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दो दिन का मेहमान
बस दो दिन की है जिंदगानी मेरी, मौत दस्तक दे चुकी है।
बस दो दिन का मेहमान हूँ मैं, ये मौत मुझ से कह चुकी है।।
बहुत दिनों से कुछ बातें जहर बनी हुई है मेरे मस्तिष्क में।
अंतिम समय आ चुका है मेरा, ये मौत मुझसे कह चुकी है।।
कुछ हसीन लम्हें ही रक्षक बने हुए थे मेरे जिंदा शरीर के।
अब वो भी धूमिल हो चुके, अब राख ही बाकी रह चुकी है।।
मैं पसंद नहीं था तेरी, बाबुल ने तेरी जिंदगी खराब कर दी।
ये खटक रही थी जहन में मेरे, अब आँखों से बह चुकी है।।
वैसे तो रोज, पल - पल मरता हूँ मैं, तुझसे नाराज हो कर।
कब तक मरता रहूंगा मैं यों, नहीं बाकी मुझ में रह चुकी है।।
हा, हो सके तो थोड़ा सुकून पहुँचा देना मुझे गले से लगाकर।
गुंजाइश है तो वरना मौत तो अपना अंतिम निर्णय ले चुकी है।।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा
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मैं हंसना भूल गयी - नुपूर 'नवीन '
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