🌷🌷🌷
शीर्षक " हंसना भूल गयी "
🌷🌷🌷एक प्रस्तुति 🌷🌷🌷
प्रेम कविता
खुल कर हँसना भी भूल गई थी !
मैं तुमसे मिलना जो भूल गई थी!
बस एक याद थी धीमी सी दिल में !
और कहूँ क्या क्या दिल का आलम !
छोड़ गए हो इस हाल में बालम!
हर पल रहता ख्याल है तुम्हारा !
और मन में तेरा साया लहराता !
सुनहरी रेशमी प्रतिबिम्ब तुम्हारी !
साया बन कर साथ चली आई!!
और यादों पर मेरे सुगन्ध चढाई!
अभिलाष लिए हूँ, मैं बैठी कि
तुम आओ।
और संग मेरे अपने दो मीठे पल बिताओ !
कहो क्या तुम मुझसे रूठ गए हो ?
या अहम में अपने मान लिए
अपने ही अपने से ठन गए हो ?
माना की मैं थी थोड़ी हठीली!
पर क्या थी नहीं रंगिली?
उन्मुक्त उर की चटक हँसी थी !
वह मेरे प्रेम अभिव्यक्ति की निशानी बनी थी !
की मैंने जो थोड़ी अठखेलियां !
और तुम संग हंसी ठिठोलियाँ !
क्या तुम्हें नहीं वो भाया?
इतनी ख़ामोशी में क्यों पड़े थे ?
गंभीर चिन्तन में क्या लिप्त हुए थे?
काश कि तुम व्यक्त वह कर पाते!!
और रंग भरे इस जीवन के ,
संग मेरे कई प्रेम गीत गाते!!
कहो न !!
हाँ कहो ना क्या तुम मुझसे
नहीं प्रेम थे करते ?? या
मुझे पाने का नहीं आह थे भरते ?
सुनो,देखो
मैंने भी हँसना छोड़ दिया है!!
तुम सं बनना शुरू किया है !
और कहूँ क्या
कितना प्रेम किया है !!!
भूल नहीं थी , वह प्रेम था मेरा
और बस चाह थी मेरी कि
तुम संग दो पल बिताऊँ, अभिलाष
जिया की खुल कर बतलाऊँ !!
पर तुम थे जो समझ न पाए!
चुप बनी मैं मौन खड़ी हो
खुद से ही अभिलाष जताए!!
खुल कर हँसना भी भूल गई थी!!
🌹🌹🌹🌹🌹
प्यार किया था, नहीं व्यापार कोई !!
प्रेम में नहीं कोई लेन देन है ,
प्रेम तो बस एक आराधना मन की!!
जो पाओ तो बने कहानी;
नहिं तो बन जाओ राधा रानी!!
प्रेम भक्ती से प्रीत लगाई!!
मैं तो तुम संग प्रेम कर आई!!
प्यार वह अनोखा, खेल हिय का !!
कर तुम जाना गर दिल लगाना !!
और सदा खुल कर हँसते जाना !!
इन्द्रधनुष बने जीवन यह तुम्हारा!!
अब यही दुआ है मेरी
रहो सदा तुम अपनी मगन में,
उर आनंदित कर उरते गगन में!!
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
नुपूर 'नवीन '
औरंगाबाद
बिहार
स्वरचित व अप्रकाशित
