October 26, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on October 26, 2018 with No comments

आघात लगा है मर्म मेरे को
तेरे रूठ, जाने से मेरे सनम।
बढ़ गया तो शायद मैं न रहूँ
अकेला छोड़ दो करो रहम।।

क्या सोच प्रीत मैंने लगाई थी
तुमसे, नतीजा जहन में न था।
न जाने क्यों झुक गया मैं जो
किसी के आगे झुका ही न था।।

जीवन का मर्म भी छुपाया नहीं
तुझ से सब खोल कर रख दिया।
हमेशा तेरा ही भला सोचा मैंने
पर.. तूने मुझे क्या सिला दिया।।

लौट आओ आज भी मैं तेरा हूँ
किया है व्रत तेरे नाम का प्रिया।
चौथ माता का वास्ता है तुम्हें ,
कार्तिकमास, कृष्ण चतुर्थी प्रिया।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


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