April 19, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

।।मुक्तक कविता : तुम देना साथ मेरा सनम ।।

जीवनसंगिनी

माँ का  घर  मैं छोड़ कर आई हूँ
घर से माँ की  तश्वीर   ले आई हूँ।
अब तुम  मुझे  अपना लेना साथी
एक घर  से  पराई होकर आई हूँ।।

जीवनसाथी

मेरा घर आँगन आज से तेरा हुआ
एकलौता दिल, आज से तेरा हुआ।
बस मेरे माता पिता अपने समझना
मेरा तन मन धन आज से तेरा हुआ।।

जीवनसंगिनी

मुझे  मेरी  माँ की  याद आ रही है
मुझ मेरे पापा की याद  आ रही है।
एक नए  परिवार  की  जरूरत  है
बिछड़े परिवार की याद आ रही है।।

जीवनसाथी

माँ से दूर हो तुम्हें याद तो आएगी
पापा से  दूर  हो  याद तो आएगी।
मेरे परिवार को तुम अपना समझना
परिवार से दूर हो याद तो आएगी।।

जीवनसंगिनी

तुम मेरा ख्याल रखोगे? वादा करो
अपनों  सा प्यार दो गे ? वादा करो।
अब तुम ही मेरा घर संसार हो साथी
तुम मेरा  संसार बनोगे? वादा करो।।

जीवनसाथी

अपना बनाकर रखूंगा, वादा है मेरा
दिल मे बसाकर रखूंगा, वादा है मेरा।
तुम भी  मुझे  पराया  मत  समझना
रानी सी सजाकर रखूंगा, वादा है मेरा।।

जीवनसंगिनी

घर की जिम्मेदारियां कैसे संभालूंगी?
जीवन की नोका को कैसे संभालूंगी?
अगर  डगमगा  जाए,  संभाल लेना
उफ्फ़! पता नहीं ये सब कैसे संभालूंगी??

जीवनसाथी

मत घबरा, तूम नाव, मैं पतवार बनूंगा
हर  मौसम, हर घड़ी  तेरे  साथ रहूँगा।
तुम देना साथ मेरा मेरे अज़ीज, हमदम
तेरे बिना तो मैं अकेला पड़ जाऊंगा।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


April 03, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

मेरी सुबह हो तुम
मेरी शाम हो तुम
मेरा कल  हो तुम
मेरा आज हो तुम।
क्या करूँ हमदम
डर लगता तुम से
वैसे तो  मूर्खों  के
सरताज  हो  तुम।।

मेरा मौन हो तुम
मेरी आवाज तुम
मेरा घर  हो  तुम
मेरा समाज हो तुम।
क्या करूँ हमदम
डर लगता तुम से
वैसे तो  मूर्खों  के
सरताज  हो  तुम।।

मेरा धन हो तुम
मेरा मन हो तुम
मेरा अंजाम हो तुम
मेरा आगाज हो तुम।
क्या करूँ हमदम
डर लगता तुम से
वैसे तो  मूर्खों  के
सरताज  हो  तुम

वैसे तो मूर्खो के
सरताज हो तुम
लेकिन.....  बड़े
लाजवाब हो तुम
मैं जान सकूँ  ना
वो राज  हो  तुम
मेरा तन  हो  तुम
लिबाज़  हो  तुम

(नाराज मत होइएगा अब जो बोलूंगा सच बोलूंगा।)

सच  कहता  हूँ  मैं
बहुत खास हो तुम
मेरी जिंदगी में आयी
दिन-रात  हो  तुम।
क्या  करूँ  हमदम
डर लगता तुम से
वैसे तो  मूर्खों  के
सरताज  हो  तुम।।

(मैं तो सुधरने वाला नहीं हूँ, क्योकि आज का दिन ही ऐसा है।)

स्वयं कथन

ये कविता सिर्फ  मनोरंजन  के लिए है।
जो इस समय पढ़ रहा है उसके लिए है

(गुस्ताखी माफ, ओनली मजाक)

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


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