Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on December 03, 2020 with No comments | Categories: आ0 'सुमित्रा नन्दन पंत' जी, कविता, दिव्यांग, दिसम्बर 2020, भगवान
यह ऐसी रचना है जिसमें कोई भी भगवान को नहीं भूल सकता,वे याद आते ही रहेंगे।
विश्व दिव्याँग दिवस पर एक रचना
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बुरा समय जब भी करता अट्टहास
कर देता कुछ न कुछ अवश्य नाश
ये दिव्याँग लोग इसी समय की मार हैं
बेचारे अपनी अपनी पीडा़ से लाचार हैं।
इन्हें उपकार नहीं बस उपचार मिले
स्वाभिमानी बनाता हुआ सँसार मिले
जो कर सकते हों थोड़ा बहुत भी इस जीवन में
उन्हें अपने पैरों में खड़े रहने का उपहार मिले।
अच्छे लोगों की कमीं नहीं तो फिर ये क्यों भटकें
दीन भाव लिये इनके चेहरे उदास हो क्यों लटकें
थोडे़ प्रयासों से ही इनमें जीवन के भाव उमड़ सकते
यदि हो ऐसा तो ये तिरस्कृत घूँट फिर क्यों गटकें।
बस एक प्रयास बस एक प्रयास
जो इनको करा दे यह एहसास
कि इनमें अब भी हैं पूरी सम्भावनायें
और हर सम्पन्न की इनसे जुड़ी हैं भावनायें।
विश्व दिव्याँग दिवस पर जागे ऐसी चेतना
कि न हो किसी भी दिव्याँग की कभी भर्त्सना
इन्हें स्वावलम्बी बनाने के पूरे श्रम हों
ताकि इनकी परेशानियाँ कम से कम हों।
कृष्णम् शरणम् गच्छामि
स्वरचित
सुमित्रा नन्दन पंत

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