Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on September 26, 2018 with No comments
खामोशी
मदहोशी सी हालत, खामोश नजरें
उनकी खामोशी शोर मचा रही थी ।
जब गुजरा था उनकी गली से मैं तो
अंतरंग में एक कहानी रचा रही थी।।
हाल इशारे से पूछा, वो फिर खामोश !
खामोश निगाहों में नीरसता नजर आई।
खामोशी पढ़ मन व्याकुलता से भरा..
कह रही थी, तू क्या जाने रे पीर पराई।।
आँखो में आँसू लिए, चले गए वो भीतर
बैचेनी ने घेरा मुझे आगे ना जाने दिया..।
सुन्न हुआ मन, मस्तिष्क, पैर ही जम गए
रब ने खामोशी का कहर कैसा बरपा दिया।।
फिर कुछ हुआ ऐसा, बस चमत्कार जैसा
बाहर घर से आ उन्होंने हमें चोंका दिया।
झट से गले लगाकर, थोड़ा सा सहलाकर
खामोशी तोड़ी कहा, था अभिनय किया।
(मार ही दिया था इस खामोशी के अभिनय ने तो)
-:-सुखचैन मेहरा-:-

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