July 19, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on July 19, 2018 with No comments

तेरा यूं रूठ जाना

खोजता हूं रोज तरीके मनाने के तुम्हें
ना मना पाऊं तो खुद ही मान जाना।
मनाना नहीं आता मुझे, मेरे हमदम
पर रुलाता है..तेरा यूं रूठ जाना।।

किसी से पूछुं कि कैसे मनाऊं तुझे?
पर सब जानते है बात को ठठ्ठों में उड़ाना।
मनाना नहीं आता मुझे, मेरे हमदम
पर रुलाता है..तेरा यूं रूठ जाना।।

चलो खुद ही कौशिश करूँगा आगे
तुम भी मेरे कंधे से कन्धा मिलाना।
मनाना नहीं आता मुझे, मेरे हमदम
पर रुलाता है..तेरा यूं रूठ जाना।।

जरा ये फूल  💐 पकड़ो मेरे हाथ से
अब मुझे वापिस देदो मेरी जाने जाना।।
मनाना नहीं आता मुझे, मेरे हमदम
पर रुलाता है..तेरा यूं रूठ जाना।।

ये हुई ना बात, आई तेरे होठों पे मुस्कान
सिख गया हूँ तुम्हें मनाना ? जरा बताना।।
( *उनका जवाब* )
हां.. हां.. पगलेट, आ गया है मनाना तुझे
आगे से नहीं रूठूँगी मेरे जाने जाना।।

सुखचैन मेहरा # 9460914014

0 comments:

Bookmark Us

Delicious Facebook Favorites More Stumbleupon Twitter

Search