Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on November 03, 2018 with No comments
अहंकार व गर्व
अहंकार टकराया आज गर्व से
बोला तु अच्छा और में बुरा क्यूँ?
"मैं श्रेष्ठ हूँ" ये मैं कहूँ बोला गर्व
पर तूने स्वयं को ही श्रेष्ठ बोला क्यूँ?
मेरी मेहनत से मुकाम पाया है मैंने
बता किसी के आगे मैं क्यों झुकूं?
तू मेहनती अकेला नहीं दुनियां में
बस मैं मेहनत करके संतोष रखूं।।
मुझे मेरी काबिलियत पर शक नहीं
मैं काबिल, सशक्त हूँ, बुजदिल नहीं।
तू कबिल है तू सशक्त है ये माना मैंने
तू ही काबिल है, ये नीति सही नहीं।
मेरे पास कोई तर्क नही मैं हार गया हूँ
"मैं" अब नहीं रहा अब बाकी मुझ में।
बस अब तू भी गर्व है और मैं भी गर्व
अब जिंदा है तू मुझ में और मैं तुझ में।।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014

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