November 16, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on November 16, 2018 with No comments

जुगनू

मैं जुगनू हूँ
जितना दिखने में सुन्दर हूँ
उतना ही किस्मत का मारा
पर कट जाते है समय से पहले
फिर फिरता हूँ मारा मारा।
लोग अंधेरे में छुपते है
मैं उजागर हो जाऊं
अब आप ही बताओ
मैं अपनी जान
कैसे बचाऊं...

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


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