December 02, 2017 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
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खुशियों का अकाल (एक हिंदी लघु-कथा)
* दो मिनट का समय निकालकर जरुर पढ़ें * 

      सुबह कोई पांच-छः बजे का समय था| कुछ लोग सुबह की शैर कर अपने-अपने घर लौट रहे थे तो कोई अभी जा ही रहे थे| रास्ते में एक बुजुर्ग ने एक लड़के को उनके बैंक के प्रथम पेपर पास होने पर बधाई दी| लड़के ने बुजुर्ग की बात काटते हुए कहा, ‘दादा जी अभी तो प्री-एग्जाम ही क्लियर हुआ है, इसमें इतना खुश होने और बधाई देने की क्या बात है.....’| तब उस बुजुर्ग ने उस लड़के से कहा, ‘बेटा! आजकल दुनियां में खुशियों का अकाल पड़ गया है| कोई भी एक-दुसरे को प्रगति को देखकर खुश नहीं है| इसलिए जहां-तहां से ख़ुशी मिलती है उसे स्वीकार कर लेना चाहिए | बिल्कुल उसी तरह जैसे पानी का अकाल पड़ने पर, प्यासे को कहीं से भी एक बूंद पानी की मिल जाये तो उसे भी वह अपने अंदर सिप कर लेता है|       सुखचैन मेहरा, सम्पर्क सूत्र:-9460914014

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