September 30, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

प्रार्थना: भाग-3

इस कहानी का भाग पहला और दूसरा प्रतिलिपी ऐप्प में अपलोड किया हुआ है..
प्रार्थना: भाग-2 से आगे

फिर एक दिन राम ने ही प्रार्थना को 'Sorry' का मैसेज किया। प्रार्थना तो जैसे इस पल का कब इंतजार कर रही थी । उसने झट ही कह दिया 'कोई बात नहीं देर आये दुरुस्त आये।'

राम:  क्या कर रही हो ?

प्रार्थना: कुछ नहीं बस बैठी थी। आज कैसे मन कर गया आपका बात करने का?

राम: एक कहानी पढ़ी थी मैंने..

प्रार्थना: कौनसी...?वो प्रार्थना वाली...

राम: हां, वो ही। पहले तो मैंने सोचा आपने कहा है उसे कहानी लिखने के लिए..लेकिन बाद में पता चला कि वो कहानी उसी से संबंधित थी।

प्रार्थना: और मैंने सोचा आपने कहा था।  चलो छोड़ो ...ओर क्या करते हो आज कल..?

राम: कुछ खास नहीं... बस, सुबह उठकर बैंक और बैंक से घर।

प्रार्थना: इतनी देर लगा दी 'Sorry' कहने में ।

राम: क्या करता तेरा गुस्सा देखकर मेरी हिम्मत ही नहीं पड़ी... कुछ बोलने की ।

प्रार्थना: मैं बाद में मान गयी थी...मैं आप से बात भी करना चाहती थी लेकिन मेरे मम्मी पापा ने ही बात करने नही दी..(आँसू निकल पड़े आँखों से)

राम: प्लीज आप रोवो मत...अब जो हो गया सो हो गया मैं आपसे एक बार ओर सॉरी मांगता हूँ..

प्रार्थना: कोई बात नहीं..पापा ने एक शर्त रखी थी कि यदि ' तुम(राम) उसको मना लेगा तो वह अपनी शादी करवा देंगे।

प्रार्थना: Thanks.. अब हम कभी जुदा नहीं होंगे...

राम: कभी नहीं...। जिसके लिए तुझे छोड़ा था वो भी छोड़कर भाग गई यार....(हस्ते हुए)

प्रार्थना:  बुधु तुझे मेरे अलावा कौन झेलेगा..कौन तेरी अकड़ सहेगा। (ये भी हस पड़ी)

राम: तूने अभी शादी क्यों नहीं की??

प्रार्थना: कैसे करती मेरी किस्मत में जो तू लिखा था। हर समय याद करती रहती थी तुझे...।

प्रार्थना: हर दिन मैसेज चेक करती थी कभी fb पर तो कभी इनबॉक्स में।

राम: मेरे ससुर जी का क्या हाल है..???

प्रार्थना: ठीक है...अब जल्दी से तगड़ा हो जा.. गिन गिन बदले लुंगी तुम से बहुत तड़फाया है रे तूने..

राम: ठीक है...मेरे बाबा...

प्रार्थना: दिन निकलने को है अब सो जा...

राम: अरे! यार आज नींद कहाँ आएगी मुझे...

प्रार्थना: सो जा अब.. पागल। चार बज गए है सुबह काम पर भी तो जाना है...हम दोनों ने।

राम: ठीक है बाबा... By...

प्रार्थना:  By By....

इस तरह प्रार्थना ने अपने पेरेंट्स को बताया और दोनों की शादी हो गयी । आज दोनों एक दूसरे को लेकर खुश है..खुशी से अपनी जिंदगी बसर कर रहे है...।

तो दोस्तो आपको यह कहानी कैसे लगी...कॉमेंट करके जरूर बताएं...

प्रार्थना के तीनों भाग एक साथ पढ़ने के लिए 9460914014 पर व्हाट्सएप करें..

लेखकः सुखचैन मेहरा # 9460914014


September 30, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

कृष्णा तेरे हाथों का स्पर्श

कृष्णा तेरे हाथों का स्पर्श
लौकिक प्रेम जगा रहा है।
सुध-बुध सब खो बैठी मैं
एक ऐसा मदसा रहा है।।

उपर से तेरा मुरली वादन
मेरे कर्णों को  वश  करे।
तेरी मुरली की ये मधुरधुन
मैं ना सुनूँ तो गश पडे।।

लोक लाज सब छोड़ कर मैं
तेरे पीछे-पीछे विचरण करूँ।
मदहोशी की सी हालत है...
अब तू ही बता मैं क्या करूँ??

-:-स्वरचित-:-

सुखचैन मेहरा 9460914014


September 26, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

खामोशी

मदहोशी सी हालत, खामोश नजरें
उनकी खामोशी शोर मचा रही थी ।
जब गुजरा था उनकी गली से मैं तो
अंतरंग में एक कहानी रचा रही थी।।

हाल इशारे से पूछा, वो फिर खामोश !
खामोश निगाहों में नीरसता नजर आई।
खामोशी पढ़ मन व्याकुलता से भरा..
कह रही थी, तू क्या जाने रे पीर पराई।।

आँखो में आँसू लिए, चले गए वो भीतर
बैचेनी ने घेरा मुझे आगे ना जाने दिया..।
सुन्न हुआ मन, मस्तिष्क, पैर ही जम गए
रब ने खामोशी का कहर कैसा बरपा दिया।।

फिर कुछ हुआ ऐसा, बस चमत्कार जैसा
बाहर घर से आ उन्होंने हमें चोंका दिया।
झट से गले लगाकर, थोड़ा सा सहलाकर
खामोशी तोड़ी कहा, था अभिनय किया।

(मार ही दिया था इस खामोशी के अभिनय ने तो)

-:-सुखचैन मेहरा-:-

September 26, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

ऋणी

मन ऋणी तन ऋणी
माँ तेरे उपकारों का।
तेरा ना उतरा मुझ से
उतार दिया हजारों का।

माँ खुदा सा दर्जा तेरा
जानता है जग सारा..।
तेरी महिमा अवर्णनीय
माँ हमारी, भाग्य हमारा।

कर्ज उतारूँ तो उतारूँ कैसे?
कुछ समझ में नही आ रहा
शायद रब भी नहीं जानता
है नही जो हमे सुझा रहा।

-:-स्वरचित-:-

सुखचैन मेहरा

September 26, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

वो बस्ती

मैं पंजाब गया हुआ था मौसी जी के पास  ।भाई (मौसी का लड़का) कहने लगा चल तुझे शहर घुमाकर लाता हूँ।
मैंने कहा चलो। ( घूमना पसंद नहीं था फिर भी साथ चल पड़ा )
हम चल पड़े। रास्ते में मैं झुग्गी झोंपड़ियों की ओर आकर्षित हो गया।
भाई पीछे से मुझे खींचने लगा, ये गरीबों की बस्ती है..और बहुत गंदगी में रहते है ये लोग ।

(पर मैंने तो जाना था तो जाना ही था...)

वो थोड़ी देर मेरे साथ चला और कहने लगा भाई तूने जाना है तो जा लेकिन मैं इससे आगे नहीं जा सकता।

मैंने कहा ठीक है तुंम चलो मैं आता हूँ...।

मैंने बस्ती में प्रवेश किया। मैं चारों ओर देखता हुआ चले जा रहा था लोग अपना अपना काम निपटाने में लगे हुए थे।

मन में कई सवाल उठ रहे थे। सरकार के वादे यहाँ आकर धूमिल हो जाते है...। हां, भवन बनायें होंगे आपने किसी अमीरों के अपनी योजनाओं से पर गरीब तो आज भी एक तिरपाल के नीचे जीवन यापन कर रहा है...(हां, इस शहर के मंत्रियों के चर्चे भी सुने थे 'बहुत काम करवाया है' लेकिन यहाँ आकर सब गुड़ गोबर हो गया।)
मैं कब बस्ती से आगे, अंतिम छोर पर पहुंच गया पता ही नहीं चला। जहां उनका कोई घर नहीं था शायद कचरा डालने की जगह थी। सच में चारों ओर कचरा ही कचरा फैला था।

एक बच्चे की रोनें की आवाज ने मुझे अपने आप से बाहर निकाला।

(एक बड़ी बहिन भी उसकी जो उसे गोद में बिठाकर चुप करा रही थी और खुद माथे पर हाथ रख कर बैठी थी, थी तो वो 5-6 साल की लेकिन वास्तव में बड़ी लग रही थी...)
मैं उनके पास गया और पूछा कि, 'बेटे ये क्यों रो रहा है. और आप यहां क्यों बैठे हो कचरे में..?

'भूखा है सुबह से खाना देने वाले अंकल नहीं आये आज । हमारा घर तो यही है..हम यहीं रहते है।'

'आपके मम्मी पापा...???'

'नहीं है....'

ये सुनने के बाद मेरा हृदय करूणा से भर गया..आँखें नम हो गयीं। ..क्या बोलता आगे मैं.. बस उन्हें खाना खिलाकर (ख़रीदकर के), उस बस्ती को निहारते हुए लौट आया ।

उस दिन के बाद जब भी मैं अपनी मौसी के पास जाता तो बस्ती वालों के  लिए जरूर कुछ न कुछ ले जाता.

-:-स्वरचित -:-
सुखचैन मेहरा


September 22, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

यादें

[1]
तेरी यादें हैं
हृदय पटल पे
उस दिन से।

[2]
यादें बसी हैं
आज भी उर मांहि
सनम तेरी।

[3]
कुछ भूले हैं
बहुत सी हैं ताजी
वो यादें तेरी।

[4]
ससुराल में
हुई ताजा वो यादें
बीते प्यार की।

[5]
जीवन जियूँ
मैं यादों के सहारे
कब तलक।

-:-स्वरचित-:-
सुखचैन मेहरा # 9460914014


September 20, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

यश

क्यों यश खो बैठा है प्राणी?
गाता था गाथा तेरी जमाना।
क्यों अब तुं उठ नहीं पा रहा
एक मौके मुश्किल था हराना।।

कहाँ खो गया तेरा वो नाम
'ईमानदार पुरुष' था शाही।
क्यों चोला ईमान का त्यागा
तुझे ढूंढ़ रहे है तेरे हमराही।

अभी भी तेरे इंतजार में है यश
लौट आ, अब तेरी है जरूरत।
बेईमान भी बेसुमार बढ़ रहे है
बस लौट आ निकाल फुर्सत।।

-:-स्वरचित-:-
सुखचैन मेहरा


September 20, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

कल्पना

पता नहीं वो कैसे होंगे?
हे मेरे मन कल्पना कर।
हँसमुख या चहुँमुखी?
ख़ास 1 संकल्पना धर।।

समझदार होंगें या नादां
या होंगे प्रेम प्रिय मित्र से
हिम से शीतल होंगे या
मोनालिसा के चित्र से।।

हे मेरे मन कल्पना कर
उ..होंगे वो विचार प्रेमी।
या होंगे वो कोमल मन
अं.. होंगे शकी , बहमी ।।

शायद होगें शीत लहर से
चुलबुले या फिर नटखटी।
वो मोहि मुस्कराहट के धनी
करते होंगे बातें चटपटी।।

या होंगे कल्पना से परे
न जाने कैसे होंगे वो..?
मन की कल्पनायें हैं.
न जाने कब पूरी होंगी?

स्वरचित

सुखचैन मेहरा


September 20, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

शहीद

(उन अमर शहीदों को तो सारी दुनियां सलाम करती है मैं भी करता हूँ लेकिन ये 'लघु कविता' उन शहीदों के लिए है जिनका नाम ही नहीं जानता कोई अलावा उस रब के।

मैं कैसा शहिद हूँ?

दब गया शरीर
मिट्टी के कणों में।
दब गया नाम भी मेरा
मिनटों में नहीं क्षणों में।

मिट्टी के कणों ने दी आहुति
उसी ने संस्कार मेरा किया
मिट्टी ने ही अर्ज करी रब से
कि एक शहीद ऒर *तेरा किया।

*रब का

बिना स्वार्थ के लड़ता गया
छाती तान आगे बढ़ कर।
देश का जज़्बा चरम पे था
सीने में दुश्मन की गोली जड़कर।

ऐ वतन के लोगों ज़रा सुनो
एक दिन मेरा भी मना लेना।
शहीदों का दीप तो हो जलाते 
बस एक मेरा भी जला देना।।

-:-स्वरचित-:-
सुखचैन मेहरा


September 20, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

पर्यावरण

राह चलते ही लड़खड़ा गया पर्यावरण। पास खड़े लोगों में से किसी को कुछ समझ नहीं आया कि आखिर पर्यावरण ऐसे अचानक लड़खड़ा क्यूँ  गया। अच्छा भला चल रहा था।

लेकिन वह अभी लड़खड़ाया ही था चलने में सक्षम था। थोड़ा आगे चला तो पता लगा कि जंगल में कई व्यक्तियों का समूह पेड़ों को काट रहा था।कुछ शहर का कचरा यहां फैला रहे थे।  जैसे-जैसे वो पेड़ों पर प्रहार करते वैसे-वैसे पर्यावरण घायल हो रहा था व कचरे की दुर्गंध भी आने लगी थी पर्यावरण के शरीर से।असामंजस्य में पड़े लोगो को धीरे धीरे घायल होता पर्यावरण इशारा करते हुए कह रहा था कि, ' देखो मेरे घायल होने का का कारण पेड़ काटना है,कचरा फैलाना है।

पर्यावरण की तबियत कुछ ज्यादा ही गंभीर होती जा रही थी।

लोगों ने चलकर उनको लोगों के ग्रुप से पेड़ न काटने व कचरा न फैलाने की गुहार लगाई । लेक़िन नहीं माने । थोडा ओर प्रयास करने पर वो मान गये ।

लेकिन अब तक पर्यावरण घायल हो कर जमीन पर पड़ा तड़फने लगा। वो कहते है न बस 100 फ़ीसदी में से 90 फ़ीसदी खत्म हो चुका था।

थोड़ी देर बाद एक चमत्कार हुआ कि पर्यावरण की तबियत में कुछ सुधार आ रहा था, धीरे-धीरे।

वो हुआ यूँ , शहर के कुछ बच्चों ने ये ठान लिया कि हम इन बड़े मूर्ख लोगों का मुकाबला नहीं कर सकते लेकिन ये जितने पेड़ काटेंगे उतने ही पौधे हम लगाएंगे।
इस तरह तबियत खराब होने में तो थोड़ा ही समय लगा (क्योंकि पेड़ तेजी से कट रहे थे, मैं पौधों की बात नहीं कर रहा हूँ,ज़नाब पौधे से पेड़ बनने में वर्षों लग जाते है ।)
लेकिन ठीक होंने में तो समय लगना ही था।

इस तरह आज भी लोग जब पेड़ काटते है, कचरा फ़ैलाते है और दूसरी ओर कोई पेड़ लगाते है, सफाई अभियान चलाते है तो पर्यावरण की तबियत में उतार- चढ़ाव लगातार आ रहा है।

चिंता का विषय ये है कि पर्यावरण की तबियत में उतार चढ़ाव यूँ ही आता रहा तो हम सब को पता ही है कि पुश-अप कब तक काम करता है । आखिर में थकना ही पड़ेगा। यदि एक बार पर्यावरण थक गया तो उसका उठ पाना लगभग असम्भव हो जाएगा। क्योंकि  पेड़ की कमीं पूरी पेड़ ही कर सकते हैं पौधे नहीं।

इसलिए पयार्वरण प्रेमी बनो... क्योंकि वो हमें निःस्वार्थ भावना से प्रेम करता है।

शुद्ध हवा का झोंका तो सब के मन को भाता है....
                           लेकिन
पर्यावरण बचाने की कसम कोई विरला ही खाता है।
कोई विरला ही खाता है...
-:-स्वरचित-:-
सुखचैन मेहरा


September 18, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

परिंदा व शिकारी

परिंदा
है बुद्धिजीवी ज़रा तरस कर
मुझे रिहा कर इस जंजीर से।..
है बुद्धिजीवी ज़रा रहम कर
बाहर निकाल सोच गंभीर से।।

शिकारी
कर्म को कैसे भूलूँ ऐ परिंदे..?
तूने कर्म कर लिया मैं करूँगा।(पिछले जन्म में)
अब दाह ना कर मेरी राह में
शिकारी हूँ शिकार करूँगा

परिंदा
मेरी मान ले एक बात ज़रा..
दम घुट रहा है रे मेरा कैद में।
उन्मुक्त गगन का पंछी का
क्या तुं रह लेगा छोटे *छेद में?।।

* निहायती छोटा सा घर

शिकारी
नहीं रह पाऊँ, प्राणी कुल का मैं
तूने जान देनी है मैंने जान लेनी।
फिर शिकारी कौन कहेगा मुझे?
छोड़ दूँ गर तुझे देख तेरी बेचैनी।

परिंदा
तो तुं ज़रा सा तरस नहीं करेगा?
मुझ बे सहारा पर, ज़रा ये बता।
मार देगा किसी के हाथ बेचकर,
ले मार दे अभी मुझे, मेरा सर झुका।।

(उस परिंदे ने अपनी गर्दन शिकारी के आगे।)

शिकारी
कोई अच्छे कर्म किये है परिंदे.
जो मेरे मन में आ गई है दया ।
जा,  उड़ जा उन्मुक्त गगन में
मानुस हूँ पहले, शिकारी न रहा

परिंदा : थंक्स (खुशी से)
मनुष्य(शिकारी): वेलकम 😊😊😊
(शिकारी तो रहा ही नहीं बेचारा हार जो गया परिंदे से)

-:-स्वरचित-:-

सुखचैन मेहरा


September 18, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

आशीष

एक राही की तमन्ना
भूखे को रोटी खिलाऊँ
उसकी भूख मिटाकर
आशीष उससे पाऊँ।

लेकिन ढूंढ रहा है एक
साफ सुथरा भूखग्रस्त
साथ में कैमरा है हाथ में
सेल्फी लेने की चाह बस।

काफी निर्धन नजरअंदाज
हो गए है उनकी और देखते हुए।
पर साफ सुथरा भूखग्रस्त कहाँ मिले
राही ने आशीष भी जरूर लेनी है।
एक फोटो लेते हुए।

एक सामने आ ही गया
एक बालक, बाबू जी भूख लगी है।
कपड़े फ़टे है साफ भी नही।
नजरें अभी भी सुथरा ढूंढने में लगी  है।

आँखो में देख निर्धनता के
उतरा भूत स्वार्थ पन का
मोबाईल जेब में रह गया।
और आशीष की अभिलाषा
भी नहीं रही।

-:-सुखचैन मेहरा-:-

September 16, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

खुश हूँ अकेला

अब गम नहीं कोई ना तेरे जाने का
ना तेरे आने की खुशी होगी कभी।
खुश हूँ अकेला, जिंदगी की राह में
अब ना आंखों में बेवशी कभी होगी।।

निपटा लूं गा वो सारे बकाया काम
जो मैंने तुम्हारे लिए छोड़ दिये थे।
माफी मांग के सांस लूंगा उनसे
दिल जिनके तेरे लिए तोड़ दिये थे।।

कितना बेरुखी से पेश आता था मैं
तेरे लिए मेरे हरेक चाहने वालों से।
पर तुझे मैंने सरआंखों पे रखा था
न सुनी किसी की  पिछले कई सालों से।

हां सच कह रहा हूँ खुश हूं अकेला
राहत महसूस कर रहा हूँ मैं आज।
मन भी हल्का हल्का सा लग रहा
तुझ से दूर होने की आहट के साथ।।

-:-सुखचैन मेहरा-:-


September 14, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

हिंदी भाषा का सवेरा

भारत रूपी क्लास में जब आंग्ल भाषा का प्रवेश हुआ।

मुख्य पात्र      : हिंदी
सहायक पात्र  : आंग्ल
अन्य पात्र       : बच्चे

इस नाटिका में

क्लास = भारत
बच्चे = राज्य

भारत रूपी क्लास में कुछ बच्चे(राज्य)आपस में रंग विरंगी पोशाक पहने एक दूसरे के साथ बैठे हुये हैं। कई काले कपडों में, तो कोई केशरिया में, कई सफेद में तो कई पीत वस्त्र धारण किये हुए है। चारों ओर खुशहाली ही खुशहाली थी। गम का नाम ओ निशां नहीं। सांस्कृतिक सप्ताह जो चल रहा था।
आंग्ल भाषा ये सब देख कर बहुत हैरान हुई। कि ये सब कैसे कितना अद्भुत है।

आंग्ल भाषा : मय आई  कम इन ...मैम.???

हिंदी भाषा। : जी, अवश्य। आपका इस क्लास में स्वागत है।

आंग्ल भाषा : थैंक यू मैम...आंग्ल भाषा ने खास लहजे से कहा (आंग्ल भाषा को कुछ समझ में नहीं आया)

हिंदी भाषा : धन्यवाद।

आंग्ल भाषा ने क्लास में प्रवेश किया।

हिंदी भाषा ने सभी बच्चों को उनकी नयी अध्यापिका से परिचय करवाया।

आंग्ल भाषा : हाऊ आर यु ..???स्टूडेंट्स..

(बच्चे मौन)

हिंदी भाषा : बच्चों आपकी नयी अध्यापिका आपका हाल चाल पूछ रही है।

बच्चे :  ठीक हैं...बहन जी।

आंग्ल भाषा : ओकेय गुड...

फिर आंग्ल भाषा ने सोचा कि इस तरह से मैं इनको कुछ सीखा ही नहीं पाऊंगी तो उसने हिंदी भाषा से हिंदी सीखने का मन बनाया । और ठीक ठाक  हिंदी सीख भी ली।

क्लासें चलती रही

(एक महीने बाद )

आंग्ल भाषा: शु प्रभा...ट बच्चों । (इनकी बोली अभी भी  आंग्ल से प्रभावित थी ।

बच्चे : बहन जी । शु प्रभा...ट नहीं होता .. सुप्रभात होता है। सब बच्चे हंसने लगे

आंग्ल भाषा : तो बच्चों आप मुझे.. भहन जी नाही..मैडम जी बोलो गए आंग्ल भाषा में ।

बच्चे : ठीक है मैडम जी।

आंग्ल भाषा : मैं आपकौ इंग्लिश विषय पढ़ाऊंगी।

बच्चे : मैडम जी ये इंग्लिश क्या होती है..,??

हिंदी भाषा : बच्चों ये एक अन्य विषय है जो आपको अंग्रजो की तरह बोलना व लिखना सिखयेगा।

इस तरह से आंग्ल भाषा ने हिंदी भाषा की सहायता से 80 प्रतिशत बच्चों पर अपना प्रभाव जमा लिया । अंत में सिर्फ एक बच्चा ही हिंदी का रह गया।

हिंदी भाषा चिन्तित रहने लगी कि ऐसे तो मुझे समझने वाला कोई नहीं रहेगा।

फिर उसने उस एक बच्चे को कहा

हिंदी भाषा :  मैं आपकी राष्ट्रभाषा हूँ मुझे समझने वाला अब तेरे सिवाय कोई नहीं रहा ।

बचा : बहन जी मैं आपके महत्व को पूरी क्लास में फैला दूंगा ।

उस बच्चे का प्रयास सफल हुआ । सभी बच्चे मूलतः हिंदी व द्विभाषी हो गए।

इस नाटकीय लेख में

क्लास = भारत
बच्चे = राज्य

तो मेरा कहना यही है कि आप अंग्रेजी भाषा सीखो लेकिन अपने पर हावी न होने दें । हिंदी भाषा को महत्व दो ।जिससे  हिंदी भाषा का सवेरा हो सके।

लेखकः सुखचैन मेहरा # 9460914014


September 14, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

हार्ड डिस्क भाग-2 के बाद की कहानी...

दिशा का भूत

आज वही काली रात थी जिस रात मधु ने दिशा का न चाहते हुए भी कत्ल कर दिया था।
मैं मधु को अपने बेड पर न पाकर परेशान हो गया और ढूंढने लगा इधर उधर लेकिन कहीं नहीं मिली। मैं पसीने से लथपथ बुरी तरह से घबरा गया। क्योंकि मधु आज सुबह से ही अजीब सी बातें कर रही थी जैसे- आज मैं दूर चली जाऊँगी...आज मैं दूर चली जाऊंगी।
सोचा था नहीं सोऊंगा आज लेकिन आंख लग ही गयी।
अब कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ?? कहाँ ढूंढू उसे ।
इतने में मधु की आवाज आई, 'यहाँ क्या कर रहे हो आधी रात के?'
एक दम से समझ नहीं आया कि मधु ने बोल क्या दिया। मैं स्तब्ध था कि ये कहाँ से आ गयी मैं तो इसे हर जगह ढूंढ आया था। मधु ने मुझे झझकोरते हुए मुझे अपनी गहरी सोच बाहर निकाला।

हाँ....हां...कुछ नई वो... ऐसे ही।

मधु थोड़ा अजीब सी लग रही। बातें भी अजीब ही कर रही थी।

चलो अंदर चलते है....मधु की आवाज जैसे मुझे डरा रही थी।

मैंने कहा चलो आप मैं आता हूँ...वो चली गयी।

मैं ऊपर छत पर चला गया। आगे जाकर देखा बैठक की लाइट जल रही थी। मैं मधु को यहाँ देखकर अचम्भित हो गया। मधु तो यहां सो रही है तो वो कौन थी।

मैंने मधु को जल्दी से जगाया....

क्या है.....सोने दो मुझे ....मुझे जाना है।

कहां जाना है आपको?? मैंने मधु को झझकोरते हुए कहा।

वो होश में आयी तो अपने आपको छत पर पा कर अचंभित हो गयी। कहने लगी मैं यहां कैसे आयी ??

मैं मधु को नीचे आने को कहा लेकिन वो ही नहीं है थी। थोड़ी देर बाद मधु आ ही गयी नीचे। मेरे जिद्द करने पर।

मैं झट से नीचे उतरा और उसको ढूंढने लगा जो मधु के रूप में नीचे थी। लेकिन वो कहीं नहीं दिखी।

मधु और मैं अपने रूम में आकर सो गये।आंख लगी गिलास गिरने की आवाज से जागा।

मेरी मां हाथ में तकिया देख हैरान हो गया । वो मधु की और बढ़ रही थी मेरे से बिना डरे। मैंने कहा मां आप ये कर रही है । मां कुछ नहीं बोली । लैंप की धीमी लो को तेज किया तो मुझे ऐसा लगा की मां नहीं दिशा है।

मैंने कहा,- दिशा तुंम??

हां मैं, मां में प्रवेशित दिशा ने कहा। तेरी मां ने रास्ते में कहा था 'आजा' तो मैं इसके पीछे-पीछे आ गयी।

तुं अब क्या चाहती है????

तुंम दोनों की मौततत.... । दिशा ने गुर्राती नजरों से हम दोनों की ओर देखते हुए कहा।

मेरी गलती है तो मुझे कुछ कहो कुछ प्लीज इसे कुछ मत कहो...

नहीं....नहीं...नच्च्च्च्च्च कभी नहीं ??भगवान भी नहीं तुंम दिनों कोooo.

मैंने रिश्तेदारों को फ़ोन लगाने के लिए जैसे ही खड़ा हुआ उसने सारी लाइटें बन्द कर दी अंधेरा ही अंधेरा हो गया कमरे में ।

चालाकी करेगा तुं ???? हैं हहहहहहह चालाकी करेगा tunnnnnnnnnnnnn हहहहहहह हैं.. कर चालाकी क़ीक़ीक़ीक़ीक़ गला रोंद के रखखख... दूंगी कहते हुए मेरे गले छाती आ बैठी..।

(मधु मुझे छुड़ाने की बार-बार नाकाम कोशिश कर रही थी...)

मेरी सांसे बंद हो रही थी सांस तक नहीं आ रहा था

वास्तव मैं अभी कुछ नहीं कर पा रहा था मैंने थोड़ा ओर आगे होते हुए दराज खोल दी। दराज खुलते ही वो बुरी तरह चिल्लाने लगी।

बंद कर इसेaaaaaa..मैं कहती हूँ बंद कर रररर दे।

पता नहीं ऐसा क्या था उसमें ।

एक दम मां को होश आया और कहने लगी क्या हुआ बेटा आप दोनों घबराए हुए क्यों हो? और मैं आपके कमरे में कैसे आयी....

नहीं मांअअ.. कुछ नहीं.. कुछ नहीं...मैंने सहज होने की कोशिश करते हुऐ कहा ।

मां अपने कमरे में चली गयी ।

अब जाकर मधु और मैंने चैन की सांस ली।

मेरी गलती की सजा आप सबको मिल रही -(मधु ने आंखे नम करते हुए मेरे कंधे पर खिल)

'अरे, नहीं दोनों एक साथ खुशी गम  सहें गे' मैंने भी उसके बालों में हाथ घूमाते हुए ।

सुबह होते ही हम दोनों एक बाबा जी के पास गए । रास्ते में मधु ने बताया कि ये वही रास्ता है जहां मेरे से  दिशा का कत्ल हो गया था। कोई और रास्ता नहीं है क्या??? मुझे तो बहुत डर लग रहा है।

मैं तो कहती हूं लौट चलते है घर वापिस- मधु ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.....

मेरे नहीं मानने पर मधु मेरा गला दबाने लगी। मैं कह रही हूँ लौट जा..जाजजज हूं

देखते ही देखते कभी दिशा तो कभी मधु का चेहरा दिखने लगा मुझे। मैंने गाड़ी रोक दी।

ओह! गॉड ये वही जगह थी जो मैंने उस हार्ड डिस्क में देखी थी। मैंने कुछ देर ओर यहां रखना मुनासिब नहीं समझा। मैं कार को आगे बढ़ाने लगा। मैंने जैसे कार में पड़ा हनुमान जी का लॉकेट हाथ लिया वैसे ही वो तिलमिलाकर चली गयी।

मधु को होश आने पर वो अपना सर पकड़कर बैठ गयी।  

आखिर में हम जैसे तैसे बाबा जी के पास पहुंच ही गये ।

(बाबा काफी देर हमसे पूछताछ करते रहे।)

अंत में उन्होंने वो दराज मैं देखना चाहूंगा जिसे बाहर निकालने पर वो वहां से जाने के लिए मजबूर हो गयी ।

जी जरूर....

वो हमारे साथ चल पड़े

बाबा ने आकर दराज देखना चाहा । लेकिन दिशा ने आकर उसे एक जोरदार  झटका दे मारा और गिरा दिया। जब बाबा ने दिशा पर वार करना चाहा तो उन्हें याद आया कि वो कुंठ (बाबा की आक्रमण करने की एक छोटी सी छड़ी) अपने भवन में ही छोड़ आये।

उन्होंने कहा आपके पास जो लॉकेट है वो मधु को दे जाओ और आप मेरा कुंठ जो मंदिर गृह में पड़ा है जल्दी करना मैं सिर्फ इससे 30 मिंट से ज्यादा नहीं टकरा सकता उसके बिन।

मधु लगातार उस दराज को खोलने का प्रयत्न कर रही थी । लेकिन दिशा उसे बार-बार दराज से दूर फेंकती रही।

बाबा ने वो लॉकेट मधु को दे दिया। लेकिन लॉकेट का दिशा पर कुछ असर नहीं हो रहा था सिवाय बाबा के मंत्रों के।(बाद में मधु के बताए अनुसार)

अब आधा घण्टा बीत चुका था । मैं अभी रास्ते में ही था । देर हो गयी मुझे पहुंचने में रास्ते में मुझे एक दबी सी आवाज  आई बचाओ...बचाओ.... ।लेकिन मुझे तो आगे देरी हो गयी थी तो मैं उस चीख को नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ गया।मैं घर पहुंचा।

बाबा लड़ते लड़ते बेहोशी की हालत में आ गए थे वो मुझे इशारा करके कुछ बताना चाह रहे थे लेकिन मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था

जब मैंने मधु को वहां न देखा तो दिमाग की टेंशन ओर बढ़ गयी।

मैंने हड़बड़ाहट में उस कुंठ को हाथ पर जोर से मार जिससे कि उस दिव्य कुंठ से एक तेज रोशनी निकली।

बाबा उस रोशनी को अपनी तरफ करने को कहा मैंने कर दिया तब जाकर बाबा को होश आया ।

बाबा बोला, 'वो तुम्हारी पत्नी को यहां से ले गयी है ....

इतना सुनते ही मेरे तो होश उड़ गए। मैंने बाबा जी को भी साथ चलने को कहा। लेकिन वो कहने लगे बेटा तुं अभी तुरन्त पहुँच जा नहीं तो बहुत देर हो जाएगी।उसने उस गली की इशारा कर दिया।

मैं अपनी कार लेकर उसी रास्ते की ओर चल पड़ा। रास्ते में मां का फ़ोन आया कि वो अभी 5-6 दिन ओर गांव से नहीं लौटेगी। ठीक है कह कर फ़ोन काट दिया।

रास्ते में मधु मिल गयी । मैंने उसे कार में बैठाकर घर की ओर चल पड़ा। मेरे फोन पर बार-बार रिंग आ रही थी । लेकिन मैंने नहीं उठाया क्योंकि मैं अभी घर पहुंचना चाहता था बस।

आखिर मैंने फोन उठा ही लिया वो किसी ऒर  का  नहीं  बल्कि उसी व्यक्ति का था जिसने मुझे वो हार्ड डिस्क दि थी।

वो कहने लगा जो तुम्हारे साथ है वो मधु नहीं है..और...। इतना सुनते ही मेरे हाथ से फोन गिर गया...

अब वो(दिशा) मुझे देख कर हंसने लगी.. हा ही  हीहीहीही.... मैंने मधु को तो मौत के घाट उतार दिया हाईई इईई हा हा हा.. अब तुझे भी इईई मरना होगा hihi.. हहाहहा हा...।

मैंने कहा मार दो मुझे भी अब मैं जिंदा रहकर क्या करूँगा..?? मार दो मुझए भी...मैं रोने लगा ।

इतनी आसानी से नहीं मारूंगी तुझेझेझे....वहीं लेजा कर मारूंगी जहां मैंने तुम्हारी प्यारी मधु को मारा है...

मैं बिना किसी विरोध के उसके साथ चल पड़ा......

हम गन्तव्य स्थान पर पहुंचे.. ये देख तेरी मधु.......उसने पेड़ के नीचे हाथ करते हुए कहा .... लेकिन वहां तो कोई नहीं था..। मैं समझ गया कि मधु जिंदा है मैं भी वहाँ दे भागने लगा लेकिन उसने मुझ पर अपने नुकीले नाखूनों से हमला कर दिया।

उसने मेरा गला जोर से दबा दिया.. मेरा सांस बन्द होने को थे..तुझे तो आज मैं मारकर ही छोडूंगी मैं.. एं....वो पता नहीं कैसे बच गई ईईई...

मैं बताता हूँ कैसे बची ये???

(दिशा ने एक दम से बाबा की ओर देखा)

जब दीपक(मैं) वो कुंठ लेकर मेरे पास पहुंचा तो मैंने उसे तेरी तरफ भेज दिया ताकि तेरा सारा ध्यान इस पर रहे और जिसे तुम मधु समझ रही थी वो मेरा ही एक छलावा था। मधु को मैंने तेरी आँखों में धूल झोंक यहीं इसी घर में रख लिया। ताकि हम दोनों उस दराज में क्या था वो देख सकें ।

(मधु भी वहां आ गयी )

दिशा ने अपने पूरे जोर से मेरा गला दबा दिया बस मेरे प्राण बस जाने को थे लेकिन मधु ने उस दराज से निकाला हुआ ताबीज उसके सामने कर दिया जो  कभी दिशा ने मुझे ये कह कर दिया था कि,"ये ताबीज़ मैं तेरे लिए लाई हूँ ये मुसीबत में तुम्हारा साथ देगा। कोई भी तुझे नुकसान पहुंचाना चाहेगा उसका पहले नाश हो जायेगा।

ओर हुया भी ऐसे  जैसे-जैसे मधु उस ताबीज़ को उसके नजदीक लाती गयी वैसे-वैसे वो चीखती चिल्लाती हुई मिट्टी में विलीन हो गयी इस लिए वो माता रानी का वरदान खुद के लिए ही श्राफ बन गया ।

आयो चलते है... मधु ने कहा

है भागवान, मेरा नाम ले लिया कर नहीं तो मां की तरह किसी ऒर भूत को पीछे लगा लेगी।

हम सब हंस पड़े।

इस तरह दिशा के भूत का अंत हो गया और मैं और मधु एक बार फिर पहले जैसा खुशी भरा जीवन जीने लगे।

लेखक: सुखचैन मेहरा  # 9460914014


September 09, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

जिंदगी की साईकल

अपनी दोनों की जिंदगी भी
इस साईकल सी चल रही है
कभी चैन उतर जाती है (बीमारी)
तो कभी हवा (अपने लोग)
ही साथ छोड़ देती है....
लेकिन सुकून की बात है कि
हम दोनों के सामंजस्य से
लगातार चल रही है....

-:-सुखचैन मेहरा -:- 9460914014


September 07, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

पोस्टपेड मीडिया

पोस्टपेड होने लगा क्यूँ मीडिया
क्या जमीर मिट गया है तेरा ?
तुं चाहे तो भृष्टाचारी को डुबा दे
कोई  क्या बिगाड़ ले गा तेरा??

तेरी ताकत को गर तू जान ले
तेरी होड़ करने वाला कोई नी।
गर बिकना ही चाहता है तो
तेरे जैसा बेईमान भी कोई नहीं।।

करे गर ताकत का सही उपयोग
तेरे जैसा कोई क्रांतिकारी नहीं।
गर पैसों के पीछे दौड़ेगा तो
तेरे जैसा कोई बिखारी भी नहीं।।

सच को उजागर करना काम तेरा
हा, बस इसी राह पर चलता जा।
सच्चा राजदूत है किसी भी देश का
अपना कर्तव्य निभा और बढ़ता जा।।

टिकी है उमीदें भारत की तुझ पर
एक तुं ही है जो करेगा संघर्ष ।
सच्चा देश भक्त नही होगा कोई
तुझसा तुझे नमन करूँ सत सत।।

मेहरा क्रिएशन


September 04, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

रात परदेशी  (एक नारी अंतरात्मा की तड़फ)

डायरी लिखने में मग्न राज के कानों में एक आवाज पड़ी, ‘बेटा तेरे पापा कहाँ है’ ?? राज ने कोई जबाब नहीं दिया, दुबारा पूछने पर..... उसने बिना पीछे देखे कह दिया, ‘माँ, पापा तो ड्यूटी पर है न अपनी... आपको तो पता ही है.’| फिर अचानक राज को याद आया माँ तो गाँव गई हुई है तो ये कौन है..?

राज ने पीछे मुडकर देखा तो कोई नहीं था वो थोड़ा घबरा गया था |

तुम घबराओ मत मैं तुझे कोई नुकसान नहीं पहुँचाने आयी हूँ |

मैं तो तुम्हें सिर्फ ये बताने आयी हूँ की रात का एक बज रखा है तेरी औरत तेरा इंतजार करती सो गई लेकिन तू अभी तक ये डायरी लिख रहा है|

राम : तो आप कौन हो..(राज ने चारों ऑर नजर घुमाते हुये सहमी सी आवाज में बोला)?

आत्मा : मैं आज से 5 साल पहले इधर पास ही गाँव में किसी गैर के साथ पकड़ी गयी थी तो गाँव वालों ने मुझे गाँव से निकाल दिया और मैंने शहर आ कर रेलगाड़ी के आगे कूद कर अपनी जान दे दी | मेरा पति हमेशा बाहर रहता था| महीनें में दो-तीन दिन ही घर आता था | अब तुम तो लेखक हो तुम्हें तो सब मालूम है कि पति दिन परदेशी हो तो चल जाता है लेकिन रात परदेशी हो तो बुरा हाल हो जाता है एक औरत का।
यही कहने आई थी | आपकी पत्नि को देख मुझसे रहा नी गया और में आ गयी अब मैं हर घर जाकर ये सन्देश दूंगी तू मेरी इस कहानी को लिखेगा ना|

राम : हां जरुर (राज ने जबाब दिया)
अब पता चला वह कोई बुरी आत्मा नी थी एक नारी के अंतरात्मा थी ।

अब डायरी लिखना बंद करके वो सीधा अपने कमरे में गया और उसके बाद से कभी 10 बजे से ऊपर उसने डायरी या अन्य काम नहीं किया |

लेखक: सुखचैन मेहरा सम्पर्क सूत्र: 9460914014


September 04, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

मैं गुरु हूँ दीपक सा

मैं गुरु हूँ दीपक सा
चाहे खुद मैं जलता रहूँ।
पर जिंदगी की कठिनाइयों में
तुझे आंच तक न आने दूँ।।

मैं मानुस हूँ सुलझा सा
ना तुझे उलझाना चाहूं।
सब तेरे फायदा का होगा
चाहे तुझे डपटकर पढ़ाऊँ।।

कुछ ऐसा मत करना तुंम
कि लोग मुझे भी बुरा कहे।
कुछ ऐसा मत करना बेटा
सम्मान तेरा भी ना रहे।।

गुरु-दक्षिणा यही होगी मेरी
तेरी प्रसिद्धि का समाज धरूँ।
तुंम करना कुछ ऐसा बेटा कि
तुझे शिष्य बताकर मैंनाज करूं।।

मैं गुरु हूँ दीपक सा
चाहे खुद मैं जलता रहूँ ।
पर संघर्ष भरी जिंदगी में
तुझे आंच तक न आने दूँ।।

सुखचैन मेहरा # 9460914014


September 04, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

कुछ लाइनें व शायरी -2

गुम हो जाती हूँ कभी कभी "पहले प्यार" की यादों में, फिर मरजानी सासू मां मेरा कंधा सहलाकर कहती है....'बहु रशोई में जागे..रोटी पकाले...'।।

सोचा था भूल जाऊंगी तुझे अपने ससुराल जाकर
तेरी जन्मदिन की बधाई ने यादें फिर ताजा कर दीं।।

मेरा मन करता था तुझसे बिछड़ने से पहले ही मुख मोड़ लूं ,
लेकिन तेरी यादों का काफिला मुझे चारों ओर से घेर लेता।।

इतना आसान नहीं है किसी को पा कर खो देना।
दर्द रह-रह कर उठता है, सीने में ज़नाब।।

हद से ज्यादा उदास नहीं हो सकती मैं उनसे
क़्योंकि।मेरे उदास रहने से उनके कई आंसू बे वजह छलक जाते है

✍सुखचैन मेहरा # 9460914014


September 04, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

कान्हा तेरी मुरली का जादू

कान्हा तेरी मुरली का
ये कैसा जादू ??
चाहकर भी कर न पाएं
हम खुद पर क़ाबू।।

तेरी मुरली की मधुरधुन
करे मुझे गुमसुम।
पहले मैं जाऊं.. पहले मैं..
छिड़े गोपियों में जंग।।

भाता है तेरा नटखटी भाव
बतियाने को करे मन।
सब कुछ किया वश में मेरा
तन मन और धन।।

या तो बन्द कर मुरली वादन,
या बनो आँखो के उद्दीपन।
जन्माष्टमी के इस पावन पर
हर लो सब के व्याकुल मन।।

सुखचैन मेहरा # 9460914014


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