April 28, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in
जल संरक्षण

जल संरक्षित नही किया तो 
पानी की बूंद को तरस जाएगा।
एक बून्द पानी नहीं रहा तो
तू प्यासा ही मर जायेगा।।

दिन प्रतिदिन घटता पानी 
चिंता का विषय बन गया है।
गंदगी का पानी मे गिराना 
एक अभिशाप सा बन गया है।

पोखरों से वाष्प लेकर 
फिर बादल वर्षा करते है।
अगर पोखर ही नही रहे तो
वर्षा बिन देखना लोग कैसे मरते है।

बून्द बून्द कर बचा लो पानी
हा यही सही है हमारे लिए ।
नही तो भुगतना पड़ेगा नव पीढ़ियों को
पाप जो हमने किये।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा
April 15, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in

दो दिन का मेहमान

बस दो दिन की है जिंदगानी  मेरी, मौत दस्तक दे चुकी है।
बस दो दिन का मेहमान हूँ मैं, ये मौत मुझ से कह चुकी है।।

बहुत दिनों से कुछ बातें जहर बनी हुई है मेरे मस्तिष्क में।
अंतिम समय आ चुका है मेरा, ये मौत मुझसे कह चुकी है।।

कुछ हसीन लम्हें ही रक्षक बने हुए थे  मेरे  जिंदा शरीर के।
अब वो भी धूमिल हो चुके, अब राख ही बाकी रह चुकी है।।

मैं पसंद नहीं था तेरी, बाबुल ने तेरी जिंदगी खराब कर दी।
ये खटक रही थी जहन में मेरे, अब आँखों से बह चुकी है।।

वैसे तो रोज, पल - पल  मरता हूँ मैं, तुझसे नाराज हो कर।
कब तक मरता रहूंगा मैं यों, नहीं बाकी मुझ में  रह चुकी है।।

हा, हो सके तो थोड़ा सुकून पहुँचा देना मुझे गले से लगाकर।
गुंजाइश है तो वरना मौत तो अपना अंतिम निर्णय ले चुकी है।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


April 12, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in
मेरा गांव

सूरज की आभा महान
रोज सो कर उठता इंसान
चिड़िया चहके उन्मुख गगन 
मनोहारी होती जहां की सांझ
मुझे याद आया मेरा गांव ।
जहा मिलती थी ठंडी छांव
पनिहारिन की मोहनी मुस्कान
खिलते हुए खेत खलिहान
मुझे याद आया मेरा गांव
वो चंपू अंकल की दुकान
चुरा लाते थे चुपके से समान
स्वच्छ हवा, स्वच्छ आसमान
मुझे याद आया मेरा गांव।
खुली सड़के, खुले मैदान
जिंदगी जीते है लोग जहां
गौ है माता जहां की
पत्थर भी है पूजनीय वहां
मुझे याद आया मेरा गांव।
अनुभव है चौपालों की शान
सलाम करता हर इंसान
आदर, सत्य, और संस्कार
कूट कूटकर भरे है जहां
मुझे याद आया मेरा गांव।
हर गरीब अमीर के चेहरे पर मुस्कान
असंतोष नही पल भर का जहां
खुश रहते है परिवार में रहकर
है नहीं जहा दुख का नाम
मुझे याद आया मेरा गांव।

स्वरचित
-:-सुखचैन मेहरा-:-
April 06, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
-:-क्यों नहीं चाहते?-:-

साफ स्वच्छ रहना सब चाहते है  कोरोना कोई नहीं चाहते
सुविधाएं सब चाहते है, सरकार का होना क्यों नही चाहते?

फरमान है देश की सरकार का, मत निकलो घर से बाहर
घूमते कुछ बेवजह बाजारों में,  घर रहना क्यों नहीं चाहते ?

बढ़ रही है तादात कोरोना के मरीजों की देश मे दिनों दिन
छुपा रहे है बीमारी को कुछ, जांच कराना क्यों नहीं चाहते?

बुद्धिजन गए थे वतन छोड़कर विदेशों में, नतीजा सामने है
गए तो गए वायरस ले आये,  वहा रहना  क्यों नही चाहते ?

माना घर लौटना चाहते है ये लोग जो वर्षो से दूर थे घर से
किसी ने नही संभाला उन्हें, संभालना  क्यों  नही  चाहते?

हा पालन किया है जनता ने फरमान  का थालियां बजाकर
घरों में बजानी थी गलियों में नहीं, समझना क्यों नहीं चाहते?

नही मालूम क्या चाहती है  जनता? क्या जहन में चल रहा है?
किंतु फैल जाए कोरोना पूरे देश में, कुछ यों ये हम नहीं चाहते।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा

Bookmark Us

Delicious Facebook Favorites More Stumbleupon Twitter

Search