछावर कर गए वो।
जुग - जुग याद आएंगे लाल
नाम देश का  कर  गए जो।।

आओ  आज याद करें हम
सरहदी  वीर  जवानों  को।
जिन्होंने  दुश्मन से डरकर
नही छोड़ा था मैदानों को।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 17, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

तिरंगा है शान हमारी

हम वतन वाले  वतन  से  प्यार करें।
तिरंगा है शान हमारी, हम मान करें।।

हां, गर्व  है देश के रखवालों पर हमें।
उनका हर अवसर पर गुणगान करें।।

कुछ शहीद हुए  है वो माँ  के  लाल।
चलो उनके लिए  हम  दीपदान करें।।

गुमनाम शहीदों को  भी याद करें हम।
चलो उनको सब मिलकर प्रणाम करें।।

खुश हो जाये जो आज भारत माता भी।
चलो सब मिलकर ये  अच्छा काम  करें।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 16, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

जुगनू

मैं जुगनू हूँ
जितना दिखने में सुन्दर हूँ
उतना ही किस्मत का मारा
पर कट जाते है समय से पहले
फिर फिरता हूँ मारा मारा।
लोग अंधेरे में छुपते है
मैं उजागर हो जाऊं
अब आप ही बताओ
मैं अपनी जान
कैसे बचाऊं...

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


November 16, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

बचपन

अब कभी मत रूठना ऐ मन मेरे
बचपन चला गया है
अब तो कोई  लापरवाही
नहीं चलने वाली
क्योकि बचपन.... चला गया है।
जिंदगी में तेरे लिए जो
मां बाप ने देखे है सपने।
उन्हें पूरा कर
अब तुझमे बचपना नही रहा।
याद तो आती होगी
बचपन के हसीं पलों की
जहन में छवि तो बनती होगी।
उन बचपन वाले मित्रों की।
पर अब क्या फायदा
क्योकि बस यादें ही बाकी है
बचपन तो रहा है नहीं

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 16, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

लम्हा लम्हा बीत रहा है

लम्हा लम्हा बीत रहा है
अतीत बन रहा है हर पल
आखिर कब समझेगा समय को
जब जीवन ही पतित गया तब।

समय की  नजाकत  समझनी  होगी
अगर  सफल   जिंदगी   में  होना है
हर पल की नजाकत समझनी होगी
अगर तूने हर हाल में सफल होना है।

पल पल जिंदगी का  अनमोल है
हर लम्हा  जिंदगी  का  बेमोल है
अब समझ जा वरना पछतायेगा।
बर्बादी में भी इसी का ही योग है।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 10, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

छठ पर्व

घर की  सुख  समृद्धि  बनी रहे
छठ   पूजा   के   साथ   हमेशा।
चार दिनों का है ये पर्व   हमारा
बिना 'मूर्ति' का है ये पर्व कैसा।।

राज पाठ सब गवां बैठे थे पांडव
स्वंय द्रोपदी तक को  हार गए थे ।
कृश्नादेश पर द्रौपदी ने किया व्रत
तब जाकर पांडव बहाल हुए  थे।।

सूर्य को देव मानकर करते है व्रत
सब  दूध   सूर्यदेव को  चढ़ाते है।
सेंधा नमक,  अरवा चावल  और,
कद्दू की सब्जी का भोग लगाते है।।

न अन्न  खाते  न  पानी पीते सब
सन्ध्याकाल  में  खीर  बनाते  है।
मेरे भारत देश का अनोखा  पर्व
छठ गीत विदेशी भी गुनगुनाते है।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 10, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

कान्हा की आवाज

सुन ओ कन्हैया
उलाहना दिया है
राधा ने ।
मुरली को थामे नहीं
मेरे मन के भाव
जगाता है।
माता श्री में तो हूँ
गोपालक, मधुरधुन
मैं गऊओं को
सुनता हूँ।
नही बेटा, जब गुजरे
राधा की गली
मुरली वादन बन्द
कर दिया कर।
उलाहना एक और भी है
तू गोपियों को भी
सताता है।
तू आवाज लगाकर
गऊओं को चरा।
नहीं माँ मैंने अगर आवाज दी तो
समस्त जगत् की गोपियां,
गौधन, जीव समूह
और न जाने कौन कौन?
मेरे आगे आगे विचरण करने लगेंगे।
फिर माँ तुझे तो उलाहनों
की आदत सी पड़ जाएगी।
माते तुम ही कह दो राधा से
मुरली छोड़, काज करे।
मेरी मुरली तो गऊओं
को समर्पित है...
राधा को तो मेरा सारा
जीवन ही अर्पित है...

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 10, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

दिल की आवाज

पहुंच   जाती  गर  आवाज  उन तक
तो  वो  हमें  याद तो  जरूर   करते।
मेरा  होने  की  जिद्द   तो   ना  सही
मुझसे मिलने की फरियाद तो करते।।

शायद 'रीति' की दीवार से  टकराकर
वर्णों में बिखर गई होगी मेरी आवाज।
या फिर किसी नई आवाज का जन्म,
आवाज मेरी लगी होगी बीच कतार।।

कोई दूसरी वजह भी ही सकती   है
मैं अभी  से   ये  भ्रम   क्यों   पालूं ?
हा, थोड़ा  इंतजार  ऒर   करता  हूँ
खुद को उसका गुनहगार  न बनालूं।।

वजह  चाहे जो   भी  हो,  विश्वास है
भूलना होता तो वो हमें हां, न करते।
यकीनन बेखबर है दिली आवाज से
वरना वो हमे इश्क वेपनाह न करते।।

पहुंच   जाती  गर  आवाज  उन तक
तो  वो  हमें  याद तो  जरूर   करते।
मेरा  होने  की  जिद्द   तो   ना  सही
मुझसे मिलने की फरियाद तो करते।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 09, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

भैया दूज व बालक तृष्णा

एक नन्हा बालक
हठ कर बैठा।
भैया दूज की
कहानी सुनकर।
माँ दीदी के हाथ का
खाना खाऊंगा।
खाना खा कर
धनवान बन जाऊंगा।
माँ कहां से लाती
उसकी बहन को,
बहन है ही नहीं थी
कैसे शांत करती
उसकी तृष्णा गहन को।
बालक हठ से कौन..
जीत पाया भला।
लिया है एक
लड़की को बुला।
बोला ये बहन नहीं
ये तो है रुबा।(लड़की का नाम)
फिर माँ ने एक ऒर
जुगत लडाई।
कपड़े की एक
गुड़िया बनाई।
उसके हाथ से है
खीर बनवाई।
हां अब जाकर
तृष्णा शांत हो पाई।
वो बालक कोई ऒर नहीं
मैं खुद 'सुखचैन' था भाई..

स्वरचित
सुखचैन मेहरा #9460914014


November 09, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

भैया दूज का त्यौहार

देखो 'भैया दूज' का  त्यौहार
लेकर आया है असीम प्यार।
भाई का जीवन सुखमय हो,
बहनों की बस यही है चाह।।

यूं तो खुश हैं परेशान करके
नहीं देख सकते परेशानी में।
हा ये रिश्ता है ही कुछ ऐसा
द्वंदता बनी रहती है कहानी में।

जब  दोनों  संग होते है तो
एक बार जरूर झगड़ते है।
कोई बात मनवानी  हो तो
मिनतें, पैर तक पकड़ते है।।

उमंग से भरा आज का  दिन
भाई की लंबी उम्र की चाहत।
जब नसीब में न हो बहन,तब
भावनाएं भी होती  है  आहत।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 09, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह 1 comment

हमसफर नहीं चाहिए (काल्पनिक)

जिंदगी के इस सफर में एक हमसफर की जरूरत तो होती ही इसमें तो कोई दोराही नहीं है। लेकिन मेरा कहना है कि मुझे हमसफर नहीं चाहिए। चलो बढ़ते है एक कहानी की ओर....

आज हम सब के लिए बहुत ही खुशी का दिन था, क्योंकि आज मेरे बड़े भाई की सगाई थी। सब तैयारी में लगे हुए थे। भाभियां भाई को बार बार छेड़ रही थी कि ' उनसे(मेरी होने वाली भाभी से) नजरें हटा लें।' भाई शर्माकर अपना चेहरा दूसरी तरफ गुमा लेता।

मेरी भाभियां बारी बारी से उनसे पूछ रही थी कि तुझे लड़का पसन्द है या नहीं...हर बार जवाब 'हां' में ही आया।

सगाई हो गयी । लगभग छः महीने हो गये। अब एक बात निकल कर सामने आई कि लड़की अभी शादी नहीं करना चाहती थी उन्होंने सिर्फ अपने माँ बाप के कहने पर हां कही थी..

मेरा भाई आज अपने आप को गुनहगार मान रहा है कि, मेरी ही गलती है मुझे उसे अकेले में पूछ लेना चाहिए था।'

परन्तु मैं इसमें मेरे भाई का गुनाह नहीं मानता। लड़की को भी चाहिए था कि वो अपनी दिल की बात माँ बाप को बताती।

तब से मेरी भी यही धारणा बन गयी है कि मुझे ऐसा हमसफर नहीं चाहिए जो मेरा साथ देने के लिए केवल इस लिए तैयार हो गया, उसके माँ बाप की मर्जी है उसकी खुद की नहीं।

मुझे अपने जिंदगी के साथ समझौता करने वाला हमसफर नहीं चाहिए ।

क्योंकि समझौतों से जिन्दगी बसर तो हो  सकती है लेकिन जी नही जा सकती। और हर एक लड़के/लड़की का सपना होता है

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 08, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

देश व गोवर्धन

भारत देश की हर बात निराली है।
हर  दिन होली हर रात दीवाली है।।

यहां अनमोल है हर जीव,  प्राणी।
गज  गनपत है, गो है माता रानी।।

एक गोपालक है भगवान अवतार।
जहां गोवर्धन एक पूजनीय पठार।।

गिरधर ने कनिका पर टिकाया था।
जब इंद्र देव ने  कहर बरपाया  था।

तब से है  ये  पठार भी  देव समान।
ऐसा है मेरा देश है मेरा देश महान।

भारत देश की हर बात निराली है।
हर  दिन होली हर रात दीवाली है।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 07, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

दीवाली व सिपाही

सरहदी सिपाही हूँ,  आज मैं भी दीवाली मनाऊंगा
दीप जलाकर सरहदी समय को यादगार बनाऊंगा।।

मेरी साथियों की शहीदी की याद भी मैं दिलाऊंगा।
भारत माता का गीत,  मैं  आज खुलकर सुनाऊंगा।।

प्रिय संग बीते पलों को याद कर,  दिल बहलाऊंगा
दुश्मनों को धूल चटाने की कोई नीति नई बनाऊंगा।

देश का रखवाला हूँ मैं दीवाली इस तरह मनाऊंगा।
दुश्मनों को चटाई  धूल  का  जश्न  भी मैं मनाऊंगा।।

क्या पता कब हिन्द देश के  मैं  काम  आ  जाऊं।
जब तक जान है मैं हर दिन दीवाली सा मनाऊंगा

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 07, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

दीपावली

दीपों का त्यौहार है दीपावली
खुशियों के संग मनाते जाओ।
रोशन कर  दो सारे  जहाँ  को
दीप  से  दीप  जलाते  जाओ।।

हरमन   से  तम  को   मिटाकर
ज्योतिर्मय ज्योत जलाते जाओ।
दीपों  का  त्यौहार है  दीपावली
खुशियों  के संग   मनाते  जाओ।।

दीन दुखियों के हर सुख दुःख को
अपने दुख सुख में मिलाते जाओ।
दीपों  का   त्यौहार  है   दीपावली
खुशियों  के संग   मनाते  जाओ।।

वैरी रहे  ना कोई  अब से तुम्हारा
हाथ  से   हाथ   मिलाते   जाओ।।
दीपों  का   त्यौहार है   दीपावली
खुशियों  के संग   मनाते  जाओ।।

हरिप्रिया की प्रतिमा को  तुम  अब
दीपों की आवली से सजाते जाओ।
दीपों  का   त्यौहार  है    दीपावली
खुशियों  के संग   मनाते  जाओ।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


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