Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on September 04, 2019 with No comments
माँ मेरी जान की कीमत कितनी थी
हुई बेबसी की शिकार बस इतनी थी
एक पल दूर नही करती थी नजरों से
क्यों भनक नहीं रही तुझे इतनी सी।
कोई निकाल न पाया मुझे कुएं में से
भले मैं जोर से चिल्लाई जितनी थी।
आँखे खोलकर भी मैं देख नहीं पाई
रोशनी मिशाल से जलाई कितनी भी।
आखिरकार दम तोड़ ही गयी मैं माँ
थक हार कर मैंने आंखे बंद की थी।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा

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