July 20, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on July 20, 2018 with No comments

*शायरी व कुछ लाइनें*

समां है, ऐ महबूब खुदा ने तुझे बनाया होगा न जाने किस प्रकार की फुर्सत में,
तभी ताज्जुब है, हसीं तो बहुत देखे है इस दुनियां में लेकिन तुमसा मिलना भी मुश्किल है।।

लोग कहते सुखचैन तुं बहुत बदल गया है,
मैंने कहा, जरूरी था ज़नाब, नहीं बदलता तो लोग अपने ढंग से बदलना शुरू कर देते..।।

बड़ी मुश्किल से लिखता हूँ दो शब्द उनके लिए..2
लेकिन वो हैं ही इतने मशहूर कि दब जाते है नोटिफिकेशन बनकर सरकारी फाइलों की तरह।

बड़ी तम्मना थी कि लिखूं  उनकी तारीफ़ में कुछ।
लेकिन शब्दों अभाव रहा और इक बार फिर चंद लाइनें लिख कर मिटा दी।

अपनी दुनियां में मस्त रह ग़ालिब -2
क्योंकि कुछ नहीं मिला आज तक किसी को किसी की परवाह करके।।

यदि आप लिखनें से पहले किसी से पूछते हो (कैसे लिखूं)
तो ये समझ लीजिए ज़नाब, लिखना आपके वश की बात नहीं।।

*सुखचैन मेहरा*  # *9460914014*

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