October 24, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on October 24, 2018 with No comments

पता नहीं वो कैसे होंगे?
हे मेरे मन कल्पना कर।
हँसमुख या चहुँमुखी?
ख़ास एक संकल्पना धर।।

समझदार होंगें या नादां
या होंगे प्रेम प्रिय मित्र से
हिम से शीतल होंगे या
मोनालिसा के चित्र से।।

हे मेरे मन कल्पना कर
उ..होंगे वो विचार प्रेमी।
या होंगे वो कोमल मन
अं.. होंगे शकी , बहमी ।।

शायद होगें शीत लहर से
चुलबुले या फिर नटखटी।
वो मोहि मुस्कराहट के धनी
करते होंगे बातें चटपटी।।

या होंगे कल्पना से परे
न जाने कैसे होंगे वो..?
मन की कल्पनायें हैं.
न जाने कब पूरी होंगी?

स्वरचित

सुखचैन मेहरा

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