Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on October 10, 2018 with No comments
गरीबी
अमीरजादों की अमीरी ने
उड़ाया मजाक गरीबी का.
हाथ से कटोरा छीना,
अंगुली मार कपड़े भी फाड़े।
मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया,
बस तमाशबीन
परिवार के साथ खड़ा रहा,
खून ने तो थे उबाले मारे।।
कैसे समझाता उन अमीरजादों को?
दिन आते जाते है।
कब राजा से गंगू तेली बना दे
उस रब के रंग निराले है।
और क्या करता मैं बस उसे
नये कपड़े पहना, खाना खिलाया
परिवार खुश और मैं भी
हां अब जाकर सुकून पाया।
लेखक: सुखचैन मेहरा # 9460914014

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