October 17, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on October 17, 2018 with No comments

अनमोल होती है बेटियाँ

माँ, एक काम मिला है...
कैसा काम?
बच्चों की खुशियों को,
एक लंबे... धागे से बांधने का।
छुट्टियां है खेलोगी नहीं?
नहीं माँ नहीं,
गयी उम्र खेलने की।
अरे! अभी 10 की तो है..
नहीं माँ, बांधने दो ना।
ठीक है बेटी..जा ले आ..
खुश हुई वो इजाजत पाकर
ले आयी ढेर सारे
पटाखे खुले,
दुकान जाकर।
कुछ बांध दिए है
कुछ है बाकी,
पर पूरी श्रद्धा से
बांध रही है...
जले चूल्हा
आराम से ताकी,
देखो एक बच्ची है, फिर भी
बच्चों के लिए बांध रही है..
अनमोल होती है बेटियाँ
किसी ने बात सच कही है...

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


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