हार्ड डिस्क: भाग 2 (रहस्य)
'पता है अपने विवेक ने इस साल टॉप किया...' ये बताते हुए मधु का उत्साह चरम पे था।
ये सरप्राइज पा कर मेरी खुशी का भी कोई ठिकाना नहीं रहा। खुशी खुशी में मैंने मधु को अपनी बाहों में भर लिया । और कुछ देर यूं ही खड़ा रहा। सोचने लग गया कि कितनी प्यारी पत्नी मिली है।
मधु की कोहनी ने मुझे उससे अलग किया। दोनों मुस्करा रहे थे। मां भी दोनों को यूं देख कर मुस्करा कर आगे चली गयी। हम दोनों कच्चे हो गए
अब मैंने उस हार्ड डिस्क को मधु से न चाहते हुए भी शेयर करने का मन बना लिया और उस हार्ड डिस्क को विवेक की हार्ड डिस्क के साथ रख दिया।
और रविवार को सभी के साथ देखने का निर्णय लिया उससे पहले उसे छूने से भी मना कर दिया । मैंने दोनों हार्ड डिस्क पर निशान लगा (एक पर ।।। तीन लाइनें था दूसरी (रहस्य वाली) पर ।। दो लाइनें लगा दी।" दिए ताकि दोनों की पहचान हो सके।
(रविवार वाले दिन)
हम सब (मां, पापा, दादा, दादी व हम दोनों) इक्कठे हो गए और मैंने मधु को वो हार्ड डिस्क लाने को कहा वो ले आयी।
मां ने मुझे धीरे से बुलाया और कहा, 'तुं तो कह रहा था किसी को बताना मत लेकिन तू खुद ही सब दिखा रहा है। मैंने मधु से वो हार्ड डिस्क चेक की तो वही दो लाइनों वाली डिस्क मेरे सामने थी। (आज भी मां की तरफ हैरानी से देखा कि मां आज बचा दिया..)
मैं अंदर भागा भागा गया और उस हार्ड डिस्क को देख तो उस पर भी दो निशान थे एक पता नहीं किधर गया लेकिन लगाया भी हल्का सा था मेरे ही हाथ से मिट गया हो । क्योंकि उसे में रोज चेक करता था कि वो अपनी जगह पर है या नहीं।
सब बाहर इंतजार कर रहे थे मना भी नहीं कर सकते थे क्योंकि सब बहुत उत्साहित थे। मैं हार्ड डिस्क ले ही गया ये सोचकर कि, ' जो होगा देखा जायेगा।
हार्ड डिस्क जोड़ते समय मेरा दिल धकधक कर रहा था। मेरी मां को मेरे चेहरे के झूठे उत्साह के पीछे सब कुछ दिख रहा था। वो कहने लगी कल देखनी है तो कल देख लेंगे। मैंने बाकी सब की ओर देखा तो मेरी मनाही पर सब (मां को छोड़कर) का उत्साह भारी पड़ा। मैंने हार्ड डिस्क लगा कर शुरू कर दी ।
मेरा दिल अभी भी धकधक- धकधक कर रहा था।
सांस तो तब आया जब मैंने दिल्ली के महाविद्यालय का नाम स्क्रीन पर देखा। मैंने राहत की सांस ली। तब मुझे खुश देखकर मां भी खुशी खुशी देखने लगी। विवेक की एक्टिविटीज देख कर सब गदगद हो गए सब ने खूब इंजॉय किया। मैंने ये हार्ड डिस्क (विवेक वाली) दूसरी हार्ड डिस्क से ।
(रविवार शाम मेरा बेडरूम )
मधु मैं तुम्हारे साथ एक राज शेयर करना चाहता हूं जो अभी तक मुझे भी नहीं पता है वो राज इस हार्ड डिस्क में छुपा है। किसी ने मुझे ये दी है नाम नहीं बताऊंगा।
'हां', कोई बात नहीं नाम मत बताओ । मधु ने कहा
मैंने हार्ड डिस्क कंप्यूटर से जोड़ी ।
पहले ही सीन में मैं हक्का बक्का रह गया उसमें मेरी क्लासमेट *दिशा* का खून होते हुए बताया जा रहा था। हत्यारी के मुंह पर नकाब पहना हुआ था।
मैं आगे कुछ देखता इससे पहले मधु ने कंप्यूटर को सीधे स्विच से ही बंद कर दिया और रो कर बताने लगी उसकी कातिल मैं ही हूँ।
तुम...????
हां.... मैं ... मधु के चेहरे पर अलग सा रोष था।
पर क्यूँ..? मैंने भी रोष जताते हुए पूछा।
बताती हूँ.. उस रात... जब हम दोनों मिलने आये थे(शादी से पहले) तो आप तो वहां से घर आ गए लेकिन मुझे बाजार में कुछ काम था तो मैं एक शॉप पर रुक गयी। वहां मुझे आपकी क्लासमेट दिशा मिली। वो कहने लगी जिगर सिर्फ मेरा है उसके आस पास खटकी ना तो तेरी खैर नहीं... मैंने(मधु) भी कह दिया क्या कर लेगी तुं?? वो कहने लगी पुरानी हवेली के पीछे आ जाना कभी बता दूंगी....
मैं उसे कहे अनुसार वहां आने का चैलेंज स्वीकार कर लिया ।
मैं वहां चली आयी और उसने अपने हाथ में एक गन ले रखी थी...मुझे यहां से जाने से का कह रही थी.... मैं भी सेल्फ डिफेंस ट्रैनर थी कहाँ डरने वाली थी मैं उनके पास गई और उसको चकमा देकर गन अपने हवाले कर ली... वो काफी घबरा गई थी..
मैंने उस पर गन चला दी(गोलियां निकाल दी थी मैंने उसे मारना मेरा उद्देश्य नहीं था)
एक समय तो ऐसा लगा कि वी मर चुकी है क्योंकि वो एक दम स्तब्ध हो गयी थी.....।
मैं उसे छोड़कर कर जाने लगी तो उसने मेरे पर किसी चीज से वार कर दिया । मुझे भी उस पर गुस्सा आ गया और मैंने उसकी गले में डाली चुन्नी से ही गला रेंत दिया.. किसी के आने की आहट सुनकर मैं वहां से भाग निकली।
अब मेरे समझ में नहीं आ रहा कि उसने ये हार्ड डिस्क कैसे बना ली..?
मुझे तो किसी ओर ने दी थी ये हार्ड डिस्क...आज देख पाया हूँ।
गलती तेरी भी नहीं है ना ही उसकी....
ये बात हम दोनों ने दुनियां में आज भी राज ही रखी ।
अगला पार्ट मैं हार्ड डिस्क : भाग 3 नही रख कर "दिशा का भूत" रखने जा रहा हूँ क्योंकि ये एक हॉरर कहानी होगी... जो कि एक ही भाग में पूरा कर दूंगा..
सुखचैन मेहरा # 9460914014

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