February 20, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

   बचपन से शादी तक (दो पक्तियां अनुभव की)

हमारी पहली किलकारी से अपने माँ-बाप को एक नयी आवाज सुनने को मिलती है जिसे सुनकर माँ-बाप ख़ुशी से फुले नहीं समाते | पिता तो अपनी ख़ुशी के इजहार में घर हो तो पूरा घर गूंजा देता है....हॉस्पिटल हो हॉस्पिटल | हमारे जन्म के छः महीनों तक तो माँ-बाप चैन से सोना भी पसंद नहीं करते | जैसे ही हम इस लायक होते है कि हम स्कूल जा सकें तो हमे स्कूल भेजतें है चाहे यह हमारी मर्जी के खिलाफ हों | जब हम अपनी जवानी मैं पैर रखते है तो वे हमारी हर एक प्रतिक्रिया पर नजर रखते है | जैसे हमारे माँ-बाप पर उनके माँ-बाप ने रखी होगी| लेकिन आज कल कुछ माँ-बाप ऐसा करने में अक्षम नजर आ रहे (मैं सभी माँ-बाप की बात नहीं कर रहा)| चलो अब कहानी पर आते है-
      सुजल बचपन से अब (किशोरावस्था के अंतिम पड़ाव) तक एक अपने शरारती रबैये के चलते पुरे महोल्ले मैं हमेशा सुर्खियों में रहता था | किसी को धक्का देकर भाग जाना, और लडकियों को तो वह कुछ समझता ही नहीं था जब चाहें कोई न कोई शरारत कर देता | लेकिन एक लड़की को वह कुछ नहीं कहता था | उसकी सहायता करने मैं सबसे आगे रहता था |
एक दिन सुजल पता नहीं प्यार शब्द कहाँ से सिखकर आ गया....? उसने सीधा उसे कह दिया  ‘मैं तुम से प्यार करता हूँ’ | ये प्यार क्या होता है....? सुजल ने जबाब दिया- मुझे पता नहीं मेरे बड़े भ@या मेरी भ@भ@ जी से प्य#र करते है और मैं तुमसे | क्यों...? (आश्चर्य से).. चल ठीक है.. इतना कह राशी घर चली गयी और ये बात घर पर भी बताई लेकिन उन्होने हँसी में टाल दिया(सुजल के शरारती रबैये को देखते हुये) | नतीजा यह हुआ कि कुछ सालों बाद उन्होंने भाग कर शादी कर ली |
ये शुक्र है सुजल और राशी को प्यार के रिश्ते का अपनी यौवनावस्था मैं पता चला | यही यदि इन्हें छोटी उम्र में ही पता चल जाता तो क्या नतीजा हो सकता है ये हम सोच भी नहीं सकते । जरा सोचो ऐसा हो जाने पर वह बच्चे बचपन से शादी(21 साल की उम्र) तक पहुँच पायेंगे क्या..? |मेरे कहने का मतलब है छोटी उम्र में ही बड़ी उम्र का काम कर देते।  अच्छे अभिभावकों के बच्चे कभी ऐसा नहीं करते हैं | यदि किसी और वजह से ऐसा हो भी जाता है तो मेरी एक और कहानी “दिल-रुबा और जमाना  (दो पंक्तिया लव पर )” के अभिभावकों की तरह व्यावहार करें आगे आपकी मर्जी आप मेरे से ज्यादा समझदार हैं|
 
लेखक: सुखचैन मेहरा, सम्पर्क सूत्र :- 9460914014


February 14, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments


 दिल-रुबा और जमाना  (दो पंक्तिया लव पर )
*दो मिनट का समय निकालकर जरुर पढ़ना*
प्यार की तोहीम करना तो जमाने की आदत बन गयी है न जाने क्या मिलता है जमाने को ऐसा करके ? कुछ ऐसा ही हुआ दिल और रुबा के साथ | देखने में सिंपल थे दोनों | कालेज में न किसी से ज्यादा बोलना बस अपने ही से मतलब था |
      एक रोज रुबा बगीचे के एक साइड में अकेली बैठी थी और दिल भी वहीं आकर बैठ गया और बैठा रहा बोला कुछ नहीं बोला | फिर रुबा ने दिल से फादर-डे विश किया | आपको भी......(एक हल्की सी मुस्कान के साथ | ) मैं अपने पापा से बहुत प्यार करता हूँ....हर इच्छा पूरी करते है.. और  आपके पापा क्या करते है ? नहीं है.....रुबा ने अतीत को याद करती नजरों से जबाब दिया | सॉरी ....| नहीं कोई बात नहीं | दिल
      इस तरह उन्हें आपस में बातें करना अच्छा लगने लगा | घर पर भी रुबा का व्यवहार बदल गया...जो उसकी माँ ने साफ महसूस कर लिया था | पूछने पर कुछ भी नहीं बोली | बस चुपचाप अपने रूम में चली गयी |
इस बार रुबा की माँ ने उससे पूछ ही लिया कि, ‘ बेटा क्या बात है, दिनभर चुपचाप सी रहती है...?  नहीं माँ (लज्जाई मुस्कान के साथ) | कौन है वो लड़का...? मेरे से क्या छुपाना बेटी..? माँ वो मेरे साथ ही कालेज में पढ़ता है | फ़िलहाल तो तू अपनी पढाई पर ध्यान दे..| ये सब भूल जा | ठीक है, माँ. | माँ उसको समझाती रही लेकिन हाथों में तकिया लिए सुनती रही | बस सुन ही रही थी लेकिन शायद समझ कुछ नहीं आ रहा था उसे | छुटियाँ खत्म हुई | दिल और रुबा प्यार के बंधन में बंधते चले गये जो साथ वालों के नही हजम हो रहा था |
      उन्होंने दिल और रुबा को अलग करने के इरादे से दिल-रुबा के जैसी पोशाक में एक अपने ही दोस्तों की एक आपतिजनक (आभासी ) फोटो लेली | रुबा की माँ को दिखा दी | रुबा की माँ ने वह फोटो अपने पास रख ली | जब रुबा कालेज से लौट कर आई तो उसकी माँ ने उसे फोटो दिखाते हुये कहा (गुस्से से), ‘ये क्या है.....? माँ के हाथ में वह फोटो रुबा को कुछ समझ नहीं आया | माँ ये मैं नहीं हूँ मेरा विश्वास करो माँ | आपकी इज्जत को मैं जमाने में कभी नही उछालुंगी | रुबा की ये बात सुनकर उसकी माँ का गुस्सा शांत हो गया | आखिर पड़ी लिखी थी | माँ ने अपने भाई से उस लडके के बारे में पता करने को कहा | पता चला की वह अच्छे घर का लड़का है | वे लड़के वाले के घर रिश्ता लेकर गये लेकिन उन्होंने ये कह कर मना कर दिया कि, ‘ हमारे बेटे ने लड़की ढूंड ली है और उसकी ख़ुशी में हमारी ख़ुशी है |’ हमारे बेटे को हम जानते है वह कभी गलत निर्णय नहीं लेगा|
      घर आकर सब कुछ बता दिया | रुबा को अभी भी पूरा यकीं था की दिल ऐसा नहीं कर सकता लेकिन उस फोटो ने रुबा ने थोड़ा भ्रमित तो जरुर कर दिया था | अगले दिन रुबा ने दिल से पुरे दिन बात नहीं की जब भी दिल उसे बुलाने की कौशिश करता तो कहीं और जाकर बैठ जाती | साथ वाले बहुत खुश थे दोनों को इस तरह देख कर |
      अल सुबह दिल माँ-बाप रुबा के घर पहुंचे (दिल के पसंद की लड़की का रिश्ता लेने के लिए) | ये सब देख रुबा की माँ और दिल के माँ बाप हैरान रह गये | अच्छा तो वह आपकी बेटी को ही पसंद करता है | रब ने भी क्या सयोंग बनाया जमाने की लाख कौशीशों के बाबजूद दिल और रुबा एक हो गये | वो कहते हैं ना, ‘जब प्यार सच्चे दिल किया जाए तो उसे दुनियां की कोई भी ताकत डिगा नहीं सकती है | ये कहानी सभी (सच्चा) प्यार करने वालों को समर्पित है आप सब को मेरी तरफ से ‘हैप्पी वैलेंटाइन-डे’ |
                                     लेखक: सुखचैन मेहरा, सम्पर्क सूत्र :- 9460914014
February 08, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments


हैप्पी रोज-डे (रोज-डे स्पेशल)
*दो मिनट का समय निकालकर जरुर पढ़ना*
अच्छा लगता है जब कोई आपके हाथ में गुलाब का फूल थमा कर कहे, "हैप्पी रोज-डे" | खासकर कोई लड़की.. , ह ना....? तो इस पर जाहिर सी बात है कि आपका जबाब हां ही होगा | लेकिन आज मेरे सामने तो कुछ ऑर ही हो गया | हुआ यूं कि एक लडके ने अपने क्लासमेट को गुलाब का फूल हाथ में देकर रोज-डे विश किया लेकिन (इस) सिम्पल से दिखाई देने वाली लड़की ने लड़के को एक जोरदार थप्पड़ लगा दिया | पागल .... ‘रोज-डे’ केवल प्यार करने वालों के लिए ही नहीं होता है इसे दुनियां का हर-एक रिश्ता मना सकता है | मैंने तो आपको एक क्लासमेट होने के नाते रोज-डे विश किया था | अख़बार पढ़ लिया करो कभी....| सॉरी...आगे से पढ़ लिया करूंगी | सब हंस पड़े |
 वास्तव में कभी-कभी हमारे जैसे पढ़े लिखे लोग भी अनपढ़ों जैसी हरकत कर देते हैं | मेरा आप सब से अनुरोध है कि, मन में बिना कोई कपट रखे रोज-डे मनाएं क्योंकि रोज-डे दुनियां का कोई भी रिश्ता मना सकता है . आप सब को हैप्पी रोज-डे”.... आई मिस हर...
                                लेखक: सुखचैन मेहरा सम्पर्क सूत्र:- 9460914014 (व्हाट्सएप)
February 05, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments


पछतावे के आंसू  (एक अधूरी लव स्टोरी)
*दो मिनट का समय निकालकर जरुर पढ़ना *
आज कॉलेज का आखरी दिन था | लाली आज तक तो अपने प्यार का इजहार न कर पायी लेकिन आज हिम्मत जुटाकर राज को अपने दिल की बात कहने के लिए लाली की आंखे राज को ढूँढने लगीअ | लाली को कहीं से पता चला की राज की तो मंगनी हो गयी है | फिर एक बार लाली की हिम्मत को एक जोर डर झटका लगा | इतने में राज दिखाई पड़ा वह राज के पास गयी और उसकी मंगनी की बधाई देने लगी | बधाई........! किस बात की बधाई दे रहे हो मुझे आप ??? ..तुम्हारी मंगनी की | राज की हल्की सी आश्चर्य भरी हँसी छुट पड़ी | अरे लाली आपकी किसी ने फिरकी लेली आज फन डे भी है न आज | इतना सुनते ही लाली राज के गले लग रोने लग गयी और अपने दिल का सारा हाल बता दिया | अपने इतनी सी बात कहने में पुरे तीन साल लगा दिये | और मैं आपका ये इजहार नहीं स्वीकार कर सकता क्योंकि अगले सप्ताह ही लडकी वाले आ रहे है हमारे घर | तो फिर........मेरा क्या होगा? लाली ने कहा | लाली, अब कुछ नहीं हो सकता | एक बात मैं आपको बताता हूँ कि हमारे मन में जो है उसे समय रहते कह देना चाहिए क्योंकि समय बीत जाने के बाद तो बस पछतावा ही पल्ले रह जाता है | पहले तो लाली की आँखों में प्यार के इज़हार के आंसू थे और अब पछतावे के.............
                               लेखक:- सुखचैन मेहरा, सम्पर्क सूत्र- 9460914014 (व्हाट्सएप्प)

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