July 31, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

जब याद तेरी आती है.....

दिल क्यूँ दुखाती है
तुं  दुर क्यूँ जाती है।(स्वप्न में)
पता है कितना रोता हूँ मैं...
जब याद तेरी आती है।।

तेरी शरारतें, नखरे मंजूर
फिर क्यूँ यूं खफ़ा होती है
पता है अंदर तक टूट जाता हूँ
मैं, जब याद तेरी आती है...।।

मन का कर ले कुछ भी
जो भी तुं करना चाहती है।
तन्हा सा महसूस करता हूँ मैं
जब याद तेरी आती है...।।

परेशान  नहीं  करूंगा  कभी
बस बता दे तुं क्या चाहती है।
किये कर्मों को अक़्सर याद करता
हूँ, जब याद तेरी आती है...।।

पता है स्वर्ग में भी तुम
पल पल आंसू बहाती है।
अब कभी मत रोना यारा
ये* ओर भी ज्यादा रुलाती है।।

*तेरे आंसूं की बूंद

ले ली एक तस्वीर यादों की
उसी के सहारे जी लूं गा मैं।
और किसी को तेरी जगह मैं
सारी उम्र तक नहीं दूंगा मैं।।

(आंसू बंद और मुस्कराहट चेहरे पर आ गयी उसके शायद मुझे रुलाना सच मैं पसंद नहीं करती आज भी वो)

बस यूं ही खुश रह अब तुं
दिल को तसल्ली मिल जाती है।
हां आंसू छुपा लेता हूँ अक्सर
जब याद तेरी आती है ।।

सुखचैन  मेहरा
# 9460914014

July 29, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

हार्ड डिस्क: भाग 2 (रहस्य)

'पता है अपने विवेक ने इस साल टॉप किया...'  ये बताते हुए मधु का उत्साह चरम पे था।

ये सरप्राइज पा कर मेरी खुशी का भी कोई ठिकाना नहीं रहा। खुशी खुशी में मैंने मधु को अपनी बाहों में भर लिया । और कुछ देर यूं ही खड़ा रहा। सोचने लग गया कि कितनी प्यारी पत्नी मिली है।

मधु की कोहनी ने मुझे उससे अलग किया। दोनों मुस्करा रहे थे। मां भी दोनों को यूं देख कर मुस्करा कर आगे चली गयी। हम दोनों कच्चे हो गए

अब मैंने उस हार्ड डिस्क को मधु से न चाहते हुए भी शेयर करने का मन बना लिया और उस हार्ड डिस्क को विवेक की हार्ड डिस्क के साथ रख दिया।

और रविवार को सभी के साथ देखने का निर्णय लिया उससे पहले उसे छूने से भी मना कर दिया । मैंने दोनों हार्ड डिस्क पर  निशान लगा (एक पर ।।। तीन लाइनें था दूसरी (रहस्य वाली) पर ।। दो लाइनें लगा दी।" दिए ताकि दोनों की पहचान हो सके।


(रविवार वाले दिन)


हम सब (मां, पापा, दादा, दादी व हम दोनों) इक्कठे हो गए और मैंने मधु को वो हार्ड डिस्क लाने को कहा वो ले आयी।

मां ने मुझे धीरे से बुलाया और कहा, 'तुं तो कह रहा था किसी को बताना मत लेकिन तू खुद ही  सब दिखा रहा है। मैंने मधु से वो हार्ड डिस्क चेक की तो वही दो लाइनों वाली डिस्क मेरे सामने थी। (आज भी मां की तरफ हैरानी से देखा कि मां आज बचा दिया..)

मैं अंदर भागा भागा गया और उस हार्ड डिस्क को देख तो उस पर भी दो निशान थे एक पता नहीं किधर गया लेकिन लगाया भी हल्का सा था मेरे ही हाथ से मिट गया हो । क्योंकि उसे में रोज चेक करता था कि वो अपनी जगह पर है या नहीं।

सब बाहर इंतजार कर रहे थे मना भी नहीं कर सकते थे क्योंकि सब बहुत उत्साहित थे। मैं हार्ड डिस्क ले ही गया ये सोचकर कि, ' जो होगा देखा जायेगा।

हार्ड डिस्क जोड़ते समय मेरा दिल धकधक कर रहा था। मेरी मां को मेरे चेहरे के झूठे उत्साह  के पीछे सब कुछ दिख रहा  था। वो कहने लगी कल देखनी है तो कल देख लेंगे। मैंने बाकी सब की ओर देखा तो मेरी मनाही पर सब (मां को छोड़कर) का उत्साह भारी पड़ा। मैंने हार्ड डिस्क लगा कर शुरू कर दी ।

मेरा दिल अभी भी धकधक- धकधक कर रहा था।

सांस तो तब आया जब मैंने दिल्ली के महाविद्यालय का नाम स्क्रीन पर देखा। मैंने राहत की सांस  ली। तब मुझे खुश देखकर मां भी खुशी खुशी देखने लगी। विवेक की एक्टिविटीज देख कर सब गदगद हो गए सब ने खूब इंजॉय किया। मैंने ये हार्ड डिस्क (विवेक वाली) दूसरी हार्ड डिस्क से ।

(रविवार शाम मेरा बेडरूम )

मधु मैं तुम्हारे साथ एक राज शेयर करना चाहता हूं जो अभी तक मुझे भी नहीं पता है वो राज इस हार्ड डिस्क में छुपा है। किसी ने मुझे ये दी है नाम नहीं बताऊंगा।

'हां',  कोई बात नहीं नाम मत बताओ । मधु ने कहा

मैंने हार्ड डिस्क कंप्यूटर से जोड़ी ।

पहले ही सीन में मैं हक्का बक्का रह गया उसमें मेरी क्लासमेट *दिशा* का खून होते हुए बताया जा रहा था। हत्यारी के मुंह पर नकाब पहना हुआ था।

मैं आगे कुछ देखता इससे पहले मधु ने कंप्यूटर को सीधे स्विच से ही बंद कर दिया और रो कर बताने लगी उसकी कातिल मैं ही हूँ।

तुम...????

हां.... मैं ... मधु के चेहरे पर अलग सा रोष था।

पर क्यूँ..? मैंने भी रोष जताते हुए पूछा।

बताती हूँ.. उस रात... जब हम दोनों मिलने आये थे(शादी से पहले) तो आप तो वहां से घर आ गए लेकिन मुझे बाजार में कुछ काम था तो मैं एक शॉप पर रुक गयी। वहां मुझे आपकी क्लासमेट दिशा मिली। वो कहने लगी जिगर सिर्फ मेरा है उसके आस पास खटकी ना तो तेरी खैर नहीं... मैंने(मधु) भी कह दिया क्या कर लेगी तुं?? वो कहने लगी पुरानी हवेली के पीछे आ जाना कभी बता दूंगी....

मैं उसे कहे अनुसार वहां आने का चैलेंज स्वीकार कर लिया ।

मैं वहां चली आयी और उसने अपने हाथ में एक गन ले रखी थी...मुझे यहां से जाने से का कह रही थी.... मैं भी सेल्फ डिफेंस ट्रैनर थी कहाँ डरने वाली थी मैं उनके पास  गई और उसको चकमा देकर गन अपने हवाले कर ली... वो काफी घबरा गई थी..
मैंने उस पर गन चला दी(गोलियां निकाल दी थी मैंने उसे मारना मेरा उद्देश्य नहीं था)
एक समय तो ऐसा लगा कि वी मर चुकी है क्योंकि वो एक दम स्तब्ध हो गयी थी.....।
मैं उसे छोड़कर कर जाने लगी तो उसने मेरे पर किसी चीज से वार कर दिया । मुझे भी उस पर गुस्सा आ गया और मैंने उसकी गले में डाली चुन्नी से ही गला रेंत दिया.. किसी के आने की आहट सुनकर मैं वहां से भाग निकली।
अब मेरे समझ में नहीं आ रहा कि उसने ये हार्ड डिस्क कैसे बना ली..?
मुझे तो किसी ओर ने दी थी ये हार्ड डिस्क...आज देख पाया हूँ।
गलती तेरी भी नहीं है ना ही उसकी....

ये बात हम दोनों ने दुनियां में आज भी राज ही रखी ।

अगला पार्ट मैं हार्ड डिस्क : भाग 3 नही रख कर "दिशा का भूत" रखने जा रहा हूँ क्योंकि ये एक हॉरर कहानी होगी... जो कि एक ही भाग में पूरा कर दूंगा..


सुखचैन मेहरा # 9460914014


July 29, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

आक्रन्ति ???

*अजन्मी बेटी*
मैं कोई अपराधी हूँ क्या माँ
ज़रा मुझे एक बात समझा।
सज़ा-ए-मौत  की हकदार..
मैं हुई कैसे ? ज़रा ये तो बता.

*मां*
ना बेटी, ना ही अपराधी है तु
और ना ही सजा की हकदार
तेरे दादा जी ही का हुक्म है..
बेटी नहीं बेटा हो अबकी बार।।

*अजन्मी बेटी*
गलती क्या है..?फिर मेरी
क्यूँ कोख में रही है मार..?
क्यों तेरे लिए हुक्मदार बना
ये नीच  सोच  का  सरदार*
*=दादा जी

*मां*
चुप रह कैसे जुबान चलाती है
ये नीच सोच के नहीं ये बड़े है।
जो बड़े कहेंगे वो ही हम  करेंगे
खानदान के कायदे थोड़े कड़े है।।

*अजन्मी बेटी*
कायदे के पीछे क़ातिल बनेगी?
क्यों तुम पे नीच सोच भारी है..
किस काम के वो तुगलकी कायदे
जिनसे पैदा हुई **ये बीमारी है ।।
** भ्रूण हत्या।

*मां*
बस कर बेटी अब मत रूला
मैं जीवनदाती, नहीं जीवनन्ति
मैं भूल गयी थी कर्तव्य मेरा..
रखूंगी मैं तेरा नाम आक्रन्ति

*अजन्मी बेटी*
मां समझ गयी तु मेरी बात
शुक्र गुजार  तेरी रहूंगी...।
दुनियां देखती रह जायेगी
इक ऐसी उड़ान भरूंगी।।

*मां*
बेटा सोच बदल दी तूने मेरी..
मैं जन-जन को जा बताउंगी
मां जीवनदाती है जीवनन्ति नहीं
मैं सब जन को  समझाऊंगी।

लेखक : सुखचैन मेहरा # 9460914014


July 29, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

हार्ड डिस्क : भाग 1 (रहस्यमयी कहानी)
बेटा! ये तेरे काम की है या इसे भी बेच दूँ कबाड़ी वाले को... मेरी (असाक्षर लेकिन समझदार) मां ने एक हार्ड डिस्क दिखाते हुए पूछा। मैंने बिना ध्यान दिए मां को बोल दिया, 'हां मां बेच दो'।
मां मुझे कहने लगी, 'छोटी सी है लेकिन कितनी भारी है...।
मैंने सोचा ऐसी कौनसी चीज है जो छोटी है और भारी है मैंने जब ध्यान से देखा तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई । क्योंकि ये  वही हार्ड डिस्क थी जो मैंने कुछ रहस्यों को दफ़नाने के लिये कहीं छुपा दी थी और उसके बाद आज दीपावली की सफाई के दौरान मिल गयी। मैंने मां से झट वह हार्ड डिस्क ले ली।
और कहा, ' मां, आप इसके बारे में किसी को मत बताना..ठीक है।
मैं ये कह ही रहा था कि मधु(पत्नी) (काल्पनिक नाम, काल्पनिक रिश्ता) ने पुछा किसके बारे में ना बताए।
बहु ये....(हार्ड डिस्क की ओर हाथ करते हुए) मैंने बड़ी मुश्किल से हार्ड डिस्क साइड में रखी और साथ ही पड़े टूटे हुये गुलदस्ते को उठा कर कहा ये मेरे से टूट गया है इसके बारे में बाबू जी को न बताए, आप भी थोड़ा ध्यान रखना। मैंने मधु से कहा।
ओह! मैंने सोचा हम से कुछ छुपाया जा रहा है। मधु चली गयी।

मैंने वापिस हार्ड डिस्क उठाई और  किसी महफूज जगह रख दी जहां कोई उस तक ना पहुंच पाए..। मैंने मां की ओर देखते हुए मन में फुसफुसाया ' आज तो मरा दिया था मां ने'।
अगले ही दिन मैंने वो हार्ड डिस्क अपने ऑफिस की मेरी पर्सनल अलमारी में रख दी। और निश्चिंत हो गया।
एक रोज मधु मेरे ऑफिस आई और कहने लगी आप मुझे एक गिफ्ट खरीद कर दो...मैं समझ गया वो रमन(पड़ोसियों का लड़का) का बर्थडे था और गिफ्ट लेने के लिए चला गया।
दोबारा आया तो देखा कि मेरी पर्सनल अलमारी खुली पड़ी थी और मधु उसके पास खड़ी थी।
मैंने उनसे कहा आप यहां क्या कर रहे हो ...?? (मैंने कुछ गर्माते हुए कहा)
क्या हुआ....? मैं तो अलमारी बन्द कर रही थी खुली छोड़ गए थे आप.।(मधु ने सहज सा जबाव दिया)
शायद मेरे से ही खुली रह गयी हो मैंने मन मे सोचा।
कुछ दिनों बाद मधु ने मुझे ऑफिस में कॉल की कि, 'आज आप जल्दी घर आना आपके लिए एक सरप्राइज है' .
मैंने 'ठीक है', कहकर फ़ोन काट दिया।
मैं जल्दी काम निपटाकर, घर जल्दी आ गया.। पानी पिया।
अपने बेडरूम में चला गया।
जब मधु रूम में आई तो उसके हाथ में हार्ड डिस्क देखकर में हड़बड़ा गया और गुस्से में न जाने मधु को क्या-क्या कह दिया।
उसने मेरी बात का बिल्कुल भी बुरा नहीं  माना लेक़िन हैरान जरूर थी।
अरे! बाबा क्या हुआ मैं तो ये हार्ड डिस्क आपको देने आयी थी। इसमें अपने विवेक(मेरा भाई, जो दिल्ली पढ़ने गया हुआ था) की सारी एक्टिविटीज है। जिसमें विवेक ने भाग लिया था।
अब जाकर मेरा गुस्सा कुछ ठंडा हुया और अपनी प्यारी मधु से 'sorry' मांगी।
कोई बात नहीं...मधु ने माफी से भरी मुस्कराहट से जवाब दिया।
क्यों  इतना हड़बड़ा गए थे...उस दिन भी आप ऑफिस में थोड़े गर्म हो गए थे..। क्या बात है कोई परेशानी है क्या..? मधु ने अपनापन दिखाते हुए कहा।
'कुछ नहीं बस यूं ही..' मैंने झूठी मुस्कान के साथ जवाब दिया।
(हां, उस हार्ड डिस्क में क्या था अभी तक मेरे लिए भी रहस्य ही था अब तक )
सरप्राइज व उस हार्ड डिस्क का रहस्य  जानने के लिए 'हार्ड डिस्क: भाग 2' पढें जो मैं जल्द ही प्रतिलिपी(प्लेेेस्टोर से ले)  में पब्लिश करूंगा..

सुखचैन मेहरा # 9460914014


July 22, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

                      रिश्तों की गली

'रिश्तों की गली' जितना सुन्दर उस सुनसान रास्ते(गली) का नाम था, उतना ही डरावना व भयंकर उसके बारे में सुना था मैंने । लेकिन मुझे विश्वास नहीं है कुछ इस तरह की बातों पर।
एक अमावस्या की शाम मैंने अपने दोस्त को कहा कि, चल चलते है 'रिश्तों की गली'।
(वो भयंकर तरीके से डर गया था ये सुनते ही। जैसे कि पहले ही जा आया हो वहां, भुगत भोगी हो) ना... भाई मैं नहीं जाऊंगा वहां तेरे साथ वो तुझे भी मार डालेगी ।( उसका गोल-गौरा चेहरा डर के मारे पसीने से लथपथ हो गया था।) उसकी ये हालत देख कर तो ऐसा लगा कि मुझे भी नहीं जाना चाहिए वहां। पर मुझ पर तो निडरता का भूत सवार था। मुझे तो देखना था कि कोई डरावनी काया होती कैसी क है....
मैं घर पर कोई बहाना लगाकर चला गया, वहां।

'रिश्तों की गली' में प्रवेश करते ही मेरे नकारात्मक मस्तिष्क ने सोचना शुरू कर दिया, जहन में अलग अलग आकृतियां बनने लगी। थोड़ा सा पत्ता भी हिलता तो किसी के आने का अंदेशा लगता ।सामने कोई नहीं था फ़िर भी किसी इंसान की उपस्थिति महसूस हो रही थी। पहले तो वापिस घर जाने के लिए तैयार हो गया । लेकिन बाद में मैंने सोचा चलो आगे जा कर देखूं  तो सही..।
मैं काफी आगे निकल गया। सुनसान रास्ते में रोशनी का तो नामोनिशान नहीं था चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा था ।
थोड़ा ओर आगे गया तो  किसी ने पीछे से आकर  मेरे कंधों पर हाथ रख दिया(मेरी चीख़ निकलते निकलते बची) डर तो मैं गया ही था, धड़कनें भी  तेज हो गयी थी मेरी..लेकिन वो कोई साया नहीं, आदमीं(हुलिया बताऊं तो, एक दम पागलों जैसा)था। मेरी सांसे अभी भी नॉर्मल नही हो पा रही थी।
वो आदमीं कहने लगा, चला जा यहाँ से... चला जा...बेमौत मारा जाएगा....हां... बेमौत मारा जाएगा। लेकिन पलक झपकते ही वो आंखों से औझल हो गया । अंधेरा बहुत गहरा रहा था। मैंने सोचा अब इतना अंधेरा हो गया है ओर थोड़ी देर यहां रुकना मूर्खता ही होगी। दो तीन बार किसी चीज से अटक कर गिरते-गिरते बचा। पता नई क्या था वो। कमबख्त मोबाइल ने भी साथ छोड़ दिया।  मैंने भी आगे जाना उचित नहीं समझा। जब वापिस आने के लिए पलटा तो पता चला कि मैं 'रिश्तों की गली' के अंतिम छोर पर खड़ा हूँ, क्योकि आगे रास्ता बंद था और वाहनों की आवा- जावी साफ दिखाई दे रही थी। इस गली में आगे (वापिस जाने के रास्ते में) जाकर रोशनी नामोनिशान  नही था। कानों को तरह तरह की आवाजें व चीखें सुनाई देने लगी।
"हे रुको..." की आवाज मेरे कानों में पड़ी लेकिन मैंने अनसुना कर दिया। मैं वहां से दौड़ पड़ा... मैं वास्तव में डर गया था। ऐसा लग रहा था कि कोई मेरा पीछा कर रहा है। पलट कर देखा तो कोई नहीं । मैं किसी ना किसी तरह घर पहुंचा। रात को बस वो चीखें, आवाजे ही सुनाई दे रही थी। मुझे पूरी रात नींद नही आयी। सुबह 4 बजे नींद ने ही मुझे अपने आगोश में ले लिया।
सुबह जब में लेट उठा तो माँ ने कारण पूछा तो बता दिया कि 'माँ रविवार है इसलिए।'
मेरे जहन में अभी उस राज को जानने की कश्मकश चल रही थी और डर भी लग रहा था। आख़िरकार मैंने 'रिश्तों की गली'  की ओर रुख कर लिया। मैं रिश्तों की गली के भीतर तक चला गया । वही आवाजों व चीख़ों ने मेरे कान पर डेरा डाल लिया।
"मेरी बात सुन ध्यान से... "की आवाज मेरे बिल्कुल नजदीक से सुनाई दी और मैं पलटा तो सामने एक बदशक्ल  औरत मेरे सामने थी, मैं एकदम से घबरा गया और डरकर  वहां से भागने लगा,  (क्योंकि वो बहुत ही डरावनी लग रही थी) मैं किसी  से अटक कर गिर गया। वो किसी आदमी की डेड बॉडी ही थी। इसे देखकर मैं ओर डर गया था।
फिर उसने मुझे कहा डरो मत मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाऊंगी । मैं नहीं रुका। उसने मेरे सामने से आकर मेरा गला पकड़ लिया। मैंने समझा आज तो मेरी खेर नही । वो मेरा डरा हुआ चेहरा देखकर अजीब तरीके से हँसने लगी (ही.. ही.. ही.. हा.. हा) मुँह से बहुत गंदी बदबू आ रही थी उसके । मेरे गिड़गड़ाने से उसने मेरा गला छोड़ दिया। कहने लगी, ' मेरी बात ध्यान से सुन तुम ही हो जो मुझे इंसाफ़ दिला सकते हो ...

कौनसा इंसाफ़...??कैसा  इंसाफ..???मैंने दबी हुई आवाज में पुछा।
बताती हूँ...' आज से पांच साल पहले मेरा पति मुझे व्याह कर इस रास्ते से लेकर जा रहा था। लेक़िन कुछ दरिंदो ने पूरी बारात पर गोलियां बरसा दी ... सब लोग मारे गये, सिवाए मेरे । वो मुझे भी मरना चाहते थे लेकिन मैं यहां से भाग निकलने में कामयाब हो गयी पुलिस के आ जाने से वो दरिंदे भाग गए ..पुलिस ने सारी डेड बॉडीज को एम्बुलेंस में डाल कर ले गयी लेकिन में उनसे बदला लेने के लिए आज भी यहीं गली में घूम रहीं हूं और जो मेरी सहायता करने से मना कर देता है तो मैं उसे यहीं मार डालती हूँ। (उसने हथियार दिखाते हुए कहा)
ये हथियार कहाँ से आये... मैंने पूछा।
उन दरिंदो ने छुपाके रखे थे यहाँ...
वो बात समझाए जा रही थी लेकिन मेरे डर के मारे सांस सूखे जा रहे थे। क्योंकि वास्तव में बहुत डरावनी लग रही थी।

मैं डरा हुआ तो था ही लेकिन उसकी दर्द भरी कहानी सुनकर मैं उनकी सहायता करने के लिये हां कह दी।
वास्तव में उस दिन उसके कई रिश्तों का कत्लयाम हो गया था..

क्या करना होगा मुझे..? मैंने उससे पूछा।
आज से महीने बाद वो जैल से रिहा होने वालें है ।(पहुँच वाले होने के कारण जल्दी रिहा होने वाले थे)। वो यहां अपने हथियार लेने जरूर आएंगे।
'बस तुम मेरा साथ देना'...उसने कहा।
'ठीक है...' मैंने जवाब दिया।

          (एक महीने बाद)

उनके कहे मुताबिक वो हथियार लेने आये तो हमने उन पर गोलियों की बरसात कर दी और एक इंतक़ाम को अंजाम दे दिया।
इसके बाद उसने अपना मुखोटा(डरावना) उतारा। तो दंग रह गया उसके गोर चिट्टे रंग को देख कर। लेकिन वो सांसो की दुर्गंध तो अभी भी आ रही थी.।।

तो दोस्तों इस तरह से वापिस 'रिश्तों की गली' में रौनक़ आ गयी थी लोगों का आने-जाने से....
उसकी मुखोटा पहने सुरत आज भी डरा कर हँसा देती है।

लेखक : *सुखचैन मेहरा* # *9460914014*


July 20, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

*शायरी व कुछ लाइनें*

समां है, ऐ महबूब खुदा ने तुझे बनाया होगा न जाने किस प्रकार की फुर्सत में,
तभी ताज्जुब है, हसीं तो बहुत देखे है इस दुनियां में लेकिन तुमसा मिलना भी मुश्किल है।।

लोग कहते सुखचैन तुं बहुत बदल गया है,
मैंने कहा, जरूरी था ज़नाब, नहीं बदलता तो लोग अपने ढंग से बदलना शुरू कर देते..।।

बड़ी मुश्किल से लिखता हूँ दो शब्द उनके लिए..2
लेकिन वो हैं ही इतने मशहूर कि दब जाते है नोटिफिकेशन बनकर सरकारी फाइलों की तरह।

बड़ी तम्मना थी कि लिखूं  उनकी तारीफ़ में कुछ।
लेकिन शब्दों अभाव रहा और इक बार फिर चंद लाइनें लिख कर मिटा दी।

अपनी दुनियां में मस्त रह ग़ालिब -2
क्योंकि कुछ नहीं मिला आज तक किसी को किसी की परवाह करके।।

यदि आप लिखनें से पहले किसी से पूछते हो (कैसे लिखूं)
तो ये समझ लीजिए ज़नाब, लिखना आपके वश की बात नहीं।।

*सुखचैन मेहरा*  # *9460914014*

July 19, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

*बना इक आईना ऐसा*

हे कारीगर, बना इक आईना ऐसा
जो दिखलाए असलियत बेईमानों की,
राक्षसप्रवर्ति के इंसानों की।।

हे कारीगर, बना एक आईना ऐसा
जो जमीर जगादे रिश्वतखोरों का,
भ्रस्टाचारियों का, चोरों का।।

हे कारीगर, बना इक आईना ऐसा
जो चरित्र दिखलाए लोगों का,
कुछ पाखडींयो का, दारोगों का।।

हे कारीगर, बना एक आईना ऐसा
जो राह दिखलाए  यवनों को,
कुछ भटकों को, *रमनों को।।

*खेलने वाले खिलाडियों को

सुखचैन मेहरा #9460914014

July 19, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

तेरा यूं रूठ जाना

खोजता हूं रोज तरीके मनाने के तुम्हें
ना मना पाऊं तो खुद ही मान जाना।
मनाना नहीं आता मुझे, मेरे हमदम
पर रुलाता है..तेरा यूं रूठ जाना।।

किसी से पूछुं कि कैसे मनाऊं तुझे?
पर सब जानते है बात को ठठ्ठों में उड़ाना।
मनाना नहीं आता मुझे, मेरे हमदम
पर रुलाता है..तेरा यूं रूठ जाना।।

चलो खुद ही कौशिश करूँगा आगे
तुम भी मेरे कंधे से कन्धा मिलाना।
मनाना नहीं आता मुझे, मेरे हमदम
पर रुलाता है..तेरा यूं रूठ जाना।।

जरा ये फूल  💐 पकड़ो मेरे हाथ से
अब मुझे वापिस देदो मेरी जाने जाना।।
मनाना नहीं आता मुझे, मेरे हमदम
पर रुलाता है..तेरा यूं रूठ जाना।।

ये हुई ना बात, आई तेरे होठों पे मुस्कान
सिख गया हूँ तुम्हें मनाना ? जरा बताना।।
( *उनका जवाब* )
हां.. हां.. पगलेट, आ गया है मनाना तुझे
आगे से नहीं रूठूँगी मेरे जाने जाना।।

सुखचैन मेहरा # 9460914014

July 18, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

आखिरी सलाम

'Sorry! रंजन आज के बाद मैं नहीं मिल पाऊंगी तुम्हें ' ये बोल थे अनुप्रिया के जो रंजन को जी जान से मुहब्बत करती थी। पर पता नहीं क्या मजबूरी थी? रंजन अनुप्रिया के द्वारा कही इस बात को दिल पे लगा बैठा।सोचने लगा मेरा शक सही था, इसकी जिंदगी में कोई ओर आ गया है। (दरअसल बात ये हुई थी कि रंजन ने अनुप्रिया को किसी दूसरे लड़के के साथ हँसते-घूमते हुए देख लिया था)। रंजन तो अनुप्रिया पर पहले ही शक कर रहा था लेकिन अनुप्रिया की sorry! वाली बात ने आग में घी डालने का काम कर दिया। रंजन काफी उदास व गुमसुम सा रहने लग गया था। उसने एक बार भी अनुप्रिया से ये पूछना मुनासिब नहीं समझा कि, ' क्या बात हुई है...? क्या कारण है..? बस पूर्वानुमान से ग्रसित सोच को लेकर बैठा रहा। यथा- ये तो बेवफ़ा निकली, उससे ये उम्मीद नहीं थी, अगैरा-बगैरा...। fb, व्हाट्सएप पर, इंस्टाग्राम इत्यादि पर सैड स्टेटस डालने लगा।
अनुप्रिया ने उसके बाद बात भी करना चाही लेकिन उसने उसका फ़ोन ही अटेंड नहीं किया। जिससे वो खुद मिलने आ गयी ।
आकर क्या देखती है कि वो कागज पर कुछ लिख रहा होता है(वो पत्र लिखने में इतना लीन था कि उसको अनुप्रिया के आने की भनक तक नहीं लगी... दोनों अक्सर इस जगह पर ही आकर  ज्यादा मिलते थे।) तो अनुप्रिया उस पत्र को उसके हाथ से खींच लिया और पत्र जल्दी से पत्र पढ़ने लगी.......
" प्रिया, मुझे तुमसे ये उम्मीद नहीं थी कि तुम मेरे साथ ऐसा करोगी, कोई ओर पसन्द था तो पहले ही बता देती.... बस इतना ही पढ़ पायी। रंजन ने उसके हाथ से पत्र वापिस छीन लिया। और बिना बात किये वहां से चला गया । अनुप्रिया उसको समझाने के लिए उसके पीछे गयी लेकिन रंजन ने इसकी एक ना सुनी ।
फिर अनुप्रिया ने अपना फ़ोन निकाला और आंसू बहाते हुए एक msg टाइप करने लगी " रंजन देख, तुझे गलतफहमी हुई है। ऐसी कोई बात नही है
(आंसूओं की बूंदे मोबाइल की स्क्रीन को नहला रही थी) मेरे पैरेंट्स मेरी शादी अपने पसंद के लड़के के साथ करना चाहते है और मैं अपने माँ बाप के ख़िलाफ़ नहीं जा सकती। बस यही बात है। सारी बात बता साफ-साफ बता दी है । अगर फिर भी तेरा रिप्लाई नहीं आया तो मेरा ये आखरी मैसेज होगा, ये मेरा तुझे आखरी सलाम होगा ।(मैसेज सेंड हो गया...) इतने में एक तेज रफ़्तार गाड़ी ने अनुप्रिया को अपनी चपेट में ले लिया। मोबाइल हाथ से फिसल गया और गाड़ी के पहिये अनुप्रिया के ऊपर......। वो बहुत भयंकर तरीके से घायल हो चुकी थी बचने की कोई आस न थी। आँखे धुन्दला गयी। रिप्लाई में आया हुआ मैसेज उसकी हमेशा के लिए बंद होने वाली आंखे नहीं पढ़  पायी लेकिन आया हुआ मैसेज देखकर खुशिया जरूर गयीं थी। रंजन आया और अब उसके पास रोने के अलावा कोई औऱ चारा नहीं था।
वास्तव में जिंदा रहकर कभी ना मिलने वाले अंदेशे (आखरी सलाम) का अर्थ इक दूसरे अर्थ में बदल जाएगा ये दोनों में से किसी ने नहीं सोचा था।

लेखक: सुखचैन मेहरा # 9460914014

July 18, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

वो कहाँ हैं..? वो कहाँ गए..?(एक गुज़रे पल की याद)

आज जब सालों बाद उनकी याद
में इन आंखों में आंसू समा गए..।
तो दिल खुदबखुद पूछ बैठा कि
वो कहाँ गए ... वो कहाँ गए....।।

जानता है और था, ये बेवस दिल
कि वो कहाँ है... और कहाँ गए..।
फिर क्यूँ पुछ बैठा नादाने दिल कि
वो कहाँ है... वो कहाँ गए.....।।

शायद पर्स में छुपाये खत उनके
उनकी याद अचानक दिला गए।
तभी तो मन बावरा विकला उठा
कि वो कहाँ है... वो कहाँ गए...।।

ये समां नहीं उनकी रग दुखाने का
तभी नम नैना वक़्त विचार गए..।
सम्भलता  है  मन  कुछ इस तरह
कि न  नैं  मेरे वहें न उसके वहें।।

*नयन

लेखक: *सुखचैन मेहरा* # *9460914014*

July 17, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

*एक जून दो वलायें (हिंदी संस्करण)*

राज गार्डन में ठंडी ठंडी हवा का लुप्त उठा रहा था, अचानक किसी ने अपने मुलायम हाथों से उस की आंखे बंद दी और कहने लगी कि, स्पोज करो कौन हूँ मैं ??? राज अभी कुछ बोलता उस से पहले कुलदीप(दूसरी लड़की) ने आकर इस लड़की के बाल पकड़ लिए और कहने लगी कि तूने मेरे राज को हाथ कैसे लगाया. वो लड़की  जिसका नाम रजनी था कहने लगी मैं राज को फर्स्ट ईयर से जानती हूँ (अभी भी एक दूसरे के बाल एक दूसरे के हाथों में ही थे। राज धीरे से यहां से निकल गया) (रजनी की टाइट जीन्स से कहीं ज्यादा अच्छा कुलदीप का सलवार सूट लग रहा था बिल्कुल पंजाबी जट्टी और वो विदेशी मेम)
कुलदीप: ऐ, पागल में राज को बचपन से जानती हूँ... एक बात बता तुझे कभी राज ने परपोज़ किया ?
रजनी : नहीं, कभी नहीं.... और तुझे....?
कुलदीप: मुझे भी नहीं किया उस जुर्लु से ने...
(दोनों के हाथ ढीले पड़ गए)
रजनी: देखते है राज किसके हाथ में आता है...
कुलदीप: देख लेंगे फिर...
(इतना कह दोनों अपने-अपने घर चलीं गयीं।)
एक दिन फिर रजनी राज को उसी गार्डन में मिल गयी। राज उठ कर जाने लगा इतने में रजनी ने उसका हाथ पकड़ कहने लगी, 'चल कहीं घूमने चलते है' राज ने एक बार तो मना कर दिया लेकिन  जब रजनी ने अपने बर्थडे होने का हवाला दिया तो राज मान गया । इधर कुलदीप भी राज के पीछे साय की तरह पड़ी हुई थी। वो भी उन दोनों के पीछे चली आयी। जहां वो बैठे थे उसके आस पास कोई नहीं था अगर कोई था भी तो वो काफी दूर था। जब राज और रजनी आपस में बैठे बात कर रहे थे तो रजनी अचानक राज से लिपट गयी राज चाहते हुए भी कुछ ना बोल सका.. और कुलदीप भी अपनी शर्मिंदा नजऱ से उन्हें सामने हो कर भी नहीं देख पायी।(एक कुँवारी लड़की की जवानी की इस बेवसी को देख भगवान भी हड़बड़ा गया होगा। मेरे बनाये हुए लोग प्यार में होश गवा रहे है) राज जैसे ही वहाँ से जाने लगा तो उसकी नजऱ कुलदीप के हाथ में पकड़े गिफ्ट पर पड़ी पूछने लगा..क्या है ये..? कुलदीप ने उस गिफ्ट को अपने पीछे छुपा लिया। राज ने सोचा रजनी के लिए होगा और अपनी कार की ओर बढ़ गया। जब राज जा रहा था तब कुलदीप की नजरों ने राज की शर्ट पर लिप के निशान देखे । वह तुरंत उसके पीछे दौड़ पड़ी लेकिन राज नहीं रुका। फिर कुलदीप ने राज को एक जोर दार आवाज लगाई दी...."हैप्पी बर्थडे राज..."( आवाज पूरे समुंदर व पहाड़ों में गूंज पड़ी । रजनी भी हैरान थी कि आज राज का बर्थडे है और उसे पता तक नहीं) राज रुक गया और कुलदीप ने वो गिफ्ट दे दिया ते अभी खोलने के लिये कहा। राज ने गिफ्ट खोलेकर देखा पेंट-शर्ट थी उसमें। कुलदीप ने शर्ट को हाथों हाथ बदलवा दिया। इस दौरान रजनी की नजरें राज के गठीले बदन को निहार रही थी और कुलदीप की लज्जायी नजरें दूसरी तरफ पलट कर देखने लगी।
राज: Thanks.. कह चला गया।
कुलदीप रजनी को कहने लगी कि, ' शायद तुम राज को ज्यादा प्यार करती हो तभी तो अपना सब कुछ दे दिया तूने उसे एक इज्जत ही तो होती है एक कुँवारी बेटी के पास वो तूने उस पर वार दी। रजनी ये सब सुनकर कुछ नहीं बोली और यहां से से चली गयी।
इधर राज ने अपने माँ-बाप को सब कुछ बता दिया और कुलदीप से शादी करने की इच्छा व्यक्त की । माँ-बाप राजी हो गए लेकिन कुलदीप ने राज का फ़ोन अटेंड करना बंद कर दिया। जिसके चलते राज ने भी कुलदीप को मिस करना बंद कर दिया। फिर एक दिन कुलदीप राज को बाजार में मिल गई वह यहां से जाने लगी लेकिन राज ने एक बात सुनकर जाने को कहा। राज ने उसे एक फिल्मी अंदाज में परपोज़ मार दिया और कुलदीप भी अपने पहले प्यार को मना नहीं कर सकी। कुलदीप ने हां कर दी। पूरे एक साल बाद राज और रजनी के बर्थडे वाले दिन ही शादी थी। रजनी भी आई हुई थी शादी में। राज ने अपनी उस शर्ट (लिप वाली) गिफ्ट कर दी जिसे देख रजनी के गुजरे हुए पल फिर जिंदा हो गए और उसी वक्त कुलदीप के गले में मंगलसूत्र डल जाने के बाद फिर आँखो के आंसुओं में धुल गए।

लेखक *सुखचैन मेहरा* # *9460914014*

July 15, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

*वाह! रे चोर तूने जन्म ही क्यूँ लिया।*

*गीत चोर*
मेरा लिखा गीत तूने अपना बना लिया
वाह! रे चोर तूने जन्म ही क्यूँ लिया

*दिल चोर*
कुछ नहीं छोड़ा सिवाए शरीर के
तूने हमारा दिल भी चुरा लिया
वाह! रे चोर तूने जन्म ही क्यूँ लिया।

*घरेलू चोर*
तूने चंद पैसों के लिए जमीर बेचा
घर मैं ही डाका डाल लिया।
वाह! रे चोर तूने जन्म ही क्यूँ लिया।

*लेखन चोर*
मुश्किल से चली थी कलम मेरी
तूने मेरी कलम को ही चुरा लिया।
वाह! रे चोर तूने जन्म ही क्यूँ लिया।

लेखक: सुखचैन मेहरा # 9460914014

July 10, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

*एक जून दो वलावां (पंजाबी लव स्टोरी)*

राज गार्डन च बैठा ठंडी ठंडी हवा दा लुप्त मान रहा सी, इकेदम किसे ने अपने कुल्या हथां  नाल उस दियाँ अखियां बन्द कर दितयां ते कहन लगी कि स्पोज करो कोन हां मैं??? राज हजे कुज बोल्दा उस तो पेला कुलदीप(दूजी कुड़ी) ने आके उस कुड़ी दे जुण्डे फड़ ले कहन लगी तुं मेरे राज नूं हाथ किवें लाया,
ओह कुड़ी जिस दा नाम रजनी सी कहन लगी मैं राज नूं फर्स्ट ईयर तो जानदी हां
(हजे वी इक दूजे दे इक दूसरे दे हथां विच सी। ते राज होले जे उथों निकल गया। )
(रजनी दी टाइट जीन्स नालो कुलदीप दा सलवार सूट वाला ही कैम लग रिहा सी इक दम पंजाबी जट्टी ते रजनी विदेशी मैम)
कुलदीप : पागले मैं राज नूं बचपन तों जानदी हां... इक गल दस तैनूं कदे राज ने परपोज़ किता ।
रजनी : नहीं कदे नहीं ....ते तैनूं...?
कुलदीप : मैनूं वी नई किता यार उस झर्लु जे ने...
(दोनां दे हाथ टिल्हे पे गए। )
रजनी : देखदे हां राज क़ीदे हाथ लगदा है???
कुलदीप : वेख लवां गे फेर...
( इना कह दोनों अपने अपने घरे चलियाँ गइयाँ)
इक दिन फेर रजनी राज नूं ओसे गार्डन च मिल गयी।  राज उठ के जान लगिया ते रजनी ने राज दी बांह फड़ ली ते कहन लगी... 'चल किते घुमन चलिये' राज ने इक बार ता मना करता लेकिन जदों रजनी ने आवदे जन्मदिन होण दा हवाला दिता ते राज तैयार हो गया। कुलदीप वी राज दे पीछे उसदा परछवां बन  पई होई सी। ओह वी दोनां दे पीछे चली आयी। राज ते रजनी समुंदर किनारे आके बैठ गए जिथे उहना दोन्हा तो अलावा कोई नहीं सी जे कोई सी वी ता बहुत दूर सी। जदों राज ते रजनी एक दूजे नाल बैठे गलां करी जांदे सी ता रजनी इके दम राज नाल चिपक जांदी है राज वी चाहन्दे होए वी कुज बोल ना सक्या..ते कुलदीप वी ऐ सब साहमने हुंदे होए वी लज्जा करके नई देख पाई । (इक अंव्याही कुड़ी दी जवानी दी बेवसी नूं देख रब दा दिल वी हड़बड़ा गया होणा  है।आ की बना ता मैं जो प्यार बीच होश गवा बैठी)
राज जिवें ही उथों जान लग्या ते उसदी नजर कुलदीप दे हथां विच गिफ्ट ते पई ते ओह पूछन लगा कि ' की है ऐह्..?' कुलदीप ने उस गिफ्ट नूं अपने पीछे लको लिया । राज ने सोच्या रजनी वास्ते होना है ते अपनी कार वल तुर प्या।जदों राज जा रिहा सी ते कुलदीप दी अक्खां ने राज दी पीठ पीछे शर्ट ते लिप दे निशान दा जहन बीच आया  (वेख ता पेल्हा ही लिते सी लेकिन दिमाग ने हूण विचार्या सी) तां उस दे पीछे दौड़ पई लेकिन राज नहीं रुकया । फिर कुलदीप ने राज नूं एक जोर दारआवाज दिती..." हैप्पी बर्थडे राज..." (आवाज पूरे समुंदर ते पहाड़ा विच गूंज पई ते रजनी वी हैरान सी कि आज राज दा जन्मदिन है ते उसनु पता वी नई।)
राज रुक गया ते कुलदीप ने ओह गिफ्ट दे दिता ते हुनीं खोलन वास्ते केहा। राज ने गिफ्ट खोल्या ते देख्या की शर्ट सी उस दे विच, कुलदीप ने शर्ट हथो-हथ बदलवा दिती। इस दौरान रजनी दियाँ हवसी नजराँ राज दे गठीले बदन ते, अते कुलदीप दियाँ शर्मों दिया नजराँ पासा बट के खड़ियाँ सी । राज थंक्स कह के चला गया। कुलदीप रजनी नूं कहन लगी कि ' रजनी,शायद तूं राज नूं ज्यादा प्यार करदी है ताहियों ता अपना सब कुछ दे दिता उसनु इक इज्ज़त ही ता हुन्दी है इक धी कोले ओवी उस तो वारती। रजनी ऐह् सब कुछ सुनके कुज नई बोली ते अथो चली गयी।
ओदर राज ने अपने माँ-पेयां नु सब कुज दस दिता ते कुलदीप नाल वियाह करोण दी इच्छा व्यक्त कीती । मापे राजी हो लेकिन कुलदीप ने राज दा फोन चुकना बन्द करता जिस कारण राज भी उस नूं मिस करना बंद कर दिता । फिर इक दिन कुलदीप राज नूं बाजार विच मिल गई ओह उथों जान लगी ता राज ने उस नूं इक गल सुनके जान दा किहा। कुलदीप रुक गयी। ते राज ने उसनु परपोज़ मार दिता ते ओह अपने पहले प्यार नूं नाह् ना कर सकी ते रजनी तो माफी मांग के हां कर दिती। पूरे इक साल बाद राज ते रजनी दे बर्थ डे वाले दिन ही शादी दा दिन सी। रजनी वी आयी सी शादी च ।राज ने रजनी नूं ओहि शर्ट (लिप निशां वाली) गिफ्ट करती जिसनु वेख के रजनी दियाँ गुज़रे होए पल फिर जिंदा हो गए ते ओसे पल कुलदीप दे गल च मंगलशूत्र पे जान तो बाद फेर अथरुयाँ च धोते गये..।
(इस तरां एक वला ने पत्नी  दा ते दूसरी ने दोस्त दा था ले ल्या मतलब दोने हुन वलावां नहीं रहियाँ)

*लेखक* : *सुखचैन मेहरा # 9460914014*

July 07, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

             जमाना बदल रहा है (खुली कविता)

                           टैग लाइन
सर्वप्रथम दो पंक्तियां हमारी संस्कृति के लिए
चुन्नरि तन पे नही अब बेटी के
बस अब गले तक आ पहुंची है।
जमाना बदल रहा है के नाम पर
पतन-ए-कगार पर आ पहुंची है।।

बेटी
पापा, जमाना बदल रहा है अब
सोचा थोड़ा मैं मन का कर लूं..।
सलवार सूट, चुन्नरि हो तंग अब
सूट से जीन्स का पलटा कर लूं।।

पापा
तन ढ़कना है बेटी तुने कपडों से
कैसे भी पहनों, पर महीन नही।
लाज का सिरताज तेरे तन पर रहे
तेरी परख है तेरी जवानी ही यही।।

(मतलब एक बेटी की परख जवानी में ही होती है है)

बेटी
मेरी भी कोई तमन्ना है, चाह है
आखिर वयस्क हो गयी हूँ मैं. ।
समझ सकूँ मैं अपना भला-बुरा
हां, इतनी तो बड़ी हो गयी हूँ मैं ।।

पापा
बेटी चाहे  तू  जितनी  बड़ी हो जा
हमारे अनुभव से तो छोटीई रहोगी ।
तू उस दिन भी एक दिन की थी...
और आज भी एक की ही रहोगी ।।

(मतलब जितने साल बेटी बड़ी हुई है
उतने मां बाप भी तो हुए है)

बेटी
पापा तो, हर काम पूछ कर करूँ
कोई चाह ना पालूं, दबा दूँ गला... ।
दबा ही देती हूं चाहतों का गला
बदले जमाने से क्या तलूक भला।।

पापा
बदले जमाने से मुझे जलन नहीं..
न ही किसी प्रकार के कपड़ों से है।
अपनी संस्कृति भी कोई चीज है
जलन तो बस उन..* लफड़ों से है।।

(काफी ठेस पहुंचती है जब कोई हमारी संस्कृति से खेलता है खासकर हम तब कुछ नहीं बोल सकते जब हम या फिर कोई अपना इसे(हमारी संस्कृति को) ठेस पहुंचाए)

बेटी
सही है पापा जमाने के साथ बदलो
*किन संस्कृति को भी जिंदा रखना  है।
हम युवाओं से भी बड़ी सोच आपकी
कि मन लज्जा से और तन ध्वजा से
हमें हर हालात में ढ़कना ही ढ़कना है।।
*ध्वजा=चुन्नरि

पापा
माँ बाप को नाज है तुम जैसी बेटी पर
जो बदले जमाने के साथ चलती रहे।
हर एक बेटी के लिए मिशाल बनकर
हर देश हर घर हर समय जलती रहे।।

लेखकः सुखचैन मेहरा # 9460914014

July 04, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

बाबुल की पगड़ी( एक होनहार बेटी की कहानी)

ले बेटी दही खाले तेरा आज कॉलेज में पहला दिन है ...

लायो माँ मुझे देर हो रही है। (दही खाने के बाद सिमरन जाने लगी)

एक मिनट..... वहां से किसी से कुछ भी लेकर मत खाना , सीधी कॉलेज से घर और घर से कॉलेज जाना, रास्ते में कहीं भी रुकना मत... माँ के चेहरे पर एक असहज सी चिंता साफ दिखाई दे रही थी...

जो अक्सर जवान बेटी और जमाने को देखकर हो ही जाती है।

बेटी ने हँसकर जवाब दिया.. नहीं माँ मैं जैसे आपने बताया है वैसे ही करूंगी आप चिंता न करो। कॉलेज चली गयी।

शुरुआती दिन अच्छे से बीत गए लेकिन कुछ दिन बाद कॉलेज में दो ग्रुपों में तकरार हो गयी ।

उनमें से एक ग्रुप में सिमरन भी थी और उसने अपने ईमानदार व सादगी भरे रवैये के चलते बहुत कम समय मे ग्रुप में धाक जमा ली।

लेकिन जब सिमरन शाम को अपने घर गई तो आगे माँ और बाप दोनों गुस्से से तमतमा रहे थे..अच्छे से बुलाया भी

बुलाते भी कैसे ? बात ही कुछ ऐसी थी।

जब सिमरन ने माँ के हाथ में तस्वीरें देखी तो उसे सारी बात समझ मे आ गई।उसने फट से स्टूडियो वाले को फोन मिला सारी बात साफ कर दी कि वह कृत्रिम फोटोज थी।

अपने पापा को कहा आपकी पगड़ी का ख्याल है मुझे.. पर आपकी चिंता करना भी जायज है जमाना बहुत खराब है ।

पर पापा मैं कभी कुछ ऐसा नहीं करूंगी जिससे आपका सर् शर्म से झुक जाए...सिमरन के पापा की क्रोधी आंखों में आँसू बहने लगे।

सिमरन की बात सुनकर.. जैसे ही  वो थोड़ा नीचे की ओर झुके (माफी के लिए) तो सिमरन ने आपने पापा की गिरती हुई  पगड़ी को संभाल लिया और बड़ी शान से अपने पापा के सर् पर वापिस सजा दी ..। सब के चेहरे खुशी से खिल उठे....
वास्तव में दोस्तो *बेटी हो तो ऐसी* जो *बाबुल की पगड़ी* का पूरा ख्याल रखे।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा

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