October 21, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
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गुंजन भाग-2
गुंजन अब इतनी बड़ी तो हो ही गई थी कि गुंजन की माँ उसे पढ़ने के लिए स्कूल भेज सके।
                आज गुंजन की माँ गुंजन का दाखिला स्कूल मे करवा आई थी। अब बस एक ही दिक्कत थी कि गुंजन को रोज स्कूल छोड़कर शाम को वापस घर लेकर आने की। वैसे तो स्कूल में बहुत से रिक्से स्कूल में बच्चों को छोड़कर आते थे लेकिन गुंजन की माँ अपने किसी विष्वास पात्र को ही यह जिम्मेदारी सोंपना चाहती थी।
                यह समस्या भी तब हल हो गई जब यह बात गुंजन के घर के सामने वाले अंकल को पता चली दूसरे ही दिन अपना दिहाड़ी - भाड़े वाला काम छोड़कर, बचाये हुये पैसों से एक नया चमकता हुआ रिक्षा खरीद लाया।
                स्कूल जाने के सही समय पर अंकल ने अपना रिक्षा गुंजन के घर के ठीक आगे लाकर खडा कर दिया। गुंजन और उसकी माँ को इस रिक्षे के बार जरा सा भी अंदाजा था।
                गुंजन की मां गुंजन को स्कूल छोडने के लिए घर से बाहर निकली ही थी कि एक आवाज सुनाई पड़ी  गुंजन........’ गुंजन और उसकी माँ दोनो नये रिक्षे को देख खुष हो गये। लेकिन गुंजन की माँ को यह समझ नही आया की इन्हे गुंजन के स्कूल जाने के बारे में कैसे पता चला?
                स्कूल का समय हो गया था तो अंकल ने कहा मैं गुंजन को घर वापस भी छोड़ दुंगा। गुंजन स्कूल जाने के लिए बहुत उत्साहित थी वह झट से से रिक्षे पर जा बैठी।
                जल्दंी चलो अंकल मै लेट हो जाँऊगी।ष्
                'ठीक है बेटा चलते है.....‘ (अंकल ने हंसते हुए कहा)
                'टा-टा मम्मी
                'टा-टा बेटा (माँ ने भी अपना हाथ हिलाते हुऐ कहा)
                गुंजन जब स्कूल पहुँची तो सारे बच्चे एक ही तरह की भेषभूषा/पोषाक में थे। फिर उसने अपने कपड़ों को देखा वो बिल्कुल दूसरे बच्चों से अलग थी वह इधर-उधर खेल रहे बच्चों को देख-देख बहुत खुष हो रही थी।
                इसके बाद अंकल गुंजन को अध्यापिका के पास छोड़ वापिस लौट गया। अब मैडम ने बच्चों का परिचय गुंजन से करवाया। प्राथर्ना सभा में गुंजन को नव-प्रवेषित बच्चों का स्वागत किया गया।
                गुंजन शुरू से ही पढने में होषियार थी। इस तरह गुंजन अपनी स्टेप वाई स्टेप आगे बढ़ती गयी। वह केवल पढाई में ही नहीं अन्य सहायक क्रियाकलापों में भी अव्बल थी। सभी अध्यापक - अध्यापिकायें गुंजन की सहारणा करते थे।
                 इस बार मैट्रिक परिक्षा पास करने के लिए गुंजन जी तौड़ मेहनत कर रही थी। गुंजन की कड़ी मेहनत का ही परिणाम था कि वह पुरी कक्षा में ही नहीं बल्कि गुंजन ने पुरे जिले भर मंे प्रथम स्थान प्राप्त किया। आज वह छोटी सी गुंजन सोलह वर्ष की हो चुकी थी। गुंजन ने आपना परिणाम इंटरनेट से डाउनलोड किया हुआ परिणाम अपनी माँ को दिखाया तो उसकी माँ की आँखों में आँसू झलक पडे़।
                क्या हुआ माँ?‘
                कुछ नहीं, बेटा।गंुजन की माँ ने अपने आँसू पांेछते हुए कहा।
                मुझे पता है मां तुम क्यों रो रही हो
                उस बात को भूल जाओ माँ और वह आपकी गलती थोडे ही थी मेरे दादा-दादी को ही पसंद नहीं थी मैं।
                बेटा जब-जब तुम कोई नयी उपलब्धी  हांसिल करोगी तब-2  हमें हमारी गलती का एहसास होता रहेगा।
                हमेशा की तरह अव्बल आने वाली गंुजन ने सीनियर में भी जिला स्तर पर प्रथम और राज्य स्तर पर तीसरा स्थान प्राप्त किया था। संयोग की बात थी कि जिस दिन गुंजन का रिजल्ट आया उसी दिन ही उसका 18वां जन्म दिन था।
                गुंजन की माँ ने गंुजन के जन्म दिवस रिजल्ट के उपलक्ष में एक पार्टी का आयोजन किया। आस-पड़ोस के, गुंजन के गुरूजन उन्हें बधाई देने पहंुचे। अब तक गुंजन का मेज उपहारों से भर चुका था।
                सबके चले जाने बाद गुंजन उपहारों को एक-एक करके खोलना शुरू किया। गंुजन को सभी उपहार बहुत अच्छे लगे लेकिन गुंजन ने जब आखिर में सबसे बड़ा उपहार खोला तो वह थोडा सा घबरा गई। पास में ही खड़ी गुंजन की माँ ने जब उस उपहार को देखा तो ग्रिटिंग कार्ड के पहले पृष्ठ पर लिखा हुआ प् स्वअम ल्वन यह देख उसकी माँ भी थोड़ा सहम गई लेकिन जब उसने ग्रिटिंग कार्ड को खोलाकर देखा तो पता चला वह कार्ड किसी दूसरे का नहीं बल्कि गंुजन के दादा-दादी जी का था। यह देखते ही दादा-दादी के कमरे में पहुंची।
                गुंजन की माँ उसके पापा की फुल लगी फोटो को देखकर सोचने लगी की अगर आज गंुजन के पापा यहां होते तो कितना खुष होते। गुंजन भी अपने पापा को बहुत याद कर रही थी।
                अब दादा जी मजाक में कहने लगेसुनो बहू गंुजन अब बड़ी हो गई है अब हम इसकी शादी कर देते है।
                हां, पापा जी जरूर गंुजन की शादि तो करनी ही पडेगी उसकी माँ एक खास लेहजे मंे जबाव दिया।
                अम्मा, आप भी दादा-दादी की साइड हो गये। मैं तो अभी बच्ची हूँ, मैं तो दस-बीस साल तक शादि नहीं करूंगी अभी।दादा-दादी गुंजन की माँ गुंजन की यह बात सुनकर हंस पडे।
                                                                                                                                                                लेखक:- सुखचैन मेहरा

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