December 08, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , , ,
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शीर्षक " हंसना भूल गयी " 
🌷🌷🌷एक प्रस्तुति 🌷🌷🌷
प्रेम कविता

खुल कर हँसना भी भूल गई थी !
मैं तुमसे मिलना जो भूल गई थी!
बस एक याद थी धीमी सी दिल में !
और कहूँ क्या क्या दिल का आलम !
छोड़ गए हो इस हाल में बालम!
हर पल रहता ख्याल है तुम्हारा !
और मन में तेरा साया लहराता !
सुनहरी रेशमी प्रतिबिम्ब तुम्हारी !
साया बन कर साथ चली आई!!
और यादों पर मेरे सुगन्ध चढाई!
अभिलाष लिए हूँ, मैं बैठी  कि 
तुम आओ।
और संग मेरे  अपने दो मीठे पल बिताओ !
कहो क्या तुम मुझसे रूठ गए हो ?
या अहम में अपने मान लिए 
अपने ही अपने से ठन गए हो ?
माना की मैं थी थोड़ी हठीली!
 पर क्या थी नहीं रंगिली?
उन्मुक्त उर की चटक हँसी थी !
वह मेरे प्रेम अभिव्यक्ति की निशानी बनी थी !
की मैंने जो थोड़ी अठखेलियां !
और तुम संग हंसी ठिठोलियाँ !
क्या तुम्हें नहीं वो भाया?
इतनी ख़ामोशी में क्यों पड़े थे ?
गंभीर चिन्तन में क्या लिप्त हुए थे?
काश कि तुम व्यक्त वह कर पाते!!
और रंग भरे इस जीवन के , 
संग मेरे कई प्रेम गीत गाते!!
कहो न !!
हाँ कहो ना क्या तुम मुझसे 
नहीं प्रेम थे करते ?? या 
मुझे पाने का नहीं आह थे भरते ?
सुनो,देखो 
मैंने भी हँसना छोड़ दिया है!!
तुम सं बनना शुरू किया है !
और कहूँ क्या 
कितना प्रेम किया है !!!
भूल नहीं थी , वह प्रेम था मेरा 
और बस चाह थी मेरी कि 
तुम संग दो पल बिताऊँ, अभिलाष 
जिया की खुल कर बतलाऊँ !!
पर तुम थे जो समझ न पाए!
चुप बनी मैं मौन खड़ी हो 
खुद से ही अभिलाष जताए!!
खुल कर हँसना भी भूल गई थी!!
🌹🌹🌹🌹🌹
प्यार किया था, नहीं व्यापार कोई !!

प्रेम में नहीं कोई लेन देन है , 
प्रेम तो बस एक आराधना मन की!!
जो पाओ तो बने कहानी;
नहिं तो बन जाओ राधा रानी!!
प्रेम भक्ती से प्रीत लगाई!!
मैं तो तुम संग प्रेम कर आई!!
प्यार वह अनोखा, खेल हिय का !!
कर तुम जाना गर दिल लगाना !!
और सदा खुल कर हँसते जाना !!
इन्द्रधनुष बने जीवन यह तुम्हारा!!
अब यही दुआ है मेरी 
रहो सदा तुम अपनी मगन में,
उर आनंदित कर उरते गगन में!!
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

नुपूर 'नवीन ' 
औरंगाबाद 
बिहार
स्वरचित व अप्रकाशित
December 08, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , , ,
नमस्कार-कलमरथ मंच
दिन -मंगलवार
मुक्तक
1
बुजुर्गियत के एहसास को खास बनायेंगें। 
अपने आशियाने को कभी चौराहा ना बनायेंगे।

आशीर्वाद का हाथ रहे सिर पर और डगर पर,
और  जिंदगी साथ रहकर बितायेगें।
--/-
2
गुल-गुलशन, आंगन, दामन  महकायेंगें,
होली, दीवाली, सावन में घर आयेंगे।
कभी सरहद तो कभी आंगन पर होगा पहरा,
और जिंदगी साथ रहकर बितायेगें।
------
3

पहिया जीवन का हम यूं घुमाते जायेंगे,
कभी आप तो कभी हम मुस्कुराते जायेंगे।
झुकें दोनों तरफ तराजू  के पलड़े जीवन के,
और जिंदगी साथ रहकर बिताते जायेंगे।

राजेश  लखेरा,जबलपुर।
December 03, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , , ,
#कलम रथ साहित्य मंच को नमन।
#कलम रथ दैनिक आयोजन क्रम संख्या 57.
#दिन : गुरुवार।
#दिनांक : 03 दिसंबर 2020.
#विषय : तब भगवान याद आते हैं।
#विधा :  पद्य।

     ।रचना।


यह संसार,
एक माया नगरी,
हवा महल।

जब उलझे,
तब ही भगवान 
याद आते हैं।

ख्वाबों के लिए,
यहां सब बिकल,
है कोलाहल।

आंखें बोझल,
मादक है दुनिया,
नशे में सब।

मिलती नहीं,
किसी को भी यहां जो,
सोचा था कल।

चल निकलो,
भगवान साथ हैं,
सब संभव।

आगे तो चल,
मिल जायेगी तेरी,
खोई मंजिल।

स्वरचित, मौलिक और अप्रकाशित।

                       दामोदर मिश्र बैरागी,
                       मेदनीनगर, झारखण्ड।
December 03, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , , ,
नमन कमल रथ मंच
विषय तब भगवान याद आते हैं
विधा गद्य( आलेख)
दिनांक 3-12- 2020
शीर्षक - तब भगवान याद आते हैं
आलेख--जब मनुष्य पृथ्वी में जन्म लेता है ।तो सब कुछ भूल जाता है। 84 योनि भोग करके मनुष्य में अवतार होता है ।और जब मां के गर्भ में रहता है। तो 9 माह तक भगवान की प्रार्थना करता है कि हे ! प्रभु मुझे इस दुनिया से पृथ्वी पर कब तक अवतार हो जाएगा। इस प्रकार करके वह प्रार्थना करता है। और जब मनुष्य का अवतार हो जाता है। तो जो उन्होंने संकल्प किया था कि- मैं पृथ्वी में जा करके ईश्वर को कभी नहीं भूलूंगा। इसके बाद वह सब कुछ भूल जाता है।फिर वह बड़ा हो जाता है।तो कभी भी भगवान के प्रति श्रद्धा भाव, भक्ति , प्रार्थना नहीं करता है। यदि उसके जीवन में किसी भी प्रकार के कोई संकट आ जाता है। तो फिर भगवान की याद आते है। मानव को जीवन में किसी प्रकार की विपत्ति आती जाती रहती है। कभी सुख मिलता है ।और कभी दुख मिलता है। इसलिए मनुष्यों को यह चाहिए कि चाहे सुख हो या दुख हो। भगवान को सुबह शाम याद करना चाहिए। यह नहीं कि हमें जब भी सुख मिल रहा है ।तो भगवान को भूल जाएं, दोनों में सुख और दुख में भगवान को नहीं भूलना चाहिए। अपने समर्थ अनुसार पूजा-पाठ, भक्ति, अर्चना करना चाहिए।
महत्त्व--भगवान की प्रार्थना करना अति आवश्यक है। जब हम श्रद्धा भाव से पूजा -अर्चना करते हैं। तो हमेशा भगवान सुख ,शांति, समृद्धि प्राप्त होती है। इसलिए हमेशा सुख हो चाहे दुख हो, भगवान के नाम का जाप करना चाहिए ।ताकि किसी प्रकार के संकटों की सामना ना करना पड़े।
                   स्वरचित- आलेख
                    देवीदीन चंद्रवंशी
                    ग्राम -बेलगवां
                   तहसील पुष्पराजगढ़
                   जिला अनूपपुर (म०प्र०)
December 03, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , , ,
नमन मंच 🙏
#कमल रथ 
#दिनांक-03/12/2020
#दिन-गुरुवार 
#विषय-तब भगवान याद आते हैं 
#विधा-कविता 

शीर्षक-´´तब भगवान याद आते हैं``

घोर संकट विपदा भारी, 
मुँह फेर ले दुनियाँ सारी !
बन जाएँ अपने भी बेगाने, 
नजर ना आए रास्ते सारे !
तब भगवान याद आते हैं |

रास्ते बंद हो जाएँ सारे, 
घिर जाएँ संकट के बादल !
नजर ना आए कही अपनापन, 
भूल जाएँ अपने भी सारे !
तब भगवान याद आते हैं |

निराशा के चँगुल में फँसा मन, 
दूर तक ना दिखे आशा की किरण !
अंधकारमय जीवन हो जब, 
पर जाएँ मुश्किल में जब मन !
तब भगवान याद आते हैं |

आशा निराशा के भँवर में मन, 
चिंताओं से घिरा मन हो जब !
दुख का पहाड़ टूट पड़े सर, 
कोई राह नजर ना आए जब !
तब भगवान याद आते हैं |

मन में इच्छा अभिलाषा हो, 
कामना हो कुछ जब पाने की !
साथ ना दे किस्मत अपनी, 
नीरस लगे जब जीवन यह !
तब भगवान याद आते हैं |

जब कोई रास्ता ना सूझे, 
दमन करना पड़े इच्छाओं का !
हास उपहास मिले जब अपनों से, 
खुद का अपमान हो दुनियाँ से !
तब भगवान याद आते हैं |

मन में हो भक्ति भावना, 
श्रद्धा हो ईश्वर के प्रति !
कृपा हो भगवान की जब, 
खुशियाँ मिले भगवान के अनुराग से !
तब भगवान याद आते हैं ||

अंजली रॉय 
समस्तीपुर, बिहार 
स्वरचित व मौलिक रचना
December 03, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , , , ,
यह ऐसी रचना है जिसमें कोई भी भगवान को नहीं भूल सकता,वे याद आते ही रहेंगे।

विश्व दिव्याँग दिवस पर एक रचना
❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️

बुरा समय जब भी करता अट्टहास
कर देता कुछ न कुछ अवश्य नाश
ये दिव्याँग लोग इसी समय की मार हैं
बेचारे अपनी अपनी पीडा़ से लाचार हैं।

इन्हें उपकार नहीं बस उपचार मिले
स्वाभिमानी बनाता हुआ सँसार मिले
जो कर सकते हों थोड़ा बहुत भी इस जीवन में
उन्हें अपने पैरों में खड़े रहने का उपहार मिले।

अच्छे लोगों की कमीं नहीं तो फिर ये क्यों भटकें
दीन भाव लिये इनके चेहरे उदास हो क्यों लटकें
थोडे़ प्रयासों से ही इनमें जीवन के भाव उमड़ सकते
यदि हो ऐसा तो ये तिरस्कृत घूँट फिर क्यों गटकें।

बस एक प्रयास बस एक प्रयास
जो इनको करा दे यह एहसास
कि इनमें अब भी हैं पूरी सम्भावनायें
और हर सम्पन्न की इनसे जुड़ी हैं भावनायें।

विश्व दिव्याँग दिवस पर जागे ऐसी चेतना
कि न हो किसी भी दिव्याँग की कभी भर्त्सना
इन्हें स्वावलम्बी बनाने के पूरे श्रम हों
ताकि इनकी परेशानियाँ कम से कम हों।

कृष्णम् शरणम् गच्छामि

स्वरचित

सुमित्रा नन्दन पंत 
December 03, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , , ,
नमन मंच 
#क़लम रथ परिवार 
#दिनांक:3.12.2020
#विधा: पद्य 
#विषय : तब भगवान याद आते है 
आँख खुलते ही,निकलकर सपनों की दुनिया से 
पाँव पड़ते हैं जब ज़मीं पर,होता सच से सामना 
तब भगवान याद आते हैं 
नव सृजन,नव दिवस,नया जोश 
सूर्य की पहली किरण का आभास 
उसी ने दिया ,नई ज़िंदगी का आयाम 
तब भगवान याद आते हैं
खिलती कलियां,बनते फूल,भँवरों की गुंजार 
कोमल पत्तियों पर सुनहरी ओस की बूँद 
शीतल ,मंद- मदं बहती बयार 
स्कूल जाते ,छोटे-छोटे बच्चे ,भारी बस्ते
तब भगवान याद आते है
तपती दोपहरी ,भारी बोझ पसीने से तर बतर नर-नारी झुलसता बचपन,नंगे पैर ,प्यासे पशु-पक्षी 
तब भगवान याद आते हैं 
थक-मांदा ,ख़ाली हाथ लौटता मजबूर 
लौटते पक्षी एक क़तार में,अनुशासित
गोधूली की बेला ,सूर्यचांद की लुका-छिपी
दूर क्षितिज पर ,धरती अम्बर का मिलन
तब भगवान याद आते हैं
स्वरचित व अप्रकाशित रचना
डॉ दवीना अमर ठकराल 
हिसार हरियाणा
December 03, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , , ,
नमन मंच: कलम रथ
विषय:तब भगवान याद आते हैं
विधा: मुक्तक

जब हम कभी मुश्किल में खुद को पाते हैं 
और कोई नहीं आता तब भगवान याद आते हैं,
चाहे ग्रंथ कोई भी पढ़े न पढ़े पर ये सभी बताते  हैं,
और कोई नहीं आता है तब भगवान याद आते हैं!!


मेरे बच्चे कैसें हैं इंसान याद आते है
अपना घर अपना मकान याद आते है,
कोई बदनसीब न हो जहां में मेरे जैसा
भूख लगती है मुझे तब भगवान याद आते हैं!!
स्वरचित,अभिषेक मिश्रा
बहराइच उत्तर प्रदेश
 मौलिक अप्रकाशित
स्वरचित:
December 03, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , , ,
नमन कलम रथ मंच
दिनांक:-3/12/2020
विषय:-तब भगवान याद आते है
विधा :-कविता
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
जो  दिल  के बहुत पास होते है,
सदा  आंखों  की  प्यास होते है,
वे  जब  जग  में तन्हा छोड़ देते,
हम चाहकर भी नहीं मिल सकते,
तब  हमें  भगवान  याद  आते है।

उम्रभर  की  आस  बन  जाते है,
हर  राह  की तलाश बन जाते है,
पर  मायूसी  के सिवाय कुछ भी,
हम  हासिल  नहीं   कर  पाते  है
तब  हमें  भगवान  याद आते है।

      ज्योति कुमारी
    रामगढ़ (झारखंड)
December 03, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , , ,
#कलमरथपरिवार
#कलमरथ दैनिक आयोजन2020
#आयोजन क्रमांक57
#विषय-तब भगवान याद आते हैं।
#विधा-मुक्तक
#दिनांक03-12-20


जब बिपत्ति सर चढ़े गाते हैं।
तब भगवान याद आते हैं।
दुनिया की रीत यह नीत है।
जब जब दुख हमें सताते है।

स्वरचित मौलिक
चन्द्र भूषण निर्भय
बेतिया
December 03, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , , ,
नमन मंत्र
वेश्या__ तब भगवान याद आते हैं
जब चल रहे हो सीधे
मंजिल ना ढूंढ पाते हैं
सच कहती हूं दोस्तो
तब भगवान याद आते हैं
जब मिल रही हो खुशियां
मस्ती में मौज उड़ाते हैं
खुदा क्या खुदी को
हम भूल जाते हैं
पर पड़ जाते हैं मुश्किल में
तो सच कहती हूं दोस्तो
तब भगवान याद आते हैं
जब अपने अपनों का
गला घोट जाते हैं
अपनों की मार से
दर्द में तड़फ कर
जख्म हरे हो जाते हैं
सच कहती हूं  दोस्तो
तब भगवान याद आते हैं
 उर्मिल शर्मा
प्रवक्ता हिंदी
सिरसा हरियाणा
December 03, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , , ,
नमन मंच
विषय: तब भगवान याद आते हैं
विधा: पद्य

कोई संकट जब जाए
जब कोई बात बिगड़ जाए
जब घेर ले कोई बिप्ता
कोई बात समझ ना आए
जब सिर पर चढ़ जाए कर्ज
जब समस्या का हल ना पाए
जब दे जाए कोई धोखा
तब मन छुटकारा दुनियाँ से चाहे
जब सब कुछ हो निसफल
तब ये दिल से आहें भरते हैं
इस बुरे टाइम के वक़्त में
तब भगवान ही याद आते हैं l

करमजीत कौर, शहर - मलोट
जिला- श्री मुक्तसर साहिब, पंजाब

सवरचित एवम मौलिक
December 03, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह 1 comment Posted in , , ,
नमन मंच
क्रम -५७
विषय- तब भगवान याद आते है
३/१२/२०२०

सुख में होते जब लोग यहाँ
भगवान को भूल जाते हैं
आता संकट कोई उनपर
तब भगवान याद आतें हैं
मुसीबतों से घबराकर
दुखों की ठोकर खाकर
हो जाता है जब दर बदर
अपनों से ठुकराकर
जब हार जाता है हरपल
तब झरते हैं आंसू निर्झर
आता है याद ईश्वर का दर
जो भुला दिए अक्सर जाते हैं
सुख के सागर में जब होतें हैं
सब और से जब सब मिलता है
फिर रब को भूल जातें हैं
जब लेता है परीक्षा अपनी
दुख में तपाये जातें हैं
तब भगवान याद आतें हैं
कर लो सुख में ही याद उन्हें
क्यों दुख का इंतजार करें
जब आये मुसीबत तो याद करो
ऐसा तो कोई भाव नहीं
सुख दुःख को सम मान चलो
भगवान को बस याद करो
मिलेगा फिर साथ हमें उनसेे 
तब भगवान साथ होतें हैं
©®धीरज कुमार शुक्ला"दर्श"
झालावाड़, राजस्थान
December 03, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , , ,
नमन मंच कलम रथ 
विषय - तब भगवान याद आते हैं
#कविता 
3 - 12 - 2020
क्रमांक 57
       #सतीश "बब्बा"

जब अपने ऊपर कोई, 
मुसीबत आती है, 
अपने हमें दुत्कार देते हैं, 
तब भगवान याद आते हैं! 

जब सभी आशाभंग होती हैं, 
जब आशा निराशा में बदल जाती है, 
जब सभी दरवाजे बंद हो जाते हैं, 
तब भगवान याद आते हैं! 

जब सारे काम बिगड़ जाते हैं, 
जब कोई सहारा नहीं दिखता है, 
जब अपने साथ छोड़ जाते हैं, 
तब भगवान याद आते हैं! 

जब यमराज पास आते हैं, 
बचने के रास्ते नहीं दिखते हैं, 
जब अपने नहीं पास होते हैं,
तब भगवान याद आते हैं!! 
रचना मौलिक एवं अप्रकाशित है। 
                    सतीश "बब्बा" 
 कोबरा, चित्रकूट, उ प्र, 210208.
मोबाइल - 9451048508.
December 03, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , , ,
कलम रथ दैनिक आयोजन 2020
क्रं. संख्या 57
विषय .तब भगवान याद आते हैं
विधा. कविता
दिनांक 3/12/2020
दिन गुरुवार
क्रमांक 76


आज का मानव खुद को भगवान समझ बैठा है
हर काम करके कहता ये मैने कर लिया॥
ये मैंने बनाया है ये मैने किया है।
अपनी मेहनत से मैंने सब कुछ बनाया।
बीमारी के वक़्त मैं डॉक्टर इलाज करते
और थक जाते हैं तब डॉक्टर को भी
भगवान यादआते हैं और कहते हैं भगवान
से प्रार्थना करो वही कुछ कर सकते हैं।
आविष्कार किये इतने दिल बना लिया
कृतिम बना लिये पैर हाथ फिर भी
वह नहीं समझ सका शरीर में कैसे
आतहैं प्राण कैसे जाते हैं प्राण।
सुख में कभी नहीं करते भगवान को याद
आती है जबआदमी पर मुसीबत
 तबभगवान याद आते हैं।

स्वरचित मौलिक रचना कलमरथ परिवार को प्रकाशन की अनुमति है।

नरेन्द्र श्रीवात्री स्नेह
मण्डई
तह.बिरसा
जिला बालाघाटमध्यप्रदेश
पिन. 481051
November 20, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in , ,
नमन मंच कलम रथ 🙏🙏
दिनांक-16.11.20
विषय-भाई दूज
विधा-पद्य


शीर्षक- भाई दूज

भाई दूज का पावन पर्व मनाऊँ मैं,
प्रातः करूँ पूजा, फिर भैया को टीका लगाऊँ मैं।

चाँद सा चमके भैया मेरा,तेजोमय हो सूरज सा,
कामना लिये ईश समक्ष,पूजा की थाल सजाऊँ मैं।

कथा पौराणिक सुनकर,मंगल गीत गाऊँ मैं,
भाई की हो लम्बी उम्र,भाभी का अमर सुहाग मनाऊँ मैं।

ऐपन रोली लगाकर,रूई की माला बनाऊं मैं,
करूँ कामना विपदा हरण का,भाई के हस्त माला पहनाऊँ मैं।

 पकवान बनाकर कई,भाई का मीठा मुँह करवाऊँ मैं।
हमारे रिश्ते में आये ना कड़वाहट कभी यह वरदान पाऊँ मैं।
            रीमा सिन्हा(लखनऊ)
                  स्वरचित
June 22, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in
वीर सैनिक

तिरंगे में लिपटी लाशों को देख सबके ही दिल रोते है
जो पहन के निकले थे वर्दी वो कफ़न में लिपटे लौटे है
क्या सन्देश सुनाये भारत माँ को जिसने नाजो से पाले थे
थे बलवान बड़े तेरे बेटे जिसने दुश्मन पर घेरे डाले थे
बोल भारत माँ के जयकारे थे दुश्मनो पर वे टूट पड़े
देख तेरे बलवानो का शौर्य दुश्मन के पसीने छूट पड़े
क्या बतलाऊ उनकी ताकत को वे एक ही सौ पर भारी थे
जब तक थी आखिरी सांस भी उनमे उनके तांडव जारी थे
लड़े वे वीर बलवानो जैसे रौद्र रूप दिखाया था
देख अदम्य साहस उनका हिमालय ने शीश झुकाया था
घाटी में वीरों ने दुश्मन को भारत का साहस दिखलाया था
जो भारत का अहित है सोचते उनको यह बतलाया था
पहले वाला दौर न समझो यह पहले वाला दौर नहीं
भारत से करने का मुकाबला तुम में अब इतना जोर नहीं
अब आँख उठा कर देखोगे तो तुमको सबक सिखाएंगे
गर पाँव रखा भारत में तो सीधा जहनुम पहुंचाएंगे
मारते मारते शहीद हुए और प्राण वीरों ने त्यागे थे
देख शेरों के साहस को गीदड़ फिर छोड़ के भागे थे
सुन वीरों की गाथा को माँ भारती की आँखे बहने लगी
न व्यर्थ जायेगी शहादत इनकी यह भारत माता कहने लगी
बदला लेने को देखो माँ चढ़ी सिंह सवारी है
भाग सको तो भागो दुष्टों अब आयी तुम्हारी बारी है
                                                          स्वरचित -: जनार्दन भारद्वाज
                                                             श्री गंगानगर( राजस्थान)
June 07, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
आखिर कहां गयी मानवता?

हथिनी के बाद अब गौ माता
आखिर कहां गयी मानवता?
रिश्ते होते केवल इंसानो के नहीं
वो भी किसी  की माताएं थी।
बेजुबानो पर परीक्षण
करना बन्द करो
देश की तरक़्क़ी के लिए
जानवरों को न तंग करो
अगर परीक्षण करना है तो
खुद के रिश्तों पर कर लो,
यदि मन नहीं करता है तो
रोबोट बना कर लो।
जानवरो को जानवर समझने,
की क्यों करते हो गलती
पता लगता जो आग इनके मुँह में जली,
तुम्हारे मुँह में जलती।
इनके बच्चों की थी क्या गलती?
जिन्होंने दुनियां ही नहीं थी देखी।
पर ऐसी दुनियां देखकर वी क्या करते,
वो भी किसी न किसी दिन ऐसे ही जलते

मेरी एक  अर्ज है छोटी सी इस जमाने से

जुल्म न करना कभी बेजुबानों पर,
वो भी हकदार है इस जमाने के।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


April 28, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in
जल संरक्षण

जल संरक्षित नही किया तो 
पानी की बूंद को तरस जाएगा।
एक बून्द पानी नहीं रहा तो
तू प्यासा ही मर जायेगा।।

दिन प्रतिदिन घटता पानी 
चिंता का विषय बन गया है।
गंदगी का पानी मे गिराना 
एक अभिशाप सा बन गया है।

पोखरों से वाष्प लेकर 
फिर बादल वर्षा करते है।
अगर पोखर ही नही रहे तो
वर्षा बिन देखना लोग कैसे मरते है।

बून्द बून्द कर बचा लो पानी
हा यही सही है हमारे लिए ।
नही तो भुगतना पड़ेगा नव पीढ़ियों को
पाप जो हमने किये।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा
April 15, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in

दो दिन का मेहमान

बस दो दिन की है जिंदगानी  मेरी, मौत दस्तक दे चुकी है।
बस दो दिन का मेहमान हूँ मैं, ये मौत मुझ से कह चुकी है।।

बहुत दिनों से कुछ बातें जहर बनी हुई है मेरे मस्तिष्क में।
अंतिम समय आ चुका है मेरा, ये मौत मुझसे कह चुकी है।।

कुछ हसीन लम्हें ही रक्षक बने हुए थे  मेरे  जिंदा शरीर के।
अब वो भी धूमिल हो चुके, अब राख ही बाकी रह चुकी है।।

मैं पसंद नहीं था तेरी, बाबुल ने तेरी जिंदगी खराब कर दी।
ये खटक रही थी जहन में मेरे, अब आँखों से बह चुकी है।।

वैसे तो रोज, पल - पल  मरता हूँ मैं, तुझसे नाराज हो कर।
कब तक मरता रहूंगा मैं यों, नहीं बाकी मुझ में  रह चुकी है।।

हा, हो सके तो थोड़ा सुकून पहुँचा देना मुझे गले से लगाकर।
गुंजाइश है तो वरना मौत तो अपना अंतिम निर्णय ले चुकी है।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


April 12, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in
मेरा गांव

सूरज की आभा महान
रोज सो कर उठता इंसान
चिड़िया चहके उन्मुख गगन 
मनोहारी होती जहां की सांझ
मुझे याद आया मेरा गांव ।
जहा मिलती थी ठंडी छांव
पनिहारिन की मोहनी मुस्कान
खिलते हुए खेत खलिहान
मुझे याद आया मेरा गांव
वो चंपू अंकल की दुकान
चुरा लाते थे चुपके से समान
स्वच्छ हवा, स्वच्छ आसमान
मुझे याद आया मेरा गांव।
खुली सड़के, खुले मैदान
जिंदगी जीते है लोग जहां
गौ है माता जहां की
पत्थर भी है पूजनीय वहां
मुझे याद आया मेरा गांव।
अनुभव है चौपालों की शान
सलाम करता हर इंसान
आदर, सत्य, और संस्कार
कूट कूटकर भरे है जहां
मुझे याद आया मेरा गांव।
हर गरीब अमीर के चेहरे पर मुस्कान
असंतोष नही पल भर का जहां
खुश रहते है परिवार में रहकर
है नहीं जहा दुख का नाम
मुझे याद आया मेरा गांव।

स्वरचित
-:-सुखचैन मेहरा-:-
April 06, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
-:-क्यों नहीं चाहते?-:-

साफ स्वच्छ रहना सब चाहते है  कोरोना कोई नहीं चाहते
सुविधाएं सब चाहते है, सरकार का होना क्यों नही चाहते?

फरमान है देश की सरकार का, मत निकलो घर से बाहर
घूमते कुछ बेवजह बाजारों में,  घर रहना क्यों नहीं चाहते ?

बढ़ रही है तादात कोरोना के मरीजों की देश मे दिनों दिन
छुपा रहे है बीमारी को कुछ, जांच कराना क्यों नहीं चाहते?

बुद्धिजन गए थे वतन छोड़कर विदेशों में, नतीजा सामने है
गए तो गए वायरस ले आये,  वहा रहना  क्यों नही चाहते ?

माना घर लौटना चाहते है ये लोग जो वर्षो से दूर थे घर से
किसी ने नही संभाला उन्हें, संभालना  क्यों  नही  चाहते?

हा पालन किया है जनता ने फरमान  का थालियां बजाकर
घरों में बजानी थी गलियों में नहीं, समझना क्यों नहीं चाहते?

नही मालूम क्या चाहती है  जनता? क्या जहन में चल रहा है?
किंतु फैल जाए कोरोना पूरे देश में, कुछ यों ये हम नहीं चाहते।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा

March 22, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

कोरोना को हराना है

जनता कर्फ्यू की पालना करके  कोरोना  को हराना है
लोगो के बहकावे में न आकर कर्फ्यू सफल बनाना है।

मत करना पक्ष किसी भी राजनैतिक पार्टी विशेष का
राजनीति से उभर कर भारत देश को आगे  बढ़ाना है।

कोरोना की  जिंदगी केवल चौदह घंटो  की  है  दोस्तो
हमे इसे सोलह घण्टे बाहर न  निकलकर मिटाना है ।।

अपने हाथों में है  इलाज इस  वायरस  का , दोस्तो
फिर क्यों किसी और के  आगे  हाथ  फैलाना  है।।

जनता जनार्धन एक शक्ति है सर्वोच्च इस देश की
हम सब ने मिलकर इसे फिर से सार्थक  बनाना है।।

अफवाहों  से दूर   रहना, मेरी अर्ज  यही है  दोस्तो
भारत के लोग है दोस्तो भारत को आगे बढाना है।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


February 24, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

किस्मत बनाम काबिलीयत

सोचा रब से तुम्हें मांग कर किस्मत की आजमाइश करता हूँ।

तुम तो मिल गये लेकिन तुम्हारा साथ  नहीं मिल पाया मुझे।।


किस्मत की क़िस्में  भी अलग - अलग होती है मेरे हमसाथी।

वास्तव में ये  थोड़ी  देर  से  ही सही  समझ  तो आया मुझे।।


रब से कुछ और मांगने की हिम्मत भी नहीं रही अब मुझमें।

रब ने मेरे दिल की  फरियाद सुनकर भी इतना रुलाया मुझे।।


सोचता हूँ तेरा साथ मांग  लेता हूँ रब से, शायद  मिल जाये।

अगर किस्मत फिर से हार गई तो? ख्याल ने है डराया मुझे।।


जिंदगी में कभी किसी को सब कुछ  नहीं मिलता हमराही।
काबिलियत भी मायने रखती है, किस्मत ने सिखाया मुझे।।

-:-स्वरचित-:-
सुखचैन मेहरा


February 24, 2020 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in

पति पत्नी और कोई तीसरा

वो रब से हमे अपना नाथ मांग बैठे है।
हम बेखबर है वो जज्बात मांग बैठे है।।

हमने उन्हें कभी उस नजरों से नही देखा।
वो है कि हमसे हमारा हाथ मांग बैठे है।।

दो पल साथ चलने की सोच न थी मेरी।
आज वो उम्र भर का साथ मांग बैठे है।।

हल्की सी बात होती थी बस हमारे बीच
वह रोज रोज की मुलाकात मांग बैठे है।।

कह दिया मैंने किसी और का हूँ फिलहाल
फिर भी वो अपने घर बारात मांग बैठे है।।

प्रेम प्रस्ताव स्वीकार नहीं सात जन्मों तक
क्योकि ससुर से उनका साथ मांग चुके है।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


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