October 31, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

ऐतबार नहीं करना किसी पर आँखे बंद करके, वो आँखे अकसर खुल जाया करती है, धोखा खाने के बाद.......


ऐतबार करके देखा था एक इंसान पर, पर उस पर ऐतबार करके ऐतबार पर ही ऐतबार नहीं रहा.....।

ऐतबार की दुनियां भी अजीब है दोस्तों, वो हमें


टुकड़े टुकड़े करके काटवाते रहे, किसी गंभीर बीमारी


का हवाला देकर...जब डॉक्टर की रिपोर्ट पढ़ी तो
रिपोर्टर नॉर्मल निकली।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014

October 31, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

 हमसफर - 3

ऐ मेरे हमसफर ऐतबार कर
मेरी कुछ अनकही बातों का।
ऐ मेरे हमसफर ऐतबार कर
तेरे मेरे बीच के जज़्बातों का।।

ऐतबार पर कायम है ये दुनियां
बिन ऐतबार प्रेम-कल्पना नहीं।
ऐतबार से ही सुदृढ़ बने रिश्ते
बे बुनियाद  शक  पर  नहीं।।

जिंदगी इम्तहान ले जब कभी
तुम साथ रहना मेरे हमसफर।
ऐतबार करना  ऐ  मेरे हमदम
सुख चैन से गुजरे ये सफर।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


October 29, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

अध्यात्म

चाक चौबंद की दुनियां में
मानव कहीं खो सा गया है ।
मोह माया से घिर गया है
अध्यात्म से दूर हो गया है।।

मानव को शायद पता नहीं
किराए का घर है ये दुनियां।
अनजान है इस बात से भी
अध्यात्म बिन अधूरी है दुनियां।

अध्यात्म ही मन शुद्धि का मार्ग
आत्मा-परमात्मा मिलन कराये।
भूख पर खाना, प्यास पर पीना
मोक्ष के लिए अध्यात्म अपनाएं।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


October 28, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

गुंजन: भाग तीसरा

वैसे तो काॅलेज खुले हुऐ काफी दिन हो गये थे लेकिन गुंजन का आज काॅलेज में पहला दिन था।

गुंजन ने काॅलेज के गेट में माथा टेकते हुए प्रवेश किया। पाठशाला को मंदिर समझने वाली गुंजन के लिए काॅलेज का वातावरण बिल्कुल अलग था। क्योंकि इक्की-दुक्की लड़कियों को छोड़कर सभी ने जिन्स टाॅप व चाम-चटकिले कपडे़ पहने हुये थे।

गुंजन ने जहां-जहां भी अपनी भी अपनी नज़र दौड़ाइ वह सब कुछ गुंजन के लिए सब नया था। जैसे एक लड़का-लड़की का बिल्कुल नजदीक बैठकर आपस में बातें करना, एक दूसरे को यार-यार... कहकर संबोधित करना सब कुछ।

गुंजन पढ़ाई के इस नये मंदिर में आकर बस मानो खो सी गई थी। फिर काॅलेज की कुछ सीनियर लड़कियों ने उसे ख्यालों की दुनियां से “ओ.....! हेल्लो मेम।” कहकर बाहर निकाला।

‘हेल्लो, मेम ध्यान किधर है आपका हमारे ऊपर चढोगी क्या। (वो ऐसा हुया ना ख्यालों में गुंजन इतना खो गई थी कि बस दो सेकण्ड की देरी हो जाती तो टकरा जाती।)
‘सॉरी! सॉरी!’ गुंजन ने जबाब दिया।
‘इधर आयो हमारे पिछे‘ । उनकी ग्रुप लिडर ने गुंजन को कहा।
‘जी!‘
‘यहां बैठो।‘ ( निचे बैठने को कहा)
गुंजन वहीं निचे घांस पर ही बैठ गई। गुंजन को यह सब थोड़ी देर बाद में समझ आया की यह उसकी रैगिंग पर है

‘क्या नाम है आपका? ‘

‘जी, गुंजन।‘

अरे! यह तो वही है जो जिलेभर में प्रथम आयी थी। उन में से किसी एक ने कहा।

अरे! हां यार । हम टाॅपर के साथ ऐसा बर्ताव  नहीं कर सकते।

यार! हम टाॅपर के साथ फन तो कर ही सकते है।
(सीनियरस् ने बगीचे में बैठे एक लडके की तरफ इशारा करते  हुये कहा।

गुंजन आपको हमारी एक और बात माननी पडेगी ।
‘जी बोलिये।’

लो ये पहन लो (गुंजन ने उनकी दी हुई आँखें व दान्त पहन लिये और उनके कहेनुसार उस लड़के की तरफ बढ़ने लगी।)

गुंजन को यह सब अजीब सा लग रहा था। क्योंकि सब लोग उसे देख कर हस रहे थे। वह लडका पार्कबैंच पर अकेला ही बैठा था और मैग्जीन पढ़ने में लीन था।

जब गुंजन चलते हुए उस लड़के के पास पहुंची तो किसी एक ने उसे उस लड़के पर धक्का दे दिया। अब उस लड़के सामने मैग्जीन की जगह गुंजन का भूतनी वाला चेहरा था। लड़का एक दम से घबरा गया था। क्योंकि उन्होनें इनके बाल भी खोल दिये थे।

उपर से गुंजन उस लड़के के डरे हुए चेहरे को देखकर जोर जोर से हंसने लगी । जिससे वह और ज्यादा डर गया। उस लडके को गुंजन की हंसने की आवाज एक भूतनी के हंसने जेैसे लग रही थी। हा..... हा...... हा.....ई...... ई....।

लड़का डर के मारे उठकर भागने लगा तो गुंजन ने उसका हाथ पकड़कर उसे रोक लिया। तब उस लड़के ने अपने चारों ओर देखा तो उसे सब कुछ समझ आया कि ये उनसे फन कर रहे थेे। लड़का भी यह सब देखकर हंसने लगा।

अब काॅलेज के क्लासेज शुरू होने का समय हो गया था। सब लोग अपने अपने क्लास रूम में चले गये। क्लास में जाने के बाद पता चला की वह लड़का भी इसी क्लास में पढता है।

गुंजन लगातार उस लड़के की ओर देखकर  होंठ दबाकर हंस रही थी। वह अपनी हंसी रोक नहीं पा रही थी। लेक्चर ने गुंजन को देख उसे खड़ा होने को बोला। गुंजन थोड़ा घबरा गई थी।

‘पहला दिन है आपका’

‘जी सर।’

‘चलो बैठ जाओ। आगे से ध्यान रखना ।

‘ठीक है, सर।’  गुंजन बैठ गई।

क्लास में सिर्फ 15-20 छात्र-छात्राऐं  ही थे (कुछ अनुुपस्थित थे तो कुछ ने क्लास में ही नहीं आये)  जबकि 40 की तदार थी क्लास में तब गुंजन को पता चला कि यहां सब अध्यापक डर से नहीं बल्कि अपने मर्जी से पढ़ते है।

गुंजन उस लड़के से सॉरी कहने की सोच ही रही थी कि वह लड़का अपनी साइकिल से बाहर जाता दिखाई दिया।

गुंजन घर पहुंची तो मन ही मन मुस्करा रही थी क्योकि वह वो वाक्य भूल ही नहीं पा रही थी। इस बार तो वह अपनी हंसी को रोक ही नहीं पाई। वह जोर से हंस पड़ी।
‘क्या हुआ?’ गुंजन की माँ ने एक खास लेहजे पूछा।

‘नहीं माँ, कुछ नहीं।’

‘फिर भी....’

तब गुंजन ने उन्हें काॅलेज का पुरा वाक्य बताया। उसकी माँ ने हंसते हुए कहा आपने सॉरी बोला उन्हें ।

नहीं माँ, वो पहले चला गया । कल जरूर जाके बोलना।
ठीक है, माँ।

गुंजन रात का खाना खाकर अपने कमरे में सोने के लिए गई लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी उसकी आँखों के आगे तो बस उस लड़के का डरा हुआ चेहरा था।

वह सोच रही थी कि कैसे यह रात कटे और उनसे सॉरी बोलूं। फिर उसे बड़ी मुस्किल से ही सही नींद तो आ ही गयी।

सुबह देर से सोने की वजह से वह रोजाना के समय से देर से उठी तो वह जल्दी-जल्दी खाना खा काॅलेज पहुँची। काॅलेज पहुँचते ही गुंजन की आँखें उस लड़के को ढुंढने लगी। वह रोज की तरह उस वहीं उसी उसी जगह बैठा था। गुंजन उस लड़के के पास जाकर बैठ गयी। जब लड़का कुछ नहीं बोला तो वह खुद ही बोल पड़ी, ‘वो कल के लिए सॉरी!

नहीं-नहीं कोई बात नहीं। सब ठीक है..

मेरे को नींद ही नहीं आयी रात को । गुंजन ने कहा।
मै भी कहां सो पाया हुँ रात को जब भी आँख लगती तो तेरा वो भूतनी वाला चेहरा सामने आ जाता था। कल तो मैं बहुत डर ही गया था।

फिर बातचीत में पता चला कि उसका नाम सुजल है और वही उसकी तरह टाॅपर था। इस प्रकार गुंजन का रहने का तरीका पढ़ने का टाईम टेबल सब चैन्ज हो गया। कुछ दिन बाद काॅलेज में फंक्शन  था।

सुजल व गुंजन ने डांस प्रतियोगिता में भाग लिया और उनकी अच्छी तैयारी का ही नतीजा था कि वह डांस प्रतियोगिता में अव्बल आये। इसके बाद उन्हें पुरस्कार दिया गया। इस दौरान दोनो का एक साथ फाॅटोशूट भी किया गया। गुंजन उस फाॅटोशूट की एक काॅपी अपने पास अपनी किताब में रख ली।

गुंजन को पता नहीं क्या हो गया था अकेली ज्यादा रहने लगी थी। गुंजन अपने कमरे की कुण्डी लगाना भूल गयी और अपनी किताब में से वह सुजल की फोटो निकालकर देखने लगी।

इतने में गुंजन की माँ बिना दरवाजा खटखटाये कमरे मे आ गई और गुंजन उस फोटो को छुपा नहीं सकी। जब गुंजन की माँ ने उससे वह फोटो ली और पूछा बेटा यह कौन है? माँ ये वही लड़का है जो मेरे साथ डांस प्रतियोगिता में अव्बल आया था।

गुंजन की माँ थोड़ा सोच में पड़ गयी। गुंजन अपनी माँ की सोच को भांपते हुए कहने लगी ‘माँ, कोई ऐसा काम नहीं करूंगी जिससे आपकी इज्जत पर आन पडे।

गुंजन की माँ ने अपने भाई(गुंजन के मामा) को यह फोटो वाली बात दी।

परीक्षा परिणाम भी हमेशा की तरह अच्छा ही रहा।

 इस तरह गुंजन के काॅलेज वो तीन साल भी बीत गये।
गुंजन की माँ ने गुंजन से कहा कि, ‘बेटा अब तेरी शादी की उम्र हो गयी है।

तेरी नज़र में कोई लड़का है तो बता दे। नहीं माँ आप मेरी शादि जहां भी करेंगे मैं वही हंसी खुशी कर लूंगी। आप मेरी माँ है आप मेरे लिए कोई अच्छा लड़का ही ढुंढोगे।

तो फिर यह फोटो देखकर बता कैसा है ??लड़का । गुंजन ने फोटो को बिना देखे ही हां कह दी और यहां गुंजन ने यहां अदाकारी का भी उदाहरण पेश किया।

घर वालों को कहीं भी ऐसा नहीं लगा की गुंजन इस रिश्ते के लिए थोडा हिचकचा रही है......। अब देखते गुंजन भाग-चौथे में क्या होगा।

लेखकः- सुखचैन मेहरा


October 26, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

  सरहद पर है चांद मेरा

सोभाग्यकांक्षी
सरहद पर है, मेरा चांद
वियोग मुझ पर है भारी।
करवाचौथ आया है पिया
घर आने की करो तैयारी।।

चिरंजीवी
कैसे भूल जाऊं फर्ज मेरा,
लाखों चाँदों की जिम्मेदारी।
सरहद से नहीं लौट पाऊंगा
मत करना प्रतीक्षा हमारी।

सोभाग्यकांक्षी
जला रही है वीरहाग्नि मुझे
बताओ कैसे मैं बच जाऊँ।
न दिन में चैन न रात को नींद
कैसे तुम बिन दिन बिताऊँ।।

चिरंजीवी
हिन्द वतन के है हम रखवाले
तुम हो एक भारतीय पतिव्रता।
कैसे कर दे हवाले दुश्मन के ,
हिन्द का एक छोटा सा टुकड़ा।।

सोभाग्यकांक्षी
खुश हूँ मैं तुम्हे प्यार है हिन्द से
मैं भी हूँ सरहदी शेर की नारी।
लाखों के सुहाग सुरक्षित रहें,
निभाये मेरा सुहाग जिम्मेदारी।।

चिरंजीवी
ओह! प्यारी आ रहा हूँ मैं घर
मख़ौल ज़रा सा किया है प्रिय।

सोभाग्यकांक्षी
आओ पिया तुम देर न लगाओ
इंतजार कर रही है छलनी प्रिय।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


October 26, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

आघात लगा है मर्म मेरे को
तेरे रूठ, जाने से मेरे सनम।
बढ़ गया तो शायद मैं न रहूँ
अकेला छोड़ दो करो रहम।।

क्या सोच प्रीत मैंने लगाई थी
तुमसे, नतीजा जहन में न था।
न जाने क्यों झुक गया मैं जो
किसी के आगे झुका ही न था।।

जीवन का मर्म भी छुपाया नहीं
तुझ से सब खोल कर रख दिया।
हमेशा तेरा ही भला सोचा मैंने
पर.. तूने मुझे क्या सिला दिया।।

लौट आओ आज भी मैं तेरा हूँ
किया है व्रत तेरे नाम का प्रिया।
चौथ माता का वास्ता है तुम्हें ,
कार्तिकमास, कृष्ण चतुर्थी प्रिया।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


October 25, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

जब तुम नजरों के सामने होंगे
मुझे इंतजार है उस पल का।
जिस क्षण तुम मेरे हो जाओगे
मुझे इंतजार है उस क्षण का।।

नजरों में कैद कर लूंगा हर पल
को जो साथ तेरे बिताऊंगा मैं।
मेरी खुशी सातवें आसमान पे
होगी जब तुझे अपमालूँगा मैं।।

सपनों की दुनियां में खोया हूँ मैं,
वास्तविकता से काफी दूर हूँ मैं।
न जाने तुम किस क्षण मेरे होंगे,
इंतजार करने पर मजबूर हूँ मैं।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


October 25, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

ये है आज की 'कृत्रिम खुशी'
लम्हें बीत जाने का डर है बस।
सब मिलकर एक स्वचित्र लें,
रह जाएंगी ये चार यादे बस।।

आज का जमाना अन्तरजाल का
मन की भावनाएं हो रही है अस्त।
मिलकर रहना, सपना हुआ अब
सब है घर अपने-अपने में मस्त।।

कृत्रिम खुशियों के सहारे कब तक
जीवन व्यतीत करते रहेंगे हम सब।
असल खुशी में शरीक होते रहेंगे,
हमें मौका मिलेगा हजूर जब जब।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


October 25, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

करवा चौथ का दिन
कैसे बिताऊँ तेरे बिन
कुमकुम सजाए बैठी हूँ
एक आस लगाए बैठी हूँ
यूँ ना तड़फाओ
है साथी घर वापस जल्दी आओ
विरहाग्नि में जल रही हूँ
तुम बिन अकेली विकल रही हूँ
मुझे यूँ ना जलाओ
है साथी घर वापिस जल्दी आओ..
कुमकुम पूछे कहाँ है साथी?
रह नही गयी अब मुझमें बाकी
जरा कठोर दिल पिगलाओ
है साथी, घर वापिस जल्दी आओ..
वीरहाग्नि हुई  मध्दम
कर प्रिय दर्शन,
ओह! प्रिय, क्या हालत बनाई
तू क्या जाने पीर पराई..
चलो प्रिया, शशि निकल आया
मेरा शशि तू है प्रिय , वो है पराया ।
चौथमाता का शुक्र मनाया
था उसका पिया घर आया..

स्वरचित
सुखचैन मेहरा

October 24, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

दस्तक दे रही तेरी बेरुखी
तेरे इनकार की,
लेकिन हमें तो उम्मीद थी
बस तेरे ही इकरार की,
या फिर कोई मजबूरी है
तेरी नजरें जो झुकी पड़ी है।
खामोशी की हालत में
मेरी सांसे ही रुकी पड़ी है।
दस्तक उदासी की क्यों है
तेरे हंसते हुए चेहरे पर।
क्यों नूर की दस्तक नहीं
तेरी आँखों के पहरे पर।।
चलो तुम जहां भी रहो
खुश रहो यही दुआ है।
ये सब के साथ होता है
जो आज हमारे साथ हुआ है.

स्वरचित
सुखचैन मेहरा : 9460914014


October 24, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

पता नहीं वो कैसे होंगे?
हे मेरे मन कल्पना कर।
हँसमुख या चहुँमुखी?
ख़ास एक संकल्पना धर।।

समझदार होंगें या नादां
या होंगे प्रेम प्रिय मित्र से
हिम से शीतल होंगे या
मोनालिसा के चित्र से।।

हे मेरे मन कल्पना कर
उ..होंगे वो विचार प्रेमी।
या होंगे वो कोमल मन
अं.. होंगे शकी , बहमी ।।

शायद होगें शीत लहर से
चुलबुले या फिर नटखटी।
वो मोहि मुस्कराहट के धनी
करते होंगे बातें चटपटी।।

या होंगे कल्पना से परे
न जाने कैसे होंगे वो..?
मन की कल्पनायें हैं.
न जाने कब पूरी होंगी?

स्वरचित

सुखचैन मेहरा

October 21, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

बेटा हो तो ऐसा


राजू एक बहुत ही मेहनती और ईमानदार लड़का था। राजू पढ़ाई के साथ साथ अपने पिता जी के काम में भी हाथ बंटा देता।

एक दिन राजू के पापा की तबियत खराब हो गयी। वह कई दिन तक दुकान पर नहीं गये इस कारण सेठ ने उनकी जगह किसी ओर को रख लिया था। (दीपावली पर ग्राहकी अधिक होने के कारण । )

राजू और उसकी माँ अखबार के लिफाफे तैयार करने लगे लेकिन घर और दवा का खर्च नहीं चल पाता था।

राजू को दीपावली की छुटियाँ हो गयी । वह पापा के दोस्त के यहाँ  काम करने लगा। इससे घर का खर्च ठीक से चल जाता था क्योंकि सेठ रोज शाम को उसकी मजदूरी दे देता था।

राजू के पापा दिवापली के दो तीन दिन रहते ठीक हो गए। फिर राजू अपने सेठ के यहाँ से चुने  के थैले उठा लाया और दीपावली के एक दिन रहते पुरे घर में रंग रोगन कर लिया।

आज दीपावली का दिन था । राजू की माँ राजू को देख सोचने लगी, 'छोटी सी उम्र में ही अपनी जिम्मेदारी समझने लग गया है, भगवान का लाख लाख शुक्र है।

'क्या सोच रही हो माँ?' की आवाज ने माँ को गहरी सोच से उभारा। बोली ' कुछ नहीं माँ सोच रही हूँ तू कितना बड़ा हो गया है।'
'वो तो मैं हूँ ही माँ' अपनी कोलर ऊपर करते हुए बोला।

राजू ने मिट्टी के दीपक लगा कर पुरे घर को रोशन कर दिया। मिट्टी के दीपकों की रोशनी यांत्रिक लाइट से कहीं ज्यादा सुन्दर दिखाई दे रही थी।

लक्ष्मी पूजन के बाद उसने कुछ पकोड़े अपने हाथ में लिये और बाहर भाग गया। पड़ोसियों के लड़के पटाखे फोड़ रहे थे । जब उन्होंने सारे पटाखे फोड़ लिए तब  राजू अंदर आया और अपने पटाखे एक थाली में खोलकर ले गया ।

इतने में एक आतिशबाजी आकर उन लड़कों मे से किसी एक पर आकर गिर जाती है। कपडों के आग लग जाती है ।राजू ने बिना देर किये अंदर से कम्बल लाकर आग बुझा दी। उस लड़के की शर्ट तो जरूर जल गई थी लेकिन कुछ ज्यादा नुकसान नही हुआ शरीर का।
राजू फिर से पटाखे फोड़ने लगा। एक लड़के ने राजू से पूछा तु बड़े पटाखे व आतिशबाजी क्यों नहीं लेकर आता।
राजू ने जबाव दिया ' तुझे पता है आतिशबाजी व शोर करने वाले हमारे लिए कितने खतरनाक होते है। इससे जो धुँआ निकलता है वो हमारे वातावरण को कितना खराब करता है। इसके धुंए से सांस की बीमारी व बहुत सी बीमारियां होती है। शोर वाले बड़े पटाखो से हमारे सुनने की क्षमता खत्म हो सकती है।

मेरी टीचर ने कहा है दीवाली खुशियों का त्यौहार है खुशी से ही मनाना चाहिए। मिट्टी के दीपक जलाने चाहिए जिससे हमारा वातावरण शुद्ध होता है।

भाई आज से हम भी छोटे पटाखे ही लेकर आयेंगे।
फिर सभी मिलजुलकर खुशी से पटाखे फोड़े।

सुखचैन मेहरा # 9460914014


October 21, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

गुंजन भाग-2
गुंजन अब इतनी बड़ी तो हो ही गई थी कि गुंजन की माँ उसे पढ़ने के लिए स्कूल भेज सके।
                आज गुंजन की माँ गुंजन का दाखिला स्कूल मे करवा आई थी। अब बस एक ही दिक्कत थी कि गुंजन को रोज स्कूल छोड़कर शाम को वापस घर लेकर आने की। वैसे तो स्कूल में बहुत से रिक्से स्कूल में बच्चों को छोड़कर आते थे लेकिन गुंजन की माँ अपने किसी विष्वास पात्र को ही यह जिम्मेदारी सोंपना चाहती थी।
                यह समस्या भी तब हल हो गई जब यह बात गुंजन के घर के सामने वाले अंकल को पता चली दूसरे ही दिन अपना दिहाड़ी - भाड़े वाला काम छोड़कर, बचाये हुये पैसों से एक नया चमकता हुआ रिक्षा खरीद लाया।
                स्कूल जाने के सही समय पर अंकल ने अपना रिक्षा गुंजन के घर के ठीक आगे लाकर खडा कर दिया। गुंजन और उसकी माँ को इस रिक्षे के बार जरा सा भी अंदाजा था।
                गुंजन की मां गुंजन को स्कूल छोडने के लिए घर से बाहर निकली ही थी कि एक आवाज सुनाई पड़ी  गुंजन........’ गुंजन और उसकी माँ दोनो नये रिक्षे को देख खुष हो गये। लेकिन गुंजन की माँ को यह समझ नही आया की इन्हे गुंजन के स्कूल जाने के बारे में कैसे पता चला?
                स्कूल का समय हो गया था तो अंकल ने कहा मैं गुंजन को घर वापस भी छोड़ दुंगा। गुंजन स्कूल जाने के लिए बहुत उत्साहित थी वह झट से से रिक्षे पर जा बैठी।
                जल्दंी चलो अंकल मै लेट हो जाँऊगी।ष्
                'ठीक है बेटा चलते है.....‘ (अंकल ने हंसते हुए कहा)
                'टा-टा मम्मी
                'टा-टा बेटा (माँ ने भी अपना हाथ हिलाते हुऐ कहा)
                गुंजन जब स्कूल पहुँची तो सारे बच्चे एक ही तरह की भेषभूषा/पोषाक में थे। फिर उसने अपने कपड़ों को देखा वो बिल्कुल दूसरे बच्चों से अलग थी वह इधर-उधर खेल रहे बच्चों को देख-देख बहुत खुष हो रही थी।
                इसके बाद अंकल गुंजन को अध्यापिका के पास छोड़ वापिस लौट गया। अब मैडम ने बच्चों का परिचय गुंजन से करवाया। प्राथर्ना सभा में गुंजन को नव-प्रवेषित बच्चों का स्वागत किया गया।
                गुंजन शुरू से ही पढने में होषियार थी। इस तरह गुंजन अपनी स्टेप वाई स्टेप आगे बढ़ती गयी। वह केवल पढाई में ही नहीं अन्य सहायक क्रियाकलापों में भी अव्बल थी। सभी अध्यापक - अध्यापिकायें गुंजन की सहारणा करते थे।
                 इस बार मैट्रिक परिक्षा पास करने के लिए गुंजन जी तौड़ मेहनत कर रही थी। गुंजन की कड़ी मेहनत का ही परिणाम था कि वह पुरी कक्षा में ही नहीं बल्कि गुंजन ने पुरे जिले भर मंे प्रथम स्थान प्राप्त किया। आज वह छोटी सी गुंजन सोलह वर्ष की हो चुकी थी। गुंजन ने आपना परिणाम इंटरनेट से डाउनलोड किया हुआ परिणाम अपनी माँ को दिखाया तो उसकी माँ की आँखों में आँसू झलक पडे़।
                क्या हुआ माँ?‘
                कुछ नहीं, बेटा।गंुजन की माँ ने अपने आँसू पांेछते हुए कहा।
                मुझे पता है मां तुम क्यों रो रही हो
                उस बात को भूल जाओ माँ और वह आपकी गलती थोडे ही थी मेरे दादा-दादी को ही पसंद नहीं थी मैं।
                बेटा जब-जब तुम कोई नयी उपलब्धी  हांसिल करोगी तब-2  हमें हमारी गलती का एहसास होता रहेगा।
                हमेशा की तरह अव्बल आने वाली गंुजन ने सीनियर में भी जिला स्तर पर प्रथम और राज्य स्तर पर तीसरा स्थान प्राप्त किया था। संयोग की बात थी कि जिस दिन गुंजन का रिजल्ट आया उसी दिन ही उसका 18वां जन्म दिन था।
                गुंजन की माँ ने गंुजन के जन्म दिवस रिजल्ट के उपलक्ष में एक पार्टी का आयोजन किया। आस-पड़ोस के, गुंजन के गुरूजन उन्हें बधाई देने पहंुचे। अब तक गुंजन का मेज उपहारों से भर चुका था।
                सबके चले जाने बाद गुंजन उपहारों को एक-एक करके खोलना शुरू किया। गंुजन को सभी उपहार बहुत अच्छे लगे लेकिन गुंजन ने जब आखिर में सबसे बड़ा उपहार खोला तो वह थोडा सा घबरा गई। पास में ही खड़ी गुंजन की माँ ने जब उस उपहार को देखा तो ग्रिटिंग कार्ड के पहले पृष्ठ पर लिखा हुआ प् स्वअम ल्वन यह देख उसकी माँ भी थोड़ा सहम गई लेकिन जब उसने ग्रिटिंग कार्ड को खोलाकर देखा तो पता चला वह कार्ड किसी दूसरे का नहीं बल्कि गंुजन के दादा-दादी जी का था। यह देखते ही दादा-दादी के कमरे में पहुंची।
                गुंजन की माँ उसके पापा की फुल लगी फोटो को देखकर सोचने लगी की अगर आज गंुजन के पापा यहां होते तो कितना खुष होते। गुंजन भी अपने पापा को बहुत याद कर रही थी।
                अब दादा जी मजाक में कहने लगेसुनो बहू गंुजन अब बड़ी हो गई है अब हम इसकी शादी कर देते है।
                हां, पापा जी जरूर गंुजन की शादि तो करनी ही पडेगी उसकी माँ एक खास लेहजे मंे जबाव दिया।
                अम्मा, आप भी दादा-दादी की साइड हो गये। मैं तो अभी बच्ची हूँ, मैं तो दस-बीस साल तक शादि नहीं करूंगी अभी।दादा-दादी गुंजन की माँ गुंजन की यह बात सुनकर हंस पडे।
                                                                                                                                                                लेखक:- सुखचैन मेहरा

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