Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on November 06, 2018 with No comments
मेरी रूपमती
मेरे अंतर्मन में एक हलचल सी मच गई है प्रिय
जब से तेरे रूप की मादकता सिर चढ़ी है प्रिय।
बताओ तेरी आंखों के नूर को मैं क्या उपमा दूँ
क्या तेरी तेरी जुल्फों को मैं नाग विषयर बता दूँ।
तेरी ऊंची लम्बी गर्दन को, सुराही सी कह दूं क्या
तेरी पतली कमर, चाल मस्तानी को क्या दूं उपमा।
साक्षात रूपमती लग रही हो, मुश्किल है व्यख्यान
सिर से पांव तक एक हूर सी,रूप माता का वरदान।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014

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