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तिरंगे में लिपटी लाशों को देख सबके ही दिल रोते है
जो पहन के निकले थे वर्दी वो कफ़न में लिपटे लौटे है
क्या सन्देश सुनाये भारत माँ को जिसने नाजो से पाले थे
थे बलवान बड़े तेरे बेटे जिसने दुश्मन पर घेरे डाले थे
बोल भारत माँ के जयकारे थे दुश्मनो पर वे टूट पड़े
देख तेरे बलवानो का शौर्य दुश्मन के पसीने छूट पड़े
क्या बतलाऊ उनकी ताकत को वे एक ही सौ पर भारी थे
जब तक थी आखिरी सांस भी उनमे उनके तांडव जारी थे
लड़े वे वीर बलवानो जैसे रौद्र रूप दिखाया था
देख अदम्य साहस उनका हिमालय ने शीश झुकाया था
घाटी में वीरों ने दुश्मन को भारत का साहस दिखलाया था
जो भारत का अहित है सोचते उनको यह बतलाया था
पहले वाला दौर न समझो यह पहले वाला दौर नहीं
भारत से करने का मुकाबला तुम में अब इतना जोर नहीं
अब आँख उठा कर देखोगे तो तुमको सबक सिखाएंगे
गर पाँव रखा भारत में तो सीधा जहनुम पहुंचाएंगे
मारते मारते शहीद हुए और प्राण वीरों ने त्यागे थे
देख शेरों के साहस को गीदड़ फिर छोड़ के भागे थे
सुन वीरों की गाथा को माँ भारती की आँखे बहने लगी
न व्यर्थ जायेगी शहादत इनकी यह भारत माता कहने लगी
बदला लेने को देखो माँ चढ़ी सिंह सवारी है
भाग सको तो भागो दुष्टों अब आयी तुम्हारी बारी है
स्वरचित -: जनार्दन भारद्वाज
श्री गंगानगर( राजस्थान)
हथिनी के बाद अब गौ माता
आखिर कहां गयी मानवता?
रिश्ते होते केवल इंसानो के नहीं
वो भी किसी की माताएं थी।
बेजुबानो पर परीक्षण
करना बन्द करो
देश की तरक़्क़ी के लिए
जानवरों को न तंग करो
अगर परीक्षण करना है तो
खुद के रिश्तों पर कर लो,
यदि मन नहीं करता है तो
रोबोट बना कर लो।
जानवरो को जानवर समझने,
की क्यों करते हो गलती
पता लगता जो आग इनके मुँह में जली,
तुम्हारे मुँह में जलती।
इनके बच्चों की थी क्या गलती?
जिन्होंने दुनियां ही नहीं थी देखी।
पर ऐसी दुनियां देखकर वी क्या करते,
वो भी किसी न किसी दिन ऐसे ही जलते
मेरी एक अर्ज है छोटी सी इस जमाने से
जुल्म न करना कभी बेजुबानों पर,
वो भी हकदार है इस जमाने के।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा
दो दिन का मेहमान
बस दो दिन की है जिंदगानी मेरी, मौत दस्तक दे चुकी है।
बस दो दिन का मेहमान हूँ मैं, ये मौत मुझ से कह चुकी है।।
बहुत दिनों से कुछ बातें जहर बनी हुई है मेरे मस्तिष्क में।
अंतिम समय आ चुका है मेरा, ये मौत मुझसे कह चुकी है।।
कुछ हसीन लम्हें ही रक्षक बने हुए थे मेरे जिंदा शरीर के।
अब वो भी धूमिल हो चुके, अब राख ही बाकी रह चुकी है।।
मैं पसंद नहीं था तेरी, बाबुल ने तेरी जिंदगी खराब कर दी।
ये खटक रही थी जहन में मेरे, अब आँखों से बह चुकी है।।
वैसे तो रोज, पल - पल मरता हूँ मैं, तुझसे नाराज हो कर।
कब तक मरता रहूंगा मैं यों, नहीं बाकी मुझ में रह चुकी है।।
हा, हो सके तो थोड़ा सुकून पहुँचा देना मुझे गले से लगाकर।
गुंजाइश है तो वरना मौत तो अपना अंतिम निर्णय ले चुकी है।।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा
कोरोना को हराना है
जनता कर्फ्यू की पालना करके कोरोना को हराना है
लोगो के बहकावे में न आकर कर्फ्यू सफल बनाना है।
मत करना पक्ष किसी भी राजनैतिक पार्टी विशेष का
राजनीति से उभर कर भारत देश को आगे बढ़ाना है।
कोरोना की जिंदगी केवल चौदह घंटो की है दोस्तो
हमे इसे सोलह घण्टे बाहर न निकलकर मिटाना है ।।
अपने हाथों में है इलाज इस वायरस का , दोस्तो
फिर क्यों किसी और के आगे हाथ फैलाना है।।
जनता जनार्धन एक शक्ति है सर्वोच्च इस देश की
हम सब ने मिलकर इसे फिर से सार्थक बनाना है।।
अफवाहों से दूर रहना, मेरी अर्ज यही है दोस्तो
भारत के लोग है दोस्तो भारत को आगे बढाना है।।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा
किस्मत बनाम काबिलीयत
सोचा रब से तुम्हें मांग कर किस्मत की आजमाइश करता हूँ।
तुम तो मिल गये लेकिन तुम्हारा साथ नहीं मिल पाया मुझे।।
किस्मत की क़िस्में भी अलग - अलग होती है मेरे हमसाथी।
वास्तव में ये थोड़ी देर से ही सही समझ तो आया मुझे।।
रब से कुछ और मांगने की हिम्मत भी नहीं रही अब मुझमें।
रब ने मेरे दिल की फरियाद सुनकर भी इतना रुलाया मुझे।।
सोचता हूँ तेरा साथ मांग लेता हूँ रब से, शायद मिल जाये।
अगर किस्मत फिर से हार गई तो? ख्याल ने है डराया मुझे।।
जिंदगी में कभी किसी को सब कुछ नहीं मिलता हमराही।
काबिलियत भी मायने रखती है, किस्मत ने सिखाया मुझे।।
-:-स्वरचित-:-
सुखचैन मेहरा
पति पत्नी और कोई तीसरा
वो रब से हमे अपना नाथ मांग बैठे है।
हम बेखबर है वो जज्बात मांग बैठे है।।
हमने उन्हें कभी उस नजरों से नही देखा।
वो है कि हमसे हमारा हाथ मांग बैठे है।।
दो पल साथ चलने की सोच न थी मेरी।
आज वो उम्र भर का साथ मांग बैठे है।।
हल्की सी बात होती थी बस हमारे बीच
वह रोज रोज की मुलाकात मांग बैठे है।।
कह दिया मैंने किसी और का हूँ फिलहाल
फिर भी वो अपने घर बारात मांग बैठे है।।
प्रेम प्रस्ताव स्वीकार नहीं सात जन्मों तक
क्योकि ससुर से उनका साथ मांग चुके है।।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा
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