जमाना बदल रहा है (खुली कविता)
टैग लाइन
सर्वप्रथम दो पंक्तियां हमारी संस्कृति के लिए
चुन्नरि तन पे नही अब बेटी के
बस अब गले तक आ पहुंची है।
जमाना बदल रहा है के नाम पर
पतन-ए-कगार पर आ पहुंची है।।
बेटी
पापा, जमाना बदल रहा है अब
सोचा थोड़ा मैं मन का कर लूं..।
सलवार सूट, चुन्नरि हो तंग अब
सूट से जीन्स का पलटा कर लूं।।
पापा
तन ढ़कना है बेटी तुने कपडों से
कैसे भी पहनों, पर महीन नही।
लाज का सिरताज तेरे तन पर रहे
तेरी परख है तेरी जवानी ही यही।।
(मतलब एक बेटी की परख जवानी में ही होती है है)
बेटी
मेरी भी कोई तमन्ना है, चाह है
आखिर वयस्क हो गयी हूँ मैं. ।
समझ सकूँ मैं अपना भला-बुरा
हां, इतनी तो बड़ी हो गयी हूँ मैं ।।
पापा
बेटी चाहे तू जितनी बड़ी हो जा
हमारे अनुभव से तो छोटीई रहोगी ।
तू उस दिन भी एक दिन की थी...
और आज भी एक की ही रहोगी ।।
(मतलब जितने साल बेटी बड़ी हुई है
उतने मां बाप भी तो हुए है)
बेटी
पापा तो, हर काम पूछ कर करूँ
कोई चाह ना पालूं, दबा दूँ गला... ।
दबा ही देती हूं चाहतों का गला
बदले जमाने से क्या तलूक भला।।
पापा
बदले जमाने से मुझे जलन नहीं..
न ही किसी प्रकार के कपड़ों से है।
अपनी संस्कृति भी कोई चीज है
जलन तो बस उन..* लफड़ों से है।।
(काफी ठेस पहुंचती है जब कोई हमारी संस्कृति से खेलता है खासकर हम तब कुछ नहीं बोल सकते जब हम या फिर कोई अपना इसे(हमारी संस्कृति को) ठेस पहुंचाए)
बेटी
सही है पापा जमाने के साथ बदलो
*किन संस्कृति को भी जिंदा रखना है।
हम युवाओं से भी बड़ी सोच आपकी
कि मन लज्जा से और तन ध्वजा से
हमें हर हालात में ढ़कना ही ढ़कना है।।
*ध्वजा=चुन्नरि
पापा
माँ बाप को नाज है तुम जैसी बेटी पर
जो बदले जमाने के साथ चलती रहे।
हर एक बेटी के लिए मिशाल बनकर
हर देश हर घर हर समय जलती रहे।।
लेखकः सुखचैन मेहरा # 9460914014

0 comments:
Post a Comment