बेटी (लघु-कथा)
* दो मिनट का समय निकालकर जरुर पढ़ें *
फ़ोन की ट्रं – ट्रं से
मां का ध्यान अपनी बेटी के मोबाइल पर गया | दरअसल मोबाइल में सन्देश आया था, जिसे
पढ़ कर पांच क्लास पढ़ी मां के चहरे पर चिंता की एक लकीर बन गयी| बेटी को आते देख, मां
ने मोबाइल अपने पास वहीं रख दिया | बेटी ने अपना मोबाइल देखा तो वही सन्देश उसके
सामने था |फिर उसकी नजर मां का हशमुख चेहरे
जो की चिंता में डूबे देखा तो उसने मां की चिंता को भांपते हुए कहा कि,’मां मैं ऐसा
कोई काम नहीं करूंगी जिस दे नाल तुहानू सर्मिंदगी का सामना करना पबे’ | जे बिगड़ना
ही होवे तां मेरे कोल दिन च छ घंटे(कालेज वाले) हौंदे है पर नहीं, रोज जद बापू अपनी
पगड़ी बन दा है तां औह बापू दी पगड़ी मैनुं चीख-चीख के कहन्दी है ‘बेखीं तीये किते
रोल न देविं’ | ते मेरे दादा-दादी जी दे बोल
मेरे शरीर ते मर्यदारुपी सीमेंट दी परत चड़ा दिंदे ने | इस करके में चाह के वी
मर्यादा नु लंग नहीं सकदी| हां, मेरियां होर बहनां अपने बापू दी पग नूं दाग ला
दिन्दिया ने, पर ओह सो विचों एक है जो बाकी निन्नबे(99) दी आजादी नूं खा जांदी है|
मां..... तुसी आह मेसेज देख के घबरा गये सी जो गूगल कम्पनी तो आया सी...(Hello, Kinjal………….)| किंजल ने हस्ते हुए कहा | अब उसकी मां का चिंताग्रस्त चेहरा वापस हस्मुखता
में बदल गया | लेखक :- सुखचैन मेहरा, सम्पर्क सूत्र:- 9460914014
