November 30, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

 शेर-4

1.
मेरे शब्दों ने खामोशी धारण की है
इसका मतलब ये नहीं है कि
मेरी खामोशी का कोई अर्थ नहीं है
बस समझने वाला समझ जाएगा
बाकी मेरे न चाहने वालो में से एक होगा

2.
तेरी सूरत पर है भोलापन
      पर तेरी अदाओं में शरारत है।

3.
बत्तीसी दिखाने में थोड़ा समय लगेगा हजूर,
क्योंकि उनकी चाल से थोड़ा देर से वाकिफ हुआ हूँ।
कुछ दिन यादों का काफिला साथ रहेगा,
और कुछ दिन उसकी बेवफ़ाई को याद कर रोऊंगा।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 25, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

झूठे यकीन के सहारे

"आज आखरी बार मिलना चाहती हूँ आपसे"  ये संदेश था... सुजल से बेइंतहा मुहब्बत करने वाली करिश्मा का।

सुजल संदेश पढ़कर विचलित हो उठा...उसने हाथोंहाथ करिश्मा को फ़ोन लगाया लेकिन उसने नहीं उठाया।

फिर सुजल बिना देर किए उस जगह चला गया जहां वह रोज मिला करते थे।

करिश्मा वहां बैठी आंसू बहा रही थी। 'क्या बात हो गयी है, बात तो बताओ??'सुजल ने आगे से उसके कंधों पर हाथ रखते हुए कहा।

करिश्मा बस लगातार रो रही थी...

'अरे! यार कुछ तो बताओ..' सुजल ने करिश्मा को झझकोरते हुए कहा।

सुजल...मेरी...मेरी.....

हां... हां... बताओ..

मेरी सगाई हो गयी है और कुछ दिन बाद शादी है...

सुजल अपना माथा पकड़कर बैठ गया। कहने लगा तूने तो मरते दम तक साथ निभाने की कसम खाई थी उसका क्या..???

इसमें मैं कुछ नहीं कर सकती...मैं तुझे बताने आयी थी कि आज के बाद मैं आपसे नहीं मिलने आऊंगी।

बात तो कर लिया करना।

'ठीक है' कहकर करिश्मा चली गई।

सुजल बैठा देखता रहा...जब तक वो आंखों से ओझल नहीं हो गई....

करिश्मा की शादी एक प्रद्युमन नाम के लड़के के साथ हो गई।

पहली रात तो ठीक से निकल गयी । क्योकि करिश्मा ने अपने पिछले जीवन का राज नहीं खोला था अभी तक।

बीच मे किसी अजनबी के फोन आया करते थे प्रद्युमन को कि 'तूने जिस लड़की से शादी की है वो किसी और के साथ प्यार करती है...💐💐💐

प्रद्युमन ने पूछा क्या सबूत है??

मेरे पास कुछ फोटोग्राफ्स है तुम राज भवन के पीछे आ जाओ।

मिलने पर उसने वो सारी फोटोज प्रद्युमन के हवाले कर दी...

लेकिन प्रद्युमन इतनी जल्दी किसी पर विश्वास करने वाला नही था उसने सोचा आज कल डिजिटल जमाना है किसी ने फ़ोटो एडिट कर दी होगी।

लेकिन उसे धीरे धीरे सक होने लगा कि करिश्मा उसके साथ थोड़ा सा भी वक्त नहीं निकालती  वो फ्री समय में मोबाइल पर ही व्यस्त हो जाती है।

पर प्रद्युमन करिश्मा को कुछ नहीं कहता क्योकि करिश्मा अब माँ बनने वाली थी।

(दो महीने बाद, गोवर्नमेंट हॉस्पिटल, जयपुर)

करिश्मा को प्रसव पीड़ा उठने के कारण हॉस्पिटल में भर्ती करवाया।

डॉक्टर ने कहा बड़े ऑपरेशन से बच्चा होगा।

प्रद्युमन घर पर आया था कुछ सामान की व्यवस्था के लिए क्योंकि प्रद्युमन को आज रात हॉस्पिटल में ही रुकना था।

प्रद्युमन शर्दी के कपड़े व अन्य जरूरी सामान इक्कठा कर ही रहा था कि उसे करिश्मा का मोबाइल दिखाई दिया।

वहां उसे सब कुछ पता चल गया और उस अजनबी की बातों पर भी यकीन हो गया था। सब संदेश पढ़ लिए थे प्रद्युमन ने सुजल व करिश्मा के...

उसने उसी वक्त गले में रस्सी डाली और भगवान को प्यारा हो गया।

(एक चिट्ठी करिश्मा के लिए छोड़ गया । और आखिरी तमन्ना लिखी की इसे करिश्मा ही पढ़े कोई और नहीं )

उधर उसी के पुत्र ने जन्म लिया ले लिया । करिश्मा को जब पता चला तो वो अपने किये पर पछता रही थी।

उसने वो चिट्ठी पड़ी तो लिखा था, ' मैंने तुम्हें शादी से पहले ही कहा था 'तुझे मैं पसन्द हूँ तो ही शादी करना लेकिन तू नहीं मानी जूठे यकीन के सहारे मुझे से शादी कर ली'

करिश्मा के आंखों में आंसू बह रहे थे और बच्चा रो रहा था ऐसा लग रहा था कि वो भी अपने पिता के जाने का शोक मना रहा हो....

जी वास्तव जिसे हम प्यार(दोनों तरफ से) करते है उसी से शादी करनी चाहिये , क्योंकि किसी दूसरे के साथ शादी करके तीन जिंदगियां खराब हो जाती है। एक स्वयं की दूजी उन दोनों की (जिसे छोड़ दिया है, जिसके साथ शादी हो रही है)

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 25, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

संघर्ष

मेरा तो सारा जीवन
संघर्षों से भरा पड़ा है
जब छोटा था तो
स्कूल जाता लेकिन
लिखने के लिए
पेंसिल नहीं थी
पेंसिल के लिए संघर्ष
छीना झपटी में
माथे पर घाव भी सहे
घर आता तो  बीमार माँ
को संभालने की जिम्मेदारी
भगवान के आगे हाथ जोड़े
शायद भगवान तक
पहुंची नहीं मेरी बात
मैने तो थे तरले तोड़े।
बचपन में मेरी जिम्मेदारियां बड़ी
मैं था छोटा।
गरीबी में भी संघर्ष जारी था
नहीं रुका।
बड़ा हुआ तो
अपने ही हक के लिए
संघर्ष किया।
साहूकारों ने था, हमारी भूमि पर..
कब्जा किया।
और आज तो
संघर्ष करने की
आदत सी पड़ गई है
जिंदगी एक संघर्ष है ये
खुद जिंदगी भी समझ गई है।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 20, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

सालगिरह

ऐ हमसफर  याद है  वो  पल,
जो हमने एक साथ बिताए थे।
क्या  याद  है  तुम्हे  वो  लम्हे,
जो मिलकर खास  बनाए  थे।।

हां, आज तारीख वही है लेकिन,
साल का अक्षर एक बढ़ गया है।
आज भी प्यार कम  नहीं  हुआ,
बल्कि ऒर ज्यादा बढ़ गया है।।

हां, यह  तन  का  रिश्ता नहीं है
दो  पाक  रूहों   का   रिश्ता  है।
उम्र   के   इस   पड़ाव   में   भी
मेरे  अन्तर्मन  की  मधुलिका  है।।

ये  सालगिरह  मुबारक हो प्रिया
कुछ  उपहार   है   तुम्हारे  लिए।
मुझे कुछ नही चाहिए  ओ प्रिया
तेरा  प्यार ही काफी  है मेरे लिए।।

उम्र नहीं  होती  प्यार   की  दोस्तो
प्यार  तो  बस  दिल  से   होता है।
दुया करो कि दिल  सदा जवां  रहे
ये रिश्ता बस दिल से ही निभता है।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 20, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

शब्द संग अर्थ

वर्ण से वर्ण मिला तूने  शब्द तो  बना लिया
अभी उन शब्दों का अर्थ समझना बाकी है।

लिख  डाली है  पंक्ति  "सोच अपनी-अपनी"
सहमति है, या स्वार्थीपन, समझना बाकी है।

गहराई में डूब गए गर  तुम  निकल न पयोगे।
कैसे पार करेंगे शब्दसागर, समझना बाकी है।

कुछ शब्द 'ठोकर' से है, कुछ वजह है जीने की
पर है कौन कौनसे वो  शब्द,  समझना  बाकी है।।

कुछ शब्द 'अहिंसा' से है, कुछ हिंसा के रखवाले।
हम किन शब्दों को  अपनाएं, समझना  बाकी है।।

कुछ शब्दों में  संसार  तो कुछ  में  है अकेलापन।
आप समझो, मेरे लिए तो 'माँ' शब्द ही काफी है।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 20, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

शरारतें

कुछ शरारतें है मन  मे, कुछ आशाएं  भी पाली है।
उतरी हुईं है जहन में, एक अवसर की ताक में हूँ।

मन विचलित हो उठा है तेरी  शरारती नजरें देख
मिलने को करता मन, हां उस पल की ताक में हूँ।

कभी कभी डर भी लगता है, ये मेरा बहम ही न हो
वो कभी आकर मिलेंगे, इसी आशा की ताक में हूँ।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 20, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

कुछ पंक्तियां - 3

आसान नही होता जिंदगी का सफर काटना
अगर जिंदगी में हमसफर का साथ न हो तो।

न जाने कहां खो गया है बचपन मेरा
जहां रोने मात्र से मनोकामना पूरी हो जाती थी
आज सोच रहा हूँ शायद कोई बचपन का बैकअप
होता तो अपनी जिंदगी गिरवी रखकर खरीद लेता।

बड़ी खमोशी से रहता था मैं गुमसुम
फिर।  हमसफर के    आ   जाने   से
जिंदगी के  मायने   ही   बदल।  गए।

बीतें पलों की यादें रह जाती है बस
पल तो न जाने कहाँ उड़ जाते है पंख लगाकर

अकसर याद करता हूँ उन पलों को
जो मैंने मेरे हमसफर के साथ बिताए थे
लेकिन अब उन्हें मेरी याद दिलाने के लिए
किसी खास लम्हें की फिर

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 18, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

तिरंगा

1.
तीन रंग का ये कैसा संगम
सर्वधर्म है इस में समाए
हरा खुशहाली का
केसरिया बलिदान का
पाठ पढ़ाये।
सद्भाव का  प्रतीक है सफेद
शान्ति का भाव जगाए।
2.
चले है विजयपथ पर तिरंगा लेकर
हम मंजिल को पा जाएंगे।
तिरंगा झंडा है हमारा सबसे प्यारा
हम इसकी शान बढ़ाएंगे।
3.
उस देश का मैं वासी हूँ,
तिरंगा है जिसकी शान।
जहां भगवान समान है
घर       के      मेहमान।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 17, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

तिरंगे की शान

कुछ पल  याद  आते  है हमें
जब  देश  मे  जंग  लगी  थी।
घर  पर सुरक्षित  थे हम सब
सरहद, मौत के संग लगी थी।।

वो तिरंगे  में   लिपटी  लाशें
मचा था हर तरफ कोहराम।
वो देखा था मौत  का मंजर
1857 का स्वतंत्रता संग्राम।।

वीरता  से  लड़  रहे  थे वीर
घर जैसे था  ही नहीं उनका।
हां,देश ही देश दिख रहा था
कुल तो जैसे नही था उनका

तिरंगे की शान  बचाने  को
जान न्यौछावर कर गए वो।
जुग - जुग याद आएंगे लाल
नाम देश का  कर  गए जो।।

आओ  आज याद करें हम
सरहदी  वीर  जवानों  को।
जिन्होंने  दुश्मन से डरकर
नही छोड़ा था मैदानों को।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 17, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

तिरंगा है शान हमारी

हम वतन वाले  वतन  से  प्यार करें।
तिरंगा है शान हमारी, हम मान करें।।

हां, गर्व  है देश के रखवालों पर हमें।
उनका हर अवसर पर गुणगान करें।।

कुछ शहीद हुए  है वो माँ  के  लाल।
चलो उनके लिए  हम  दीपदान करें।।

गुमनाम शहीदों को  भी याद करें हम।
चलो उनको सब मिलकर प्रणाम करें।।

खुश हो जाये जो आज भारत माता भी।
चलो सब मिलकर ये  अच्छा काम  करें।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 16, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

जुगनू

मैं जुगनू हूँ
जितना दिखने में सुन्दर हूँ
उतना ही किस्मत का मारा
पर कट जाते है समय से पहले
फिर फिरता हूँ मारा मारा।
लोग अंधेरे में छुपते है
मैं उजागर हो जाऊं
अब आप ही बताओ
मैं अपनी जान
कैसे बचाऊं...

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


November 16, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

बचपन

अब कभी मत रूठना ऐ मन मेरे
बचपन चला गया है
अब तो कोई  लापरवाही
नहीं चलने वाली
क्योकि बचपन.... चला गया है।
जिंदगी में तेरे लिए जो
मां बाप ने देखे है सपने।
उन्हें पूरा कर
अब तुझमे बचपना नही रहा।
याद तो आती होगी
बचपन के हसीं पलों की
जहन में छवि तो बनती होगी।
उन बचपन वाले मित्रों की।
पर अब क्या फायदा
क्योकि बस यादें ही बाकी है
बचपन तो रहा है नहीं

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 16, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

लम्हा लम्हा बीत रहा है

लम्हा लम्हा बीत रहा है
अतीत बन रहा है हर पल
आखिर कब समझेगा समय को
जब जीवन ही पतित गया तब।

समय की  नजाकत  समझनी  होगी
अगर  सफल   जिंदगी   में  होना है
हर पल की नजाकत समझनी होगी
अगर तूने हर हाल में सफल होना है।

पल पल जिंदगी का  अनमोल है
हर लम्हा  जिंदगी  का  बेमोल है
अब समझ जा वरना पछतायेगा।
बर्बादी में भी इसी का ही योग है।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 10, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

छठ पर्व

घर की  सुख  समृद्धि  बनी रहे
छठ   पूजा   के   साथ   हमेशा।
चार दिनों का है ये पर्व   हमारा
बिना 'मूर्ति' का है ये पर्व कैसा।।

राज पाठ सब गवां बैठे थे पांडव
स्वंय द्रोपदी तक को  हार गए थे ।
कृश्नादेश पर द्रौपदी ने किया व्रत
तब जाकर पांडव बहाल हुए  थे।।

सूर्य को देव मानकर करते है व्रत
सब  दूध   सूर्यदेव को  चढ़ाते है।
सेंधा नमक,  अरवा चावल  और,
कद्दू की सब्जी का भोग लगाते है।।

न अन्न  खाते  न  पानी पीते सब
सन्ध्याकाल  में  खीर  बनाते  है।
मेरे भारत देश का अनोखा  पर्व
छठ गीत विदेशी भी गुनगुनाते है।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 10, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

कान्हा की आवाज

सुन ओ कन्हैया
उलाहना दिया है
राधा ने ।
मुरली को थामे नहीं
मेरे मन के भाव
जगाता है।
माता श्री में तो हूँ
गोपालक, मधुरधुन
मैं गऊओं को
सुनता हूँ।
नही बेटा, जब गुजरे
राधा की गली
मुरली वादन बन्द
कर दिया कर।
उलाहना एक और भी है
तू गोपियों को भी
सताता है।
तू आवाज लगाकर
गऊओं को चरा।
नहीं माँ मैंने अगर आवाज दी तो
समस्त जगत् की गोपियां,
गौधन, जीव समूह
और न जाने कौन कौन?
मेरे आगे आगे विचरण करने लगेंगे।
फिर माँ तुझे तो उलाहनों
की आदत सी पड़ जाएगी।
माते तुम ही कह दो राधा से
मुरली छोड़, काज करे।
मेरी मुरली तो गऊओं
को समर्पित है...
राधा को तो मेरा सारा
जीवन ही अर्पित है...

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 10, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

दिल की आवाज

पहुंच   जाती  गर  आवाज  उन तक
तो  वो  हमें  याद तो  जरूर   करते।
मेरा  होने  की  जिद्द   तो   ना  सही
मुझसे मिलने की फरियाद तो करते।।

शायद 'रीति' की दीवार से  टकराकर
वर्णों में बिखर गई होगी मेरी आवाज।
या फिर किसी नई आवाज का जन्म,
आवाज मेरी लगी होगी बीच कतार।।

कोई दूसरी वजह भी ही सकती   है
मैं अभी  से   ये  भ्रम   क्यों   पालूं ?
हा, थोड़ा  इंतजार  ऒर   करता  हूँ
खुद को उसका गुनहगार  न बनालूं।।

वजह  चाहे जो   भी  हो,  विश्वास है
भूलना होता तो वो हमें हां, न करते।
यकीनन बेखबर है दिली आवाज से
वरना वो हमे इश्क वेपनाह न करते।।

पहुंच   जाती  गर  आवाज  उन तक
तो  वो  हमें  याद तो  जरूर   करते।
मेरा  होने  की  जिद्द   तो   ना  सही
मुझसे मिलने की फरियाद तो करते।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 09, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

भैया दूज व बालक तृष्णा

एक नन्हा बालक
हठ कर बैठा।
भैया दूज की
कहानी सुनकर।
माँ दीदी के हाथ का
खाना खाऊंगा।
खाना खा कर
धनवान बन जाऊंगा।
माँ कहां से लाती
उसकी बहन को,
बहन है ही नहीं थी
कैसे शांत करती
उसकी तृष्णा गहन को।
बालक हठ से कौन..
जीत पाया भला।
लिया है एक
लड़की को बुला।
बोला ये बहन नहीं
ये तो है रुबा।(लड़की का नाम)
फिर माँ ने एक ऒर
जुगत लडाई।
कपड़े की एक
गुड़िया बनाई।
उसके हाथ से है
खीर बनवाई।
हां अब जाकर
तृष्णा शांत हो पाई।
वो बालक कोई ऒर नहीं
मैं खुद 'सुखचैन' था भाई..

स्वरचित
सुखचैन मेहरा #9460914014


November 09, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

भैया दूज का त्यौहार

देखो 'भैया दूज' का  त्यौहार
लेकर आया है असीम प्यार।
भाई का जीवन सुखमय हो,
बहनों की बस यही है चाह।।

यूं तो खुश हैं परेशान करके
नहीं देख सकते परेशानी में।
हा ये रिश्ता है ही कुछ ऐसा
द्वंदता बनी रहती है कहानी में।

जब  दोनों  संग होते है तो
एक बार जरूर झगड़ते है।
कोई बात मनवानी  हो तो
मिनतें, पैर तक पकड़ते है।।

उमंग से भरा आज का  दिन
भाई की लंबी उम्र की चाहत।
जब नसीब में न हो बहन,तब
भावनाएं भी होती  है  आहत।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 09, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह 1 comment

हमसफर नहीं चाहिए (काल्पनिक)

जिंदगी के इस सफर में एक हमसफर की जरूरत तो होती ही इसमें तो कोई दोराही नहीं है। लेकिन मेरा कहना है कि मुझे हमसफर नहीं चाहिए। चलो बढ़ते है एक कहानी की ओर....

आज हम सब के लिए बहुत ही खुशी का दिन था, क्योंकि आज मेरे बड़े भाई की सगाई थी। सब तैयारी में लगे हुए थे। भाभियां भाई को बार बार छेड़ रही थी कि ' उनसे(मेरी होने वाली भाभी से) नजरें हटा लें।' भाई शर्माकर अपना चेहरा दूसरी तरफ गुमा लेता।

मेरी भाभियां बारी बारी से उनसे पूछ रही थी कि तुझे लड़का पसन्द है या नहीं...हर बार जवाब 'हां' में ही आया।

सगाई हो गयी । लगभग छः महीने हो गये। अब एक बात निकल कर सामने आई कि लड़की अभी शादी नहीं करना चाहती थी उन्होंने सिर्फ अपने माँ बाप के कहने पर हां कही थी..

मेरा भाई आज अपने आप को गुनहगार मान रहा है कि, मेरी ही गलती है मुझे उसे अकेले में पूछ लेना चाहिए था।'

परन्तु मैं इसमें मेरे भाई का गुनाह नहीं मानता। लड़की को भी चाहिए था कि वो अपनी दिल की बात माँ बाप को बताती।

तब से मेरी भी यही धारणा बन गयी है कि मुझे ऐसा हमसफर नहीं चाहिए जो मेरा साथ देने के लिए केवल इस लिए तैयार हो गया, उसके माँ बाप की मर्जी है उसकी खुद की नहीं।

मुझे अपने जिंदगी के साथ समझौता करने वाला हमसफर नहीं चाहिए ।

क्योंकि समझौतों से जिन्दगी बसर तो हो  सकती है लेकिन जी नही जा सकती। और हर एक लड़के/लड़की का सपना होता है

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 08, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

देश व गोवर्धन

भारत देश की हर बात निराली है।
हर  दिन होली हर रात दीवाली है।।

यहां अनमोल है हर जीव,  प्राणी।
गज  गनपत है, गो है माता रानी।।

एक गोपालक है भगवान अवतार।
जहां गोवर्धन एक पूजनीय पठार।।

गिरधर ने कनिका पर टिकाया था।
जब इंद्र देव ने  कहर बरपाया  था।

तब से है  ये  पठार भी  देव समान।
ऐसा है मेरा देश है मेरा देश महान।

भारत देश की हर बात निराली है।
हर  दिन होली हर रात दीवाली है।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 07, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

दीवाली व सिपाही

सरहदी सिपाही हूँ,  आज मैं भी दीवाली मनाऊंगा
दीप जलाकर सरहदी समय को यादगार बनाऊंगा।।

मेरी साथियों की शहीदी की याद भी मैं दिलाऊंगा।
भारत माता का गीत,  मैं  आज खुलकर सुनाऊंगा।।

प्रिय संग बीते पलों को याद कर,  दिल बहलाऊंगा
दुश्मनों को धूल चटाने की कोई नीति नई बनाऊंगा।

देश का रखवाला हूँ मैं दीवाली इस तरह मनाऊंगा।
दुश्मनों को चटाई  धूल  का  जश्न  भी मैं मनाऊंगा।।

क्या पता कब हिन्द देश के  मैं  काम  आ  जाऊं।
जब तक जान है मैं हर दिन दीवाली सा मनाऊंगा

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 07, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

दीपावली

दीपों का त्यौहार है दीपावली
खुशियों के संग मनाते जाओ।
रोशन कर  दो सारे  जहाँ  को
दीप  से  दीप  जलाते  जाओ।।

हरमन   से  तम  को   मिटाकर
ज्योतिर्मय ज्योत जलाते जाओ।
दीपों  का  त्यौहार है  दीपावली
खुशियों  के संग   मनाते  जाओ।।

दीन दुखियों के हर सुख दुःख को
अपने दुख सुख में मिलाते जाओ।
दीपों  का   त्यौहार  है   दीपावली
खुशियों  के संग   मनाते  जाओ।।

वैरी रहे  ना कोई  अब से तुम्हारा
हाथ  से   हाथ   मिलाते   जाओ।।
दीपों  का   त्यौहार है   दीपावली
खुशियों  के संग   मनाते  जाओ।।

हरिप्रिया की प्रतिमा को  तुम  अब
दीपों की आवली से सजाते जाओ।
दीपों  का   त्यौहार  है    दीपावली
खुशियों  के संग   मनाते  जाओ।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 06, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

कुसुम: भाग दूसरा

आज वो दिन आ ही गया था जब मैं अपने लक्ष्य में कामयाब हो गया और आज कुसुम के घर को विदा करना था...

मैं कुसुम को बताए बिना ही चला गया...
(पहले भाग से निरंतर.........)

इसके बाद तो वो बिल्कुल गुम सुम सी रहने लगी लेकिन मैं अपने काम मे व्यस्त हो गया।

वो फिर पहले की जैसी हरकतें करने लगी लेकिन घर वालों ने उसकी नॉटंकी समझ कर मुझे कोई सूचना नहीं दी।

फिर कई बार मैंने कुसुम की माँ से भी पूछा तो उन्होंने सत्य को छुपाया कहते रहे 'कुसुम बिल्कुल ठीक है...'

काफी समय बाद मेरे पास कुसुम की माँ का फोन आया कि 'कुसुम की हालत बहुत खराब हो गयी है।'
मैंने उन्हें एक दो रुक बाद आने का बोला। तब तक मेरी लिखी हुई टेबलेट्स देते रहने को कहा।

लेकिन मैं लगभग एक सप्ताह बाद वहां गया । जिस हालत में उसे छोड़कर गया था उससे कहीं ज्यादा हालत खराब थी

अब तो उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि वह सचमुच पागल है। बाल बिल्कुल बिखरे हुए और..और कोई उसके पास भी नहीं जा रहा था।

मैंने उसके पास जाने की कौशिश की तो उसने पास पड़ी एक बोतल उठा ली मुझे पर फेंकने की धमकी देने लगी....

मैं लगातार उसके नजदीक जा रहा था...आखिर में उसने मेरी तरफ बोतल फेंक ही दी लेकिन गनीमत रही कि वो मेरे नीचे बैठ जाने से सर को छूती हुई निकल गयी और दीवार से टकराकर चूर हो गयी...

अरे! कुसुम मैं डॉक्टर....

कौनसा डॉक्टर...तू डॉक्टर है मुझे तो मरीज़ लग रहा है?

मरीज???(मन में)

मरीज हो ना तुम..?

हां मैं ....मरीज हूँ.. उसे अपने सीने लगाते हुए कहा....

तब जाकर शांत हुई वो..

धीरे धीरे कुसुम मुझे पहचानने लगी जब भी दूर जाता वो रो पड़ती।

लेकिन घर के बाकी सभी सदस्यों के साथ उसका पहले जैसा ही व्यवहार करती।

एक दिन मैंने उससे पूछ ही लिया कि तुम मुझे घर क्यो नही जाने देती...

कहने लगी 'मुझे पता नहीं...'

(कुसुम का मेरे साथ खुश रहना और अपनी माँ व अन्य से अलग व्यवहार करना कुछ समझ नही आ रहा था..)

वो कहीं ना कहीं मानसिक बीमारी की शिकार जरूर थी..

और रिपोर्ट आई कि इस बीमारी मे सुधार आना तो मुश्किल है लेकिन इसे यही जरूर रोका जा सकता है। क्योंकि बीमारी का समय रहते इलाज नही करवाया यदि उसकी माँ जब में उनसे मिला था तभी बता देते तो शायद सुधार होने की सम्भावना थी। अब कुछ नहीं हो सकता था।

कुसुम की माँ काफी समय से हमारी हर प्रतिक्रिया पर ध्यान रखे हुई थी...

उन्होंने बिना देर किए... मेरे माता पिता से मेरी और कुसुम की शादी की बात कर ली। सब सच सच बता दिया कुछ भी नही  छुपाया यहां तक कि लोग उसे क्या क्या कहते है बता दिया।

लेकिन मेरे माँ बाप को ये रिश्ता पसन्द नहीं आया, क्योंकि कुसुम अपने से कोई भी काम नहीं कर सकती थी...

मना करने पर कुसुम की माँ ने भी मुझे गुस्से में रोज आना जाना करने के लिए कह दिया मतलब अब वो मुझे रात को अपने घर रुकने नहीं देना चाहती थी।

कुसुम के घर जब मैं जाता, तब भी वो रोती और वहाँ से वापिस घर आता तब भी।

रोज रोज ऐसा होना मेरे लिए असहनीय था। अब मुझ नहीं रहा जा रहा था...।मैंने किसी न किसी तरह अपने माँ बाप को मना लिया।

हमारी शादी हो गयी। हमने अपने घर पर एक काम वाली बाई जी रख ली जो मेरी अनुपस्थिति में कुसुम का खूब अच्छे से ध्यान रखती।  मेरे घर आ जाने पर ही बाई जी अपने घर जाती।

कुसुम पागल थी तो दुनियां की नजरों में मेरी तो वो जिंदगी थी और हमेशा रहेगी..। लोग कहते थे अब तो ये सारी उम्र कुँवारी ही रहेगी कौन करेगा इस पगली से शादी..??? लेकिन मुझे पता नहीं ऐसा क्यूँ लग रहा था कि वो एक दिन जरूर ठीक हो जाएगी। ऐसा हो भी गया लेकिन खुदा को कुछ और ही मंजूर था। वो ठीक हो कर भी फिर से उसी बीमारी से गंभीर ग्रस्त हो गई ।

आज कुसुम जैसी भी है मेरी जिंदगी है और हम दोनों खुश भी हैं। एक नन्हा सी/सा महमान भी आने वाला/वाली है।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 06, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

भैया दूज

बांधे स्नेह बहन भाई को
कोई स्वार्थ नहीं है मन में।
शायद ही कोई रिश्ता हो
हमारे इस स्वार्थी जग में।।

भैया  दूज पर  उमड़  पड़ा
भाई बहन का  प्यार  देखो।
लड़ना,  झगड़ना  बना रहे
भाई बहन का संसार देखो।।

लंबी उम्र  की दुया करती  है
बहन 'भैया दूज' का व्रत कर।
बदले में भाई    भी  बहन को
सम्मान देता है उपहार देकर।।

यम को यमुना ने स्नेह बांधा
करवाया था,  भरपेट  भोज।
स्नान कर   यमुना  नदी  में
हुए पाप से मुक्त पापी लोग।।

एक मान्यता ये भी है जब जो
बहन के हाथ का भोज खाए।
वह भाई खुश नसीब है और
धन धान्य से परिपूर्ण हो जाए।।

सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 06, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

मेरी रूपमती

मेरे अंतर्मन में एक हलचल सी मच गई है प्रिय

जब से तेरे रूप की मादकता सिर चढ़ी है प्रिय।

बताओ तेरी  आंखों के नूर को मैं क्या उपमा दूँ
क्या तेरी तेरी जुल्फों को मैं नाग विषयर बता दूँ।

तेरी ऊंची लम्बी गर्दन को,  सुराही सी कह दूं क्या
तेरी पतली कमर, चाल मस्तानी को क्या दूं उपमा।

साक्षात रूपमती  लग रही हो, मुश्किल है व्यख्यान

सिर से पांव तक एक हूर सी,रूप माता का वरदान।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014




November 05, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

धनतेरस और कुम्हार

सजी हुई साज दुकाने धनतेरस के आगमन पर
खुशी का माहौल है चहुँ ओर असर हर जन पर।

सजाई  है दुकान  एक कुम्हार ने भी बीच बाजार
एकलौती दुकान है, फिर भी ग्राहकों का इंतजार।

चारों ओर से घिरा है कृत्रिम सज्जा की दुकानों से
आज बेगानापन पनप रहा है,मेरे देश के इंसानों में।

क्यों विश्वास करे जनता, चाइना की फुलझड़ियों में
दीपों सी रोशनी कहाँ, कृत्रिम प्रकाश की लड़ियों में।

आँखों में आई चमक,  अब ग्राहकों के आ जाने  से
हा खुश था वो दीपकों के प्रति सजग हुए जमाने से।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 04, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

देश व पुस्तक

[1]
ना बेईमानी
ना ही रिश्वत खोरी
देश महान।
[2]
देश हमारा
सैनिक है रक्षक
तभी महान
[3]
काले अंग्रेज
अनपढ़ नेता जी
कष्ट में देश।
[4]
आयुध ध्वस्त
हो चहुँ द्वार बन्द
पुस्तक राह
[5]
पढ़ो पुस्तक
हो पुनर्जागरण
प्रति साहित्य।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 03, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

अहंकार पर शेर

हमें अहंकार तक होने लगा था
किसी बफा पर, पर
उनकी बेबफाई ने
अहंकारी होने से बचा लिया।

अहंकार का रास्ता लोग जानते है
कि वो मृत्यु लोक तक चलता है
लेकिन पता नहीं क्यो लोगों में
अब मौत का ख़ौफ नहीं...

है मनुष्य उस अहंकारी
रावण की मौत भी सफल हो गयी
राम के हाथों मर कर,
लेकिन आज के युग मे अहंकार करेगा
तो तुझे मरना भी एक अहंकारी के ही
हाथों से होगा...इसलिए आज के युग मे
अहंकार करना भी, एक मूर्खता मात्र है...

स्वरचित
सुखचैन मेहरा... # 9460914014


November 03, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

अहंकार व गर्व

अहंकार   टकराया आज   गर्व  से
बोला  तु  अच्छा और  में  बुरा क्यूँ?

"मैं श्रेष्ठ हूँ"  ये  मैं   कहूँ  बोला गर्व
पर तूने स्वयं को ही श्रेष्ठ बोला क्यूँ?

मेरी मेहनत से मुकाम पाया है मैंने
बता किसी के  आगे  मैं  क्यों झुकूं?

तू मेहनती अकेला नहीं दुनियां में
बस मैं मेहनत करके संतोष  रखूं।।

मुझे मेरी काबिलियत  पर शक  नहीं
मैं काबिल, सशक्त हूँ,  बुजदिल नहीं।

तू कबिल है तू सशक्त है ये  माना मैंने
तू  ही  काबिल है, ये  नीति सही नहीं।

मेरे पास कोई तर्क नही मैं हार गया हूँ
"मैं" अब नहीं रहा अब बाकी मुझ में।

बस अब तू भी गर्व है और मैं भी गर्व
अब जिंदा है तू मुझ में और मैं तुझ में।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 02, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

कुम्हार का अतीत


दरवाजा खोलो कुम्हार अंकल

कौन???

दीपक लेने आया हूँ..

आँखे नम हुई... बोला

अतीत याद दिला दिया बेटा

मैंने तो अबकी बार

दीये बनाये ही नहीं..

बना लो अंकल

मैं कल लेने आऊंगा दोबारा।

वो लड़का खुद तो चला गया

लेकिन मुझे अतीत में छोड़ गया

वो मिट्टी के दीपकों से

जगमगाता हर घर का बनेरा..

वो दीपकों की रोशनी से

झिलमिल करती दीपावली की रात..

लोगों की मिट्टी के प्रति आस्थाएं.

हर कुम्हार के घर 

लोगों की लगी एक लंबी कतार...

ये सब आज एक अतीत बनकर

रह गया।

ये छोटा सा बालक

मुझे होसंला सा दे गया।

कोई खरीदे ना खरीदे...

मैं अबकी बार

दीपक जरूर बनाऊंगा...

मिट्टी का महत्व क्या है

हरजन तक पहुँचाऊंगा ।

'यांत्रिक लड़ियों' की दुकानों के बीच

मैं अपनी 'मिट्टी के दीपकों' की
भी दुकान सजाऊंगा..

(दीपावली पर मिट्टी के दीपकों के उपयोग करने के विनम्र निवेदन के साथ मेरी प्रस्तुति)


स्वरचित


सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 02, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

अतीत

नम हुई क्यों तेरी आँखे?
अतीत में चली गयी थी...
क्या देखा अतीत में ?
बताती हूँ.....
अतीत में देखा कि
एक नन्ही कलि
घूम रही है आंगन में
माँ पीछे-पीछे और
वो आगे-आगे...
बड़ी शरारती है,
बहुत सताती है
अपनी माँ को...
कभी माँ को घोड़ा बनाती
तो कभी हाथी,
नन्ही कलि बड़ी हुई
सताना फिर भी नहीं छोड़ा,
माँ के गाल खेंच
स्कूल दौड़ जाती..
माँ को माँ नहीं दोस्त बताती।
फिर उसके बाद
माँ की सूरत कभी न देखी..
क्यों..?
माँ की तस्वीर
घिर गई थी फूलों से..
बाबू, भाई...ने दिलासा दिया।
और उसे खूब पढ़ाया,
हर खुशी पूरी की।
फिर इक दिन
पराया कर दिया..
फिर....???
तेरे संग प्रीत लागी
और अब तुम्हारे साथ बिताया
हर पल अतीत बन रहा है..
लो कुछ पल पहले
की बातें भी अतीत बन गयी।
सिर्फ अपना ही नहीं.बल्कि
सभी का हर पल
हर लम्हां अतीत बन रहा है...
(अपने प्रिय के कंधे पर सर् रखते हुए कहा)

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 01, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

माँ की ममता - 2

[1].
लब्ज़ नहीं है माँ
तेरी ममता के लिए
मेरे पास कहने को
वरना ये लोग तो
मेरी बहुत  बोलने वालों में
गिनती करते है।

[2].
कलम उठाई थी माँ
तेरी ममत्व भाव को
लिखने के लिए मैंने
लेकिन
कलम की नोंक के
आँसू देख
मन भर गया मेरा
ऐसे लगा कि
कलम से बर्बस्ता
कर रहा हूँ..

[3].
माँ तेरी ममता का
व्यख्यान
सुना है...
भगवान स्वयं भी
नहीं कर पाये।
और मैं मूर्ख ने
ये जानते हुए
भी कलम उठाली!

स्वरचित
सुखचैन मेहरा #9460914014


November 01, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

माँ की ममता

माँ की ममता क्या है?
पता नहीं
माँ से बिछड़े
उस नन्हे बालक
को ।
कभी माँ के
अंक में
खेला हो तो
पता चले
कि क्या है ?
माँ की ममता।
कभी सूरत ही नहीं देखी
इक माँ की
कभी माँ का आँचल
ही नहीं मिला।
जब कभी नींद आयी,
तो बस सो गया
नील गगन की छांव में।
जब कभी भूख लगी
तो जो मिला खा लिया।
वो माँ के हाथ का तो
खाया ही नहीं
उसको क्या पता
क्या होती है माँ की ममता
जिसने माँ का सानिध्य
पाया ही नहीं.....

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


November 01, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

धरती माता (तांका लेखन)

[1]
धरती माता
आँखों से आँसू बहे
पर्यावरण
दुश्मन बेटे स्वंय के
असफल रक्षक।

[2]
है मातृभूमि
वनसम्पदा घटी
हृदयाघात
अपने ही अघाती
कौन बने रक्षक।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


November 01, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments


ज्योति


मद्म हो रही ज्योति जो शहीदों ने

जलाई थी।

जाने क्यों जान उन्होंने हमारे लिए गवाई थी ।।


खून कुछ दिन उबाले खा कर रह गया सबका।

बड़ी मुश्किल से आसिफा ने अलख जगाई थी।


आज देश में प्रशासन व्यवस्था पर हालात हावी।

ऐसा क्यूँ हुआ जब कि उन्होंने शपथ खाई थी।।


हा, नोटा की जरूरत क्यूँ पड़ी आखिर चुनाव में।

जब संविधान में तो लोकतंत्र व्यवस्था अपनाई थी।।


कौन जगायेगा 'ज्योति'  हिंदुस्तानियों के दिलों में।

जो राम राज्य की परिकल्पना यथार्थ हो पायेगी।


सुखचैन मेहरा # 9460914014



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