July 03, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on July 03, 2018 with No comments

*डर (मेरी अभिव्यक्ति)*

हो सकता है आप मेरी इस अभिव्यक्ति से सहमत न हो लेकिन एक बार पूरी स्टोरी जरूर पढ़ना लेना.

डर भी एक अजीब सा अहसास है। डर कभी तो किसी की जिंदगी बना देता है तो कभी खत्म ही कर देता है ऐसी ही कहानी मैं आपके समक्ष लेकर प्रस्तुत हुआ हूँ।

बात उस समय की है जब लोगों को प्यार का नाम लेते भी शर्म आती थी और पता ही नहीं होता था कि यह सब क्या होता है । हा ये जरूर था कुछ अच्छे लोग अपनी बेटी को पढ़ाने जरूर स्कूल कॉलेज भेजने लगे थे । रामु काका ने भी अपनी प्यारी सी गुड़िया (रंजना) को उस समय की 12वीं  पास करवाई और बेटी की जिद्द पर कॉलेज के लिए भी हां भर दी। कॉलेज थोड़ा दूर था तो बाप खुद छोड़ने जाता और ले आता। करीब एक साल बीत गया, बाप का भी काम बढ़ गया वो अकेली कॉलेज जाने लगी। रास्ते में सुनसान जगह से हो कर जाना पड़ता.. कभी-कभी सहेली का भाई रास्ते में मिल जाता और वो उसके साथ चली जाती। काफी समय बीत गया....एक दिन रंजना की माँ ने कुछ ऐसा देख लिया जो सही नहीं था लेकिन चुप रही केवल इसी  *डर* से की बेटी की पढ़ाई बीच में ना छुट जाय। रंजना  काफी समझाने के बाद भी नहीं मानी...। नतीजा ये निकला कि रंजना ने  एक अजनवी लड़के के साथ भाग जाने का कारनामा कर दिया । जब मां ने अपने पति को बताना चाहा तो वो सामने से कहने लगा मुझे सब पता है ..बस मुझे इतना *डर* था कि 'मैं एक अनपढ़ बाप हूँ मेरी पढ़ी-लिखी बेटी मुझे गलत ना समझ बैठे। डर-डर में ये बात हो गयी।' जब रंजना के पापा  ने उससे कहा कि तुम एक बार हमें बोल तो देती हम तेरी शादी करवा देते उसका घर परिवार देख कर। वो बोली पापा मुझे *डर* था कि आप हम दोनों को अलग नां कर दें ..।
तो दोस्तों देख लो डर-डर में क्या से क्या हो गया। ऐसे समय में एक दूसरे से डरने की जरूरत नहीं। माँ बाप को अपना और बेटी को अपना मत जरूर रखना चाहिए कम से कम दुनियां में इज्जत तो बनी रहेगी..।
*_लेखक_ :सुखचैन मेहरा* # *9460914014*

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