December 11, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

शिक्षा कहती है

शिक्षा कहती है
उस भगवान से डर।
शिक्षा कहती है
तू गुनाह न कर।
शिक्षा कहती है
रख दुनिया की खबर।
शिक्षा कहती है
ना रह बेखबर।
शिक्षा कहती है
उतार तनाव का ज्वर।
शिक्षा कहती है
जी चाहे वो कर।
शिक्षा कहती है
बोल मीठे मीठे स्वर।
शिक्षा कहती है
कदर माँ बाप की कर।
शिक्षा कहती है
अपराध न कर।
शिक्षा कहती है
तू संघर्ष कर।
शिक्षा कहती है
तू सही है तो मत डर।
शिक्षा कहती है
सामना बाधाओं का कर।
शिक्षा कहती है
सहायता निर्धनों की कर।
शिक्षा कहती है
दुःखियों के दुखों को हर।
शिक्षा कहती है
मत रह गवार बनकर।
शिक्षा कहती है
जी इंसान बनकर।
शिक्षा कहती है
बन तू सच्चा हमसफ़र।
जी तू इंसान बनकर, जी तू इंसान बनकर।।

(सच मे शिक्षा बहुत कुछ कहती है,
जो कहती है अच्छा कहती है, सच कहती है।
जरूरत तो है बस चुपकरके सुनने वाले की और शिक्षा के बताए रास्ते पर चलने वाले की)

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


November 16, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

क्यों सुख की तलाश में तुम वर्तमान का सुख गवा रहे हो
चैन की जिंदगी जीने को वर्तमान की नींदें उडा रहे हो।
क्यों   करते   हो   भविष्य  की    चिंता, वर्तमान गवाकर
जी लो सुखचैन की जिंदगी, क्यों बेबजह फड़फड़ा रहे हो।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा

September 09, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

प्रेम का तराना

आज मैं मेरी संवादयिक रचना में एक अच्छे घर की संस्कारी बेटी और उसे अच्छे लगने वाले वास्तव में अच्छे लड़के दोनों के प्रेम के आलम को लिखने जा रहा हूँ.....

लडकी लड़के की प्यारी प्यारी, निहायत ही मनभावनी बातो से वशीभूत हो कर उस लड़के से कहती है।

लड़की

तू इतनी प्यारी बातें मत किया कर,
मेरे मन को बैचेनी मत दिया कर।
तुझे क्या पता , कैसे मन को काबू करती हूँ,
मेरा ख्याल रख जरा मैं लड़की से पहले
एक अच्छे खानदान की बेटी हूँ।

अब देखो इस लड़की ने अपने दिल की बेचैनी को उपरोक्त पंक्तियों में वयां कर दिया। अब लड़के ने पता क्या जवाब दिया? सुनिए

लड़का

मैं ऐसा ही हूँ, बताओ क्या करूँ ?
आप कहते हो तो बात ना करूँ?
आदत है, जो मन में है सो कह देता हूँ,
अगर आप अच्छे खानदान की बेटी हो तो
मैं भी एक आज्ञाकारी बेटा हूँ।

(अब लड़के की 'बात न करने' की बात सुनकर लड़की का मन और ज्यादा व्याकुल हो जाता है। लेकिन प्यार का इजहार पहली बार में करना बड़ा मुश्किल होता है। फिर मन समझाकर कहती है-)

लड़की

हा ठीक है, बस यही ठीक रहेगा।
तभी सुकून से समय बीत सकेगा।
तेरे बारे सोच, वक्त जाया कर लेती हूँ,
मेरा ख्याल रख जरा मैं लड़की से पहले
एक अच्छे खानदान की बेटी हूँ।

(अब लड़का उससे पूछता है कि)

लड़का

क्यूँ  सोचते हो आप मेरे बारे में?
क्यूँ  बांधा है दिल के  पिटारे में?
चलो, नहीं करता बात मैं आज कह देता हूँ,
अगर तुम अच्छे खानदान की बेटी हो तो
मैं भी एक आज्ञाकारी बेटा हूँ।

(लड़की को पता है कि लड़के से बात किये बिना वो रह नही सकती। अब आगे लड़की कहती है-)

लड़की

अरे! बाबा तू मेरी क्यों सुनता है...?
मेरे  दिल की क्यों नहीं सुनता है...?
अब कैसे बताऊं तुझे दिल मे बसाए बैठी हूँ,
मेरा ख्याल रख जरा मैं लड़की से पहले
एक अच्छे खानदान की बेटी हूँ।

(ये सुनकर लड़का ख़ास लहजे से सिर हिलाकर मुस्करा देता है और कहता है-)

लड़का

इतनी देर क्यों  लगा दी इजहार में?
हा, मैं भी फना हूँ प्रिय तेरे प्यार में।
दिल देकर, दिल का कमरा खाली  कर बैठा हूँ,
अगर तुम अच्छे खानदान की बेटी हो तो
मैं भी एक आज्ञाकारी बेटा हूँ।

यह सुनकर लड़की खिलखिलाकर हसने लगी, और बोली

लड़की

मेरे लिए तूने दिल का कमरा  खाली किया?
ले आज से मेरा दिल भी मैंने तुम्हे दे किया।
चुप रहना, जगत् से बचकर, कह देती हूँ
मेरा ख्याल रखना जरा मैं लड़की से पहले
एक अच्छे खानदान की बेटी हूँ।

(अब लड़के ने सुंदर सा जवाब दिया)

ठीक, तेरे बाबुल की पगड़ी का ध्यान रखूंगा
तेरे धवल दामन  पर भी दाग  न लगने दूंगा।
तू चिंता न कर, पूरा करता हूँ जो भी मैं कहता हूँ।
अगर तुम अच्छे खानदान की बेटी हो तो
मैं भी एक आज्ञाकारी बेटा हूँ।

दोनों एक दूसरे को पाकर खुश हो गए और अब तक खुश है।


स्वरचित
सुखचैन मेहरा

September 09, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

चलो सखी सावन आया

चलो सखी सावन आया
नया सवेरा नई उमंग लाया,
अपनी सखियों ने भी
पीपल की घनी छाओं में
अपना अपना डेरा लगाया...
चलो सखी सावन आया।
गोल गोल घूमे,
मस्ती में सब झूमे
पीपल की छाओं में
हम झूला झूले
बचपन की यादें साथ लाया...
चलो सखी सावन आया।
मौसम की मस्त बहार
सावन की ठंडी फुहार
तन मन हुआ
शीतल हवा का शिकार
मन को बहुत भाया
चलो सखी सावन आया।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


September 04, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

माँ मेरी जान की  कीमत कितनी थी
हुई बेबसी की शिकार बस इतनी थी

एक पल दूर नही करती थी नजरों से
क्यों भनक नहीं रही  तुझे  इतनी सी।

कोई निकाल न पाया मुझे कुएं में से
भले मैं जोर से चिल्लाई जितनी थी।

आँखे खोलकर भी मैं देख नहीं पाई
रोशनी मिशाल से जलाई कितनी भी।

आखिरकार दम तोड़ ही गयी मैं माँ
थक हार कर मैंने आंखे बंद  की थी।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


June 11, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments Posted in

"क्यों करता हूँ मोह मैं इतना,  चलो कम कर देता हूँ
क्यों जताता हूँ हक मैं इतना, चलो कम कर देता हूँ।
दुनियां की नजर है बुरी मेरे हमदम अलग कर देगी
क्यों हसाता हूँ तुम्हें मैं इतना, चलो कम कर देता हूँ।।"

"दो दिन है जिंदगानी के, जी भर के जी लेने दो
दिल में छुपाए राज आज मुझे तुम कह लेने दो।
मैं रूठूँ  तो  मत  मनाना, मैं   बुरा  नहीं मानूँगा
तेरे संग रहना है अब, बस सुकून से रह लेने दो।।"

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


April 19, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

।।मुक्तक कविता : तुम देना साथ मेरा सनम ।।

जीवनसंगिनी

माँ का  घर  मैं छोड़ कर आई हूँ
घर से माँ की  तश्वीर   ले आई हूँ।
अब तुम  मुझे  अपना लेना साथी
एक घर  से  पराई होकर आई हूँ।।

जीवनसाथी

मेरा घर आँगन आज से तेरा हुआ
एकलौता दिल, आज से तेरा हुआ।
बस मेरे माता पिता अपने समझना
मेरा तन मन धन आज से तेरा हुआ।।

जीवनसंगिनी

मुझे  मेरी  माँ की  याद आ रही है
मुझ मेरे पापा की याद  आ रही है।
एक नए  परिवार  की  जरूरत  है
बिछड़े परिवार की याद आ रही है।।

जीवनसाथी

माँ से दूर हो तुम्हें याद तो आएगी
पापा से  दूर  हो  याद तो आएगी।
मेरे परिवार को तुम अपना समझना
परिवार से दूर हो याद तो आएगी।।

जीवनसंगिनी

तुम मेरा ख्याल रखोगे? वादा करो
अपनों  सा प्यार दो गे ? वादा करो।
अब तुम ही मेरा घर संसार हो साथी
तुम मेरा  संसार बनोगे? वादा करो।।

जीवनसाथी

अपना बनाकर रखूंगा, वादा है मेरा
दिल मे बसाकर रखूंगा, वादा है मेरा।
तुम भी  मुझे  पराया  मत  समझना
रानी सी सजाकर रखूंगा, वादा है मेरा।।

जीवनसंगिनी

घर की जिम्मेदारियां कैसे संभालूंगी?
जीवन की नोका को कैसे संभालूंगी?
अगर  डगमगा  जाए,  संभाल लेना
उफ्फ़! पता नहीं ये सब कैसे संभालूंगी??

जीवनसाथी

मत घबरा, तूम नाव, मैं पतवार बनूंगा
हर  मौसम, हर घड़ी  तेरे  साथ रहूँगा।
तुम देना साथ मेरा मेरे अज़ीज, हमदम
तेरे बिना तो मैं अकेला पड़ जाऊंगा।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


April 03, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

मेरी सुबह हो तुम
मेरी शाम हो तुम
मेरा कल  हो तुम
मेरा आज हो तुम।
क्या करूँ हमदम
डर लगता तुम से
वैसे तो  मूर्खों  के
सरताज  हो  तुम।।

मेरा मौन हो तुम
मेरी आवाज तुम
मेरा घर  हो  तुम
मेरा समाज हो तुम।
क्या करूँ हमदम
डर लगता तुम से
वैसे तो  मूर्खों  के
सरताज  हो  तुम।।

मेरा धन हो तुम
मेरा मन हो तुम
मेरा अंजाम हो तुम
मेरा आगाज हो तुम।
क्या करूँ हमदम
डर लगता तुम से
वैसे तो  मूर्खों  के
सरताज  हो  तुम

वैसे तो मूर्खो के
सरताज हो तुम
लेकिन.....  बड़े
लाजवाब हो तुम
मैं जान सकूँ  ना
वो राज  हो  तुम
मेरा तन  हो  तुम
लिबाज़  हो  तुम

(नाराज मत होइएगा अब जो बोलूंगा सच बोलूंगा।)

सच  कहता  हूँ  मैं
बहुत खास हो तुम
मेरी जिंदगी में आयी
दिन-रात  हो  तुम।
क्या  करूँ  हमदम
डर लगता तुम से
वैसे तो  मूर्खों  के
सरताज  हो  तुम।।

(मैं तो सुधरने वाला नहीं हूँ, क्योकि आज का दिन ही ऐसा है।)

स्वयं कथन

ये कविता सिर्फ  मनोरंजन  के लिए है।
जो इस समय पढ़ रहा है उसके लिए है

(गुस्ताखी माफ, ओनली मजाक)

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


March 21, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

होली तेरे संग प्रिये।

होली का  त्योहार  आया, प्रिये,
अपने संग खुशियां लाया, प्रिये।

आओ खेलो तुम मेरे संग, प्रिये,
लगाओ प्रेम रंग,अंग अंग,प्रिये।

तेरे बिन तो हर रंग बे रंग, प्रिये,
होली मोद तो तेरे ही संग, प्रिये।

भर लो प्रेम की पिचकार, प्रिये,
गिला कर दो रूह संसार, प्रिये।

ज़रा  और  पास आओ ना, प्रिये,
दूर रहकर यूँ तड़फाओ ना, प्रिये।

(वो पास आ चुके है ☺️☺️☺️)

कर तेरे दर्शन मन हुआ प्रसन्न, प्रिये,
मुझे तेरी रूह रंगनी है न  तन, प्रिये।

रंगों का त्योहार है रंग लगाऊं, प्रिये,
जी करे तेरे ही रंग में रंग जाऊं, प्रिये।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा

March 17, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

मेरा मन व्याकुल , है तन स्तब्ध
हीये में हलचल  सी  मचा रहे है।
बसन्त ऋतु के आगमन पर
है सखी, मेरे पिया घर आ रहे है।।

चूड़ियां खनकाऊँ, कुमकुम सजाऊँ
वो मेरे अन्तर्मन के भाव जगा रहे है।
बसन्त ऋतु के आगमन पर
है सखी, मेरे पिया घर आ रहे है।।

अजीब सी खुशी,अजीब तड़फ
न जाने इतनी देर क्यूँ लगा रहे है?
बसन्त ऋतु के आगमन पर
है सखी, मेरे पिया घर आ रहे है।।

न आँगन ठहरूँ ना तोरण ठहरूँ
बेचैन मन की व्यकुलता बड़ा रहें है।
बसन्त ऋतु के आगमन पर
है सखी, मेरे पिया घर आ रहे है।।

इंतजार खत्म, आ गये पिया
तोरण खड़े मंद मंद मुस्करा रहे।
बसन्त ऋतु के आगमन पर
है सखी, मेरे पिया घर आ गये है।

कर पिया दर्शन, मन हुआ प्रसन्न
वो मेरी हृदय सम्पन्दन बढ़ा रहे है।
बसन्त ऋतु के आगमन पर
जा सखी, मेरे पिया घर आ रहे है।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


March 14, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

होली के घाव


आज चारों और रंग ही रंग था सब हँसी खुशी होली का आनंद ले रहे थे। बच्चा बच्चा खुश था। 

लेकिन इनके बीच एक बच्चा निराश हताश बैठा था। उम्र कोई होगी 12-13 साल । मैंने उसके पास जाकर पूछा 'क्या हुआ'?

उस लड़के ने कोई जवाब नही दिया 

दुबारा पूछने पर भी कोई जवाब नही आया।

मैंने थोड़ा जोर देकर पूछा तो भी कुछ नही बोला।

बस वो देखे जा रहा था

मैंने उसके सर् पर लिया कपड़ा उतार दिया।

उसके सर् से खून आ रहा था हल्का हल्का सा। 

मैंने सामने से उसके कंधे पर हाथ रख झझकोरते हुए पूछा ये किसने किया 

उसने अपनी जीभ निकालकर इशारा किया कि बोल नही सकता।

ये देख मेरा मन करुणा से भर गया ।

वो भी थोड़ी दूर बैठे अपने छोटे बहन भाई की कोर इशारा करते हुए अपनी आंखें मसलने लगा।

मैंने देखा वहा छः साल का बच्चा और लगभग तीन साल की बच्ची बैठे रो रहे थे।

मैंने उससे इशारा कर पूछा वो कौन है ? और तेरे ये सिर पर चोट कैसे लगी।

उसने मुझे इशारे से पूछा कि कलम है ?

हा...

मैंने उसे अपनी पॉकेट में से कॉपी पेन निकाल कर दिया।

उसने जो लिखा उसे पढ़कर मैं अपनी आंखों में आंसू रोक नहीं पाया।

पता चला कि वो बच्चे उसके भाई बहन है। माँ बाप नहीं है।

इसके बाद मैं उसके हर एक इशारों को भली भांति समझने लगा। मुझसे  पढ़ा नही जा रहा था। मैंने उससे कागज वापिस ले लिया। बस उसके इशारों को समझते गया।

उसने सब कुछ समझा दिया इशारों इशारों में और लिखकर। यथा:-

मैं जब 5 वी में पढ़ता था तब एक हादसे में मेरी जीभ कट गई थी। 

वो मेरे छोटे भाई बहन है भाई ने रंग लाने के लिए जिद्द की । 

माँ बाप नहीं रहे।

मेरे पास रंग  के लिए पैसे नहीं थे लेकिन मैं अपने भाई बहन की आंखों में आंसू नही देख सकता।

मैं एक दुकानदार के यहाँ से एक रंग की पुड़िया चुरा लाया लेकिन उसके बेटे ने मुझे देख लिया।

इस बीच छीना झपटी में मेरे ये चोट लग गयी। 

लड़के ने अपनी व्यथा का बहुत ही मार्मिक चित्रण किया। 

मैंने अपने आंसू पोंछते हुए उसकी रोटी छोटी बहन को उठाया और भाई को भी साथ ले लिया।

वो लड़का आगे आगे चल रहा था मुझे उस बनिये की दुकान पर ले आया।

मैंने बनिये को पूरी स्थिति से अवगत करवाया। 

(अंत मे) चोर ओर मजबूर में अंतर होता है सेठ। वरना किसका जी चाहता है दस रुपये रंग की पुड़िया के बदले सिर पर घाव खाये।

बनिया सेठ को अपनी गलती का अहसास हो गया।

उसने बच्चों से हाथ जोड़ कर माफी भी मांगी। और रंग भी दिया । 

अब उन बच्चों के बड़े भाई को घाव का दर्द कम बल्कि अपने भाई बहन को रंग से खेलते खुशी ज्यादा हो रही थी।

मैं भी उसको सलाम करते हुए विदा हो गया।

स्वरचित

सुखचैन मेहरा


March 09, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

शादी से पहले की आजादी

आज पराग बहुत खुश था, क्योंकि शादी की तारीख तय हो चुकी थी। अब वो सोचने लगा कि बस किसी तरह ये महीना भी बीत जाए।

उधर कोमल (पराग की मंगेतर) की फ्रेंड्स ने कहीं घूम कर आने की योजना बनाई। कोमल मान गयी। कोमल का दोस्त आर्यन भी साथ मे ही था।

कोमल ने अपने माँ बाप से आखरी बार घर से बाहर कही घूम के आने के लिए पूछा।

माँ, शादी का महीना तय हो गया है, मैं इस घर से चली जाऊंगी। मेरी सहेलियां मुझ से बिछड़ जाएंगी। मैं एक आखरी बार अपने दोस्तों के साथ टूर पर जाना चाहती हूँ।

माँ: ठीक है बेटा मैं शाम को तेरे पापा से बात करती हूँ।

कोमल की माँ ने कोमल के पापा से बात की।

वो बोले, 'कोई ऊंच नीच हो गयी तो ?'

माँ: इतना तो विश्वास है हमें हमारी बेटी पर।

पापा: विश्वास तो है लेकिन आज कल समय सही नहीं है लड़कियों के लिए।

ये सब कोमल चुपके से सुन रही थी।

कोमल बीच में ही बोल पड़ी, 'पापा, आप कहते हो तो मैं कही नही जाऊंगी।

कोमलआ का उदास चेहरा देख कोमल के पापा ने हा कर दी।

कोमल बहुत खुश हुई।

अगले ही दिन सब दोस्त घूमने के लिए निकल पड़े।

वह सब गंतव्य जगह पर पहुंचे। सब बहुत खुश थे। हर एक पल को जी रहे थे। कोमल को फ़ोटो खिंचवाने का बहुत शोंक था। उसने ग्रुप में फ़ोटो खिंचवाई।

उसका दोस्त आर्यन ने उसके साथ एक सेल्फी लेने की इच्छा जताई। कोमल ने खिंचवा ली।

अब शाम हो चुकी थी। सब अपने अपने काम मे व्यस्त हो गए आर्यन ने कोमल को एक बात कहने का कह कर अकेले में मिलने को कहा।

कोमल ने मना कर दिया। लेकिन उसने दोबारा कहा तो मान गयी।

कोमल चली गयी। थोड़ी देर आर्यन और कोमल ने बातें की।

'अब एक महीना ही  रह गया है तेरी शादी में मेरा एक काम तो करदे।' आर्यन ने कहा।

'कैसा काम?' कोमल ने पूछा।

बस मुझे छूना है तुझे अभी नहीं शादी से एक दिन पहले या बाद में कभी भी।

कोमल ये सुनते ही आर्यन को एक तमाचा लगा वहां से चली आयी।

रमा के पूछने पर सब बताया दिया कोमल ने।  रमा बोली 'इसमें दिक्कत क्या है? मैंने भी किया था।'

(रमा शादीशुदा थी)

'अरे! मजे मार ले शादी के बाद सब खुहाइशें अधूरी रह जाती और पराग को कौनसा पता चलने वाला है ।'

(अब कोमल ने जो कहा सुनने लायक था)

'तू अपने दिल पर हाथ रखकर सोच कि तू किसी की पत्नी कहलाने के लायक है या नहीं।'

'अगर हम अपने होने वाले पति के लिए अपनी इज्जत बचा के नहीं रख सकते तो हम किस मुँह से उसे अपना पति परमेश्वर कहेंगे।'

(रमा बस चुप चाप सुन रही थी।)

क्या परमेश्वर के दरवार पर जूठा प्रसाद चढ़ा है कभी?

'अरे! हम सब इक्कठे पढ़ें है, इस लिए सोचा कि, शादी से पहले एक टूर शेयर कर ले एक दूसरे से।'

शादी से पहले मजे लेने का मतलब ये नही है कि, 'अपनी इज्जत तक दांव पर लगा दे। इक्कठा होने की खुशी ही कुछ अलग होती है यार।'

(रमा अपने आप के लिए शर्मिंदा थी और उसे कोमल की सोच पर नाज भी हो रहा था।)

वह सब अपने अपने घर लौट आये। कोमल ने उस बात को एक बुरा वक्त मान कर छोड़ दिया।

शादी से ठीक एक दिन पहले आर्यन का एक मैसेज आया कि, 'मुझे मिलो नही तो तेरी सारी तश्वीरें तेरे मंगेतर को दे दूंगा।'

कोमल ने उसका प्रतिउत्तर देते हुए लिखा कि, 'तूने जो करना है कर ले जब तक मैं सही हूँ मुझे डरने की कोई जरूरत नहीं।

(कोमल ने आर्यन को ब्लॉक कर दिया। आर्यन ने इससे ख़फ़ा हो कर वो सारी सेल्फियां, फोटोज पराग को सेंड कर दी )

पराग ने फोटोज देख कर जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं किया। पराग ने उसकी बहन (पड़ोसी बहन) को कोमल से बात करने का संदेश दिया।

फिर दोनों ने पापा के व्हाट्सएप्प नंबर पर बात करने का फैसला किया।

तकरीबन रात 10.14 मिंट पर बात शुरु हुई ।

पराग: हेलो जी।

कोमल: जी

पराग: आपके किसी फ्रेंड ने ये फोटोज भेजी है....

(फोटोज प्रेषित करते हुए लिखा)

कोमल: हा, ये मेरे साथ कॉलेज में पढ़ता है।

पराग: यदि कोई ऐसी वैसी बात है तो बता दो। कहीं आप दोनों एक दूसरे से प्यार तो नहीं करते? यदि ऐसी बात है तो मैं बीच मे से हट जाता हूँ।

कोमल: नही, ऐसी कोई बात नही है।

पराग: यदि कोई ऐसी बात है तो बता दीजिए क्योकि मैं किसी के प्यार को नहीं छीन सकता क्योकि आज तक किसी का प्यार छीनकर कोई खुश नहीं रह पाया।

कोमल: नहीं, आप यकीन मानिए ये मेरे साथ कॉलेज में पढ़ता है । हम एक ही क्लास में पढ़ते है। हम सिर्फ एक सहपाठी है।( टूर पर हुआ वो सब बता दिया।)

पराग: ठीक है, आप चिंता न कीजियेगा। मुझे आप पर पूरा यकीन है।

कोमल: ओके, थैंक्स। ऐसी कोई बात होगी तो सबसे पहले आपको बताऊंगी।

पराग: ओके, कोई बात नहीं। कहीं मरा मत देना जी। जिंदगी का सवाल है अपने दोनों की।

कोमल: आपको यकीन नहीं है अभी भी।

पराग: गुस्ताखी माफ कीजिएगा। मजाक कर रहा था।

कोमल: ओके, और बताओ

पराग: बस ठीक है...

(इस तरह जो भी बात थी क्लियर हो गई।)

शादी की सब तैयारिया हो चुकी थी

अब समस्या तब खड़ी हो गयी जब ये बात कोमल के माँ बाप को पता चली।

वो सोचने लगे कि ये सब टूर के दौरान हुआ है। ना टूर पर भेजते और ना ये बात होती।

जब पराग को पता चला कि कोमल के घर वाले उसे गलत समझ रहे है तो पराग ने कोमल के माता पिता से बात करके सब समझा दिया।

अगले दिन राहुल बैंड बाजा लेकर आ गया। कोमल के पास बहुत से उपहार इक्कठे हो गए। सब खुश थे।

शादी बड़ी धूमधाम से हो गयी।

उन उपहारों में से एक उपहार आर्यन का भी था। (उस उपहार पर उसका संक्षिप्त नाम A. K. (आर्यन कुमार) लिखा था)

कोमल उपहार को सबके सामने  खोलना नहीं चाहती थी।

कोमल की चचेरी बहन: खोलो ना दीदी......

एक अन्य: ये भी खोलो ना.....

कोमल की सहेली:- कोमल खोल इसे भी...

लेकिन कोमल उसे अभी भी खोलना नहीं चाहती थी। सोच रही थी कि कुछ गलत ना  हो इसमें ...

आखिर कोमल ने उस उपहार को खोल ही लिया। उसमें जो लिखा था पढ़कर कोमल का सारा डर छूमंतर हो गया।

उपहार में आर्यन का माफी नामा था। कोमल ने उसे सब के सामने पढ़ना उचित नहीं समझा। लेकिन उसमें लिखी एक एक बात आर्यन के सुधर जाने  की गवाही दे रही थी।

आज कोमल का जीवन बहुत हँसी खुशी बसर हो रहा है। जैसा पति कोमल को मिला वैसा पति भगवान सब को दे।

और.......

जैसी पत्नी पराग को मिली वैसी पत्नी भगवान सब को दे।

मेरे ख्याल से ऐसी जोड़ियां दुनियां की सबसे बेहतरीन जोड़ियों में से एक होती है।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


March 07, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

कहाँ बाँधोगी राखी को ??

भाई

बहना मेरी कलाई सलामत नहीं
तुम कहां बन्धों गी राखी को।
बिन हाथों के कैसे रक्षा करूँगा
क्या निभा पाऊँगा मैं साखी को।।

बहन

भाई तुम उदास ना हो इस दिन
पैरों पर बांध दूंगी मैं राखी को।
मेरी रक्षा तेरे दिए संस्कार करेंगे
हां ऐसे निभाएगा तू साखी को।।

भाई

फिर भी कमी तो कमी होती है
असफल हूँ कुछ भी करने में।
जब कोई मुसीबत आती है तो
विश्वास रखता हूँ मैं डरने में ।।

बहन

कोई कमीं नहीं दिखती तुझ में
किस्मत समझती हूँ तेरी बहन।
हार मत मान यूँ मेरे प्यारे भैया
आग उगले सदा जहरि जहन।।

भाई

छोटी है पर होंसले में है बड़ी
जिद्दी भी हो तु हमेशा से ही।
सही कहता हूं बिल्ली तुझको
काटती है जो मेरी बात कही।।

बहन

बिल्ली मत कहा कर भाई मुझे
आगे से मैं तुझे उल्लू नई कहूंगी।
पर लड़े बगैर नींद नहीं आती है
कभी कभी तो जरूर लड़ा करूंगी।।

भाई

ठीक, बांध दो राखी मेरे पैरों पर
सदा मुस्कराती रह दुया यही है।
आज से वो सब तुम करती जाओ
जो तेरे और सब के लिए सही है।।

बहन

ठीक है भैया, तेरे बताए रास्ते पर
सदा चली हूँ, आगे भी चलती रहूंगी।
तेरे जैसे मन का भाई रब सबको दे
बस रब से सदा यही दुया करूंगी।।

सुखचैन मेहरा #9460914014


March 01, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

कुछ मुक्तक -2

कैसे भुल सकता हूँ  उस  काली  रात को
जिसके बाद सवेर भी अंधेर में बदल गई।
लोक  दिखावे  के  लिए  खुश  रहता हूँ मैं
खुशी तो हमें कब से छूकर दूर निकल गई।

बार  बार  समझाने  की   गलती   अब  ना कर
है मेरे  सैनिक  अब  तू  घर में घुसकर बार कर।
दुश्मन के  बहम  को  मिटा दे   अब  अवसर है
मिटा दे हर दुश्मन को, माथे पर गोरी मार कर।।

वीर जवान  जो नही  रहे  उनका बदला  लेना  है
बर्दाश्त नही है कुछ भी ना कुछ कहना, सुनना है।
उड़ा देंगे अब जो भी  आगे आया, पाक बचाव में
पत्थरबाजों के पत्थर का जवाब गोली से देना है।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


February 22, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

वादा

ओ सनम मैंने हमेशा शर्तें मनवाई है तुमसे
आज एक वादा भी करूँगा।
जिंदगी के हर मोड़ पर
तेरे संग खड़ा रहूँगा।
मैं जो तुझ से चाहता हूँ,
वो मैं स्वयं तेरे लिए भी करूँगा।
कभी अकेला ना छोडूंगा तुम्हें
जिंदगी की राहों में,
तुझे ता उम्र प्यार करता रहूँगा।
जहाँ तुझे मैं गलत लगूँ, बेशक चेता देना
चेताने का हक भी मैं तुझको दे दूँगा।
तुम हमेशा मेरा साथ दोगे, मेरे संग रहोगे
ये विश्वास में आंख बंद करके करूँगा।
जिंदगी के हर दुख सुख के मोड़ पर
मैं हमेशा संग तेरे रहूँगा।
हा मैं हमेशा तेरे संग हमेशा
तेरे साये की तरह रहूँगा।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


February 17, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

शहीद का बेटा

पापा आप तो जल्दी आने  वाले थे
मुझे नए खिलौने दिलवाने वाले थे।
मेरी बहना के लिए एक फ्लॉग सूट
मेरे लिए गम स्टेशन  लाने वाले थे।।

शाहिद
बेटा आ तो गया, मैं  काम  देश  के
शिकार हुए हम, राजनीति द्वेष के।
खिलौने तेरे राह में बिखर गए बेटा
ला रहा था मैं तो घोड़े लम्बी रेस के।।

शहीद का बेटा
पापा कौन दिलायेगा खिलौने, सूट
मुझे कौन मनाएगा, गर  गया  रूठ।
सत्य का मार्ग मुझे कौन  बताएगा
क्या वो जो बोल  रहे है आज झूठ*।।

(लोग दिलासा दे रहे थे कि कुछ नहीं हुआ तेरे पापा को बीमार है)

शहीद
मेरा बहादुर बेटा खुद काबिल बनेगा
पापा  की   बताई   राह  पर  चलेगा।
किसी  और  सहारे  की जरूरत नहीं
अब परिवार का सहारा तू ही बनेगा।

शहीद का बेटा
हा पापा मैं खुद एक  फौजी  बनूंगा
मैं भी  सरहद  पार  जा  कर लड़ूंगा।
माँ,  छोटी   का   रखूंगा   मैं  ख्याल
दुश्मन  की  छाती  पर  बार  करूंगा।।

शहीद
बेटा तू बहादुर है, दुश्मन से मत डरना
हमारे हिन्द देश  की  रक्षा  तुम करना।
अगर देखे कोई बुरी  नजर से  देश को
आंखों  को  निकाल  तुम  कंचे खेलना।।

शहीद का बेटा
दुश्मन हमारा पूरा बचपन निगल गया है
किताबो की जगह हथियार थमा गया है।
बेरियों की आंखों से कंचे तो  खेलेंगे ही
नही छोड़ेंगे,अपना दुश्मन से मिल गया है।।

शहीद
बेटा सच कहा अपने भी गद्दार बने हैं
अपने देश में  ही  कई  दुश्मन फले हैं।
दुश्मन की क्या मजाल, आंख उठाये
बेटा तू निभाना फर्ज, अदा कर चले हैं।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


February 10, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

मुझे अपना टेडी बना लो


फूल दिया, इजहार किया 

अब चॉकलेट खा के हूँ रेडी 

आज बना लो सनम 

मुझे अपना टेडी

जब चाहो प्यार करना

जब चाहो इजहार करना।

कभी दिल उदास हो जो तेरा

मुझ से बात करना।

अपने दिल की हर बात 

मुझ से कह देना।

कभी कभार याद जो मेरी आये

इस टेडी को चुंबनों की बरसात कर देना।

कभी मन दुखाऊँ जो तेरा

हल्के हल्के थप्पड़ों की बरसात कर देना

मतलब कुछ भी करना 

पर इस टेडी को अपने दिल से

दूर मत होने देना।

मैं टेडी बनकर 

तेरे पास रहना चाहता हूँ,

रोज रोज तेरे हाथों का

स्पर्श पाना चाहता हूँ।

कपड़े का नही मुझे

कागज का टेडी समझना

हल्की सी चोट से बिखर जाऊंगा।

मुझे नादां टेडी समझना

जरा सी तन्हाई नही सह पाऊंगा।

हग डे से पहले ही गले लगालो

मुझे अपना टेडी बना लो, टेडी बना लो


-:-तेरा टेडी-:-


स्वरचित

सुखचैन मेहरा

February 07, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

हैप्पी रोज-डे 2019(काल्पनिक)

आज रोज डे था। युवाओं में खासा उत्साह दिखाई दे रहा था। हमारे कॉलेज में भी इसका असर साफ दिखाई देखा जा सकता था। आधे से ज्यादा लड़के लड़कियों के हाथ मे गुलाब का फूल था। 

आज सब मौके की तलाश में थे अपने मन की बात कहने के लिए। कुछ लड़कियां तो आज कॉलेज ही नही आई कि कुछ गलत ना हो जाये, बदनामी न हो जाये। इस बजह से अपने अपने गुलाब तोड़ मरोड़ कर कचरे पात्र मे फेंक दिया। 

गुलाब लेने देने का सिलसिला शुरू हो गया। सब लड़के लड़कियां बहुत खुश थे। कुछ बेचारे बैठे थे अकेले एक साइड में। उनमें से एक राज भी था। 

थोड़ी देर बाद कुछ यूं हुआ कि पूरी क्लास एक दम शांत हो गयी राज गर्दन उठाकर देखा तो कॉलेज की सबसे हसींन लड़की राज सामने चार रंग के गुलाब लिये खड़ी थी। सब की नजर उन दोनों पर थी।

उसने इशारा किया कि 'कौनसा दूँ?"

उसके हाथ में लाल, पिला, गुलाबी, सफ़ेद रंग के चार गुलाब थे। 

राम अपना हाथ आगे बढ़ाया । पहले तो राम ने 'लाल गुलाब' की ओर हाथ बढ़ाया। सब हेईईईईईईई.... हेईईईईईईई........ हेईईईईईईई करके शोर करने करने लगे। राज ने अपना हाथ पीछे हटा लिया। सारे शांत हो गए। 

फिर राज ने  'पीले गुलाब' की ओर हाथ बढ़ाया। फिर क्लास रूम हेईईईईईईई... हेईईईईईईई...की आवाज से गूंज उठा। राज ने फिर अपना हाथ पीछे हटा लिया। फिर सब शान्त!।

ऐसे ही 'सफेद गुलाब' के लिए हुआ।

आखिर में राज ने 'गुलाबी गुलाब' धन्यवाद कहते हुए ले लिया। 

शोर सुन कर हमारे गुरुजन भी वहां आ गए थे। उन्होंने कहा 'राम' ने बिल्कुल सही गुलाब का चयन किया है। 

वो कैसे सर्? (सभी ने एक साथ पूछा)

देखो बच्चों 'लाल गुलाब' प्यार का प्रतीक होता है । प्यार माँ-बेटे, भाई-बहन का भी हो सकता है और लड़के-लड़की का भी।

'पिला गुलाब'  दोस्ती का....'सफेद गुलाब' शांति का प्रतीक है। और जो राम ने चुना है 'गुलाबी गुलाब' वो

है खुशियां बांटने का प्रतीक है, जो हम सब  किसी को भी दे सकते है और ले सकते है।

लेकिन रंजना रोने लगी ? और वह वहां से चली गई।

राज भागकर उसके पीछे गया और क्लास रूम को बाहर से बन्द कर दिया। निशा मैडम राम रोकने लगे लेकिन सभी ने कहा राज ऐसा कोई काम नहीं करेगा जो गलत हो। 

सभी उन दोनों को देख रहे थे पारदर्शी शीशे में से। राज ने छुपाया हुआ 'लाल-गुलाब' रंजना को दे दिया। और वो खुश हो गई।उसने भी मुझे वो लाल गुलाब दे दिया। तालियों की हल्की सी गड़गड़ाहट सुनाई देने लगी। वो दोनों खुश थे। 

राज ने क्लास रूम खोल दिया। तालियों की गड़गड़ाहट अभी भी शुरू थी।

('लाल-गुलाब' प्यार का प्रतीक है और प्यार किसी भी रिश्ते के बीच हो सकता है)


स्वरचित:

सुखचैन मेहरा

February 02, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

तेरा साथ

तुम से प्यार  करता हूँ, करता रहूंगा
तुम मेरे हो सनम, ये हक से कहूँगा।।

बस तुम मेरे  संग  रहना, मेरे हमदम।
वादा है, मैं भी संग तेरे हमेशा रहूँगा।।

जिंदगी में अड़चनें तो आएंगी सनम।
तेरा साथ रहा तो मैं पीछे नही हटूँगा।।

तेरे संग जिस्म का रिश्ता नही रखना
मैं तो दो जान  एक  जिंद का रखूँगा।

मेरे हमदम छोड़  मत  जाना  राह  में।
तेरे बिना तो मैं जिंदा ही मर जाऊँगा।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


January 31, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

।।मुक्तक 1।।
बताओ, हम  से  बढ़कर तुम्हे प्यार कौन करेगा
छोड़ जाने वाले, हर खुशी तेरे नाम कौन करेगा।
तेरी हर एक  नादानी, बेसमझी  को  समझकर
तेरी हर एक गलती को सोचो माफ कौन करेगा।।

।।मुक्तक 2।।
सफर  में   जरूरत  है  एक   प्यारे  हमसफर की
जिंदगी में  जरूरी  है  कभी  खुशी कभी गम भी।
अगर  जरूरत  पड़े तो   अपना   हल  स्वयं ढूंढो,
क्योकि जग में स्वयं के हमसफर है स्वयं हम ही।।

।।मुक्तक 3।।
एक माँ हमारी "सब" जरूरतों  का  ध्यान रखती है
पर माँ की जरूरतों को कोई विरला ही समझता है।
माँ - बाप जैसा निस्वार्थी  कोई  नही होगा जगत् में
डांट के पीछे छिपी फिक्र को कोई कोई समझता है।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


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