November 02, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
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कुम्हार का अतीत


दरवाजा खोलो कुम्हार अंकल

कौन???

दीपक लेने आया हूँ..

आँखे नम हुई... बोला

अतीत याद दिला दिया बेटा

मैंने तो अबकी बार

दीये बनाये ही नहीं..

बना लो अंकल

मैं कल लेने आऊंगा दोबारा।

वो लड़का खुद तो चला गया

लेकिन मुझे अतीत में छोड़ गया

वो मिट्टी के दीपकों से

जगमगाता हर घर का बनेरा..

वो दीपकों की रोशनी से

झिलमिल करती दीपावली की रात..

लोगों की मिट्टी के प्रति आस्थाएं.

हर कुम्हार के घर 

लोगों की लगी एक लंबी कतार...

ये सब आज एक अतीत बनकर

रह गया।

ये छोटा सा बालक

मुझे होसंला सा दे गया।

कोई खरीदे ना खरीदे...

मैं अबकी बार

दीपक जरूर बनाऊंगा...

मिट्टी का महत्व क्या है

हरजन तक पहुँचाऊंगा ।

'यांत्रिक लड़ियों' की दुकानों के बीच

मैं अपनी 'मिट्टी के दीपकों' की
भी दुकान सजाऊंगा..

(दीपावली पर मिट्टी के दीपकों के उपयोग करने के विनम्र निवेदन के साथ मेरी प्रस्तुति)


स्वरचित


सुखचैन मेहरा # 9460914014


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