October 31, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on October 31, 2018 with No comments

ऐतबार नहीं करना किसी पर आँखे बंद करके, वो आँखे अकसर खुल जाया करती है, धोखा खाने के बाद.......


ऐतबार करके देखा था एक इंसान पर, पर उस पर ऐतबार करके ऐतबार पर ही ऐतबार नहीं रहा.....।

ऐतबार की दुनियां भी अजीब है दोस्तों, वो हमें


टुकड़े टुकड़े करके काटवाते रहे, किसी गंभीर बीमारी


का हवाला देकर...जब डॉक्टर की रिपोर्ट पढ़ी तो
रिपोर्टर नॉर्मल निकली।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014

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