March 21, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

होली तेरे संग प्रिये।

होली का  त्योहार  आया, प्रिये,
अपने संग खुशियां लाया, प्रिये।

आओ खेलो तुम मेरे संग, प्रिये,
लगाओ प्रेम रंग,अंग अंग,प्रिये।

तेरे बिन तो हर रंग बे रंग, प्रिये,
होली मोद तो तेरे ही संग, प्रिये।

भर लो प्रेम की पिचकार, प्रिये,
गिला कर दो रूह संसार, प्रिये।

ज़रा  और  पास आओ ना, प्रिये,
दूर रहकर यूँ तड़फाओ ना, प्रिये।

(वो पास आ चुके है ☺️☺️☺️)

कर तेरे दर्शन मन हुआ प्रसन्न, प्रिये,
मुझे तेरी रूह रंगनी है न  तन, प्रिये।

रंगों का त्योहार है रंग लगाऊं, प्रिये,
जी करे तेरे ही रंग में रंग जाऊं, प्रिये।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा

March 17, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

मेरा मन व्याकुल , है तन स्तब्ध
हीये में हलचल  सी  मचा रहे है।
बसन्त ऋतु के आगमन पर
है सखी, मेरे पिया घर आ रहे है।।

चूड़ियां खनकाऊँ, कुमकुम सजाऊँ
वो मेरे अन्तर्मन के भाव जगा रहे है।
बसन्त ऋतु के आगमन पर
है सखी, मेरे पिया घर आ रहे है।।

अजीब सी खुशी,अजीब तड़फ
न जाने इतनी देर क्यूँ लगा रहे है?
बसन्त ऋतु के आगमन पर
है सखी, मेरे पिया घर आ रहे है।।

न आँगन ठहरूँ ना तोरण ठहरूँ
बेचैन मन की व्यकुलता बड़ा रहें है।
बसन्त ऋतु के आगमन पर
है सखी, मेरे पिया घर आ रहे है।।

इंतजार खत्म, आ गये पिया
तोरण खड़े मंद मंद मुस्करा रहे।
बसन्त ऋतु के आगमन पर
है सखी, मेरे पिया घर आ गये है।

कर पिया दर्शन, मन हुआ प्रसन्न
वो मेरी हृदय सम्पन्दन बढ़ा रहे है।
बसन्त ऋतु के आगमन पर
जा सखी, मेरे पिया घर आ रहे है।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


March 14, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

होली के घाव


आज चारों और रंग ही रंग था सब हँसी खुशी होली का आनंद ले रहे थे। बच्चा बच्चा खुश था। 

लेकिन इनके बीच एक बच्चा निराश हताश बैठा था। उम्र कोई होगी 12-13 साल । मैंने उसके पास जाकर पूछा 'क्या हुआ'?

उस लड़के ने कोई जवाब नही दिया 

दुबारा पूछने पर भी कोई जवाब नही आया।

मैंने थोड़ा जोर देकर पूछा तो भी कुछ नही बोला।

बस वो देखे जा रहा था

मैंने उसके सर् पर लिया कपड़ा उतार दिया।

उसके सर् से खून आ रहा था हल्का हल्का सा। 

मैंने सामने से उसके कंधे पर हाथ रख झझकोरते हुए पूछा ये किसने किया 

उसने अपनी जीभ निकालकर इशारा किया कि बोल नही सकता।

ये देख मेरा मन करुणा से भर गया ।

वो भी थोड़ी दूर बैठे अपने छोटे बहन भाई की कोर इशारा करते हुए अपनी आंखें मसलने लगा।

मैंने देखा वहा छः साल का बच्चा और लगभग तीन साल की बच्ची बैठे रो रहे थे।

मैंने उससे इशारा कर पूछा वो कौन है ? और तेरे ये सिर पर चोट कैसे लगी।

उसने मुझे इशारे से पूछा कि कलम है ?

हा...

मैंने उसे अपनी पॉकेट में से कॉपी पेन निकाल कर दिया।

उसने जो लिखा उसे पढ़कर मैं अपनी आंखों में आंसू रोक नहीं पाया।

पता चला कि वो बच्चे उसके भाई बहन है। माँ बाप नहीं है।

इसके बाद मैं उसके हर एक इशारों को भली भांति समझने लगा। मुझसे  पढ़ा नही जा रहा था। मैंने उससे कागज वापिस ले लिया। बस उसके इशारों को समझते गया।

उसने सब कुछ समझा दिया इशारों इशारों में और लिखकर। यथा:-

मैं जब 5 वी में पढ़ता था तब एक हादसे में मेरी जीभ कट गई थी। 

वो मेरे छोटे भाई बहन है भाई ने रंग लाने के लिए जिद्द की । 

माँ बाप नहीं रहे।

मेरे पास रंग  के लिए पैसे नहीं थे लेकिन मैं अपने भाई बहन की आंखों में आंसू नही देख सकता।

मैं एक दुकानदार के यहाँ से एक रंग की पुड़िया चुरा लाया लेकिन उसके बेटे ने मुझे देख लिया।

इस बीच छीना झपटी में मेरे ये चोट लग गयी। 

लड़के ने अपनी व्यथा का बहुत ही मार्मिक चित्रण किया। 

मैंने अपने आंसू पोंछते हुए उसकी रोटी छोटी बहन को उठाया और भाई को भी साथ ले लिया।

वो लड़का आगे आगे चल रहा था मुझे उस बनिये की दुकान पर ले आया।

मैंने बनिये को पूरी स्थिति से अवगत करवाया। 

(अंत मे) चोर ओर मजबूर में अंतर होता है सेठ। वरना किसका जी चाहता है दस रुपये रंग की पुड़िया के बदले सिर पर घाव खाये।

बनिया सेठ को अपनी गलती का अहसास हो गया।

उसने बच्चों से हाथ जोड़ कर माफी भी मांगी। और रंग भी दिया । 

अब उन बच्चों के बड़े भाई को घाव का दर्द कम बल्कि अपने भाई बहन को रंग से खेलते खुशी ज्यादा हो रही थी।

मैं भी उसको सलाम करते हुए विदा हो गया।

स्वरचित

सुखचैन मेहरा


March 09, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

शादी से पहले की आजादी

आज पराग बहुत खुश था, क्योंकि शादी की तारीख तय हो चुकी थी। अब वो सोचने लगा कि बस किसी तरह ये महीना भी बीत जाए।

उधर कोमल (पराग की मंगेतर) की फ्रेंड्स ने कहीं घूम कर आने की योजना बनाई। कोमल मान गयी। कोमल का दोस्त आर्यन भी साथ मे ही था।

कोमल ने अपने माँ बाप से आखरी बार घर से बाहर कही घूम के आने के लिए पूछा।

माँ, शादी का महीना तय हो गया है, मैं इस घर से चली जाऊंगी। मेरी सहेलियां मुझ से बिछड़ जाएंगी। मैं एक आखरी बार अपने दोस्तों के साथ टूर पर जाना चाहती हूँ।

माँ: ठीक है बेटा मैं शाम को तेरे पापा से बात करती हूँ।

कोमल की माँ ने कोमल के पापा से बात की।

वो बोले, 'कोई ऊंच नीच हो गयी तो ?'

माँ: इतना तो विश्वास है हमें हमारी बेटी पर।

पापा: विश्वास तो है लेकिन आज कल समय सही नहीं है लड़कियों के लिए।

ये सब कोमल चुपके से सुन रही थी।

कोमल बीच में ही बोल पड़ी, 'पापा, आप कहते हो तो मैं कही नही जाऊंगी।

कोमलआ का उदास चेहरा देख कोमल के पापा ने हा कर दी।

कोमल बहुत खुश हुई।

अगले ही दिन सब दोस्त घूमने के लिए निकल पड़े।

वह सब गंतव्य जगह पर पहुंचे। सब बहुत खुश थे। हर एक पल को जी रहे थे। कोमल को फ़ोटो खिंचवाने का बहुत शोंक था। उसने ग्रुप में फ़ोटो खिंचवाई।

उसका दोस्त आर्यन ने उसके साथ एक सेल्फी लेने की इच्छा जताई। कोमल ने खिंचवा ली।

अब शाम हो चुकी थी। सब अपने अपने काम मे व्यस्त हो गए आर्यन ने कोमल को एक बात कहने का कह कर अकेले में मिलने को कहा।

कोमल ने मना कर दिया। लेकिन उसने दोबारा कहा तो मान गयी।

कोमल चली गयी। थोड़ी देर आर्यन और कोमल ने बातें की।

'अब एक महीना ही  रह गया है तेरी शादी में मेरा एक काम तो करदे।' आर्यन ने कहा।

'कैसा काम?' कोमल ने पूछा।

बस मुझे छूना है तुझे अभी नहीं शादी से एक दिन पहले या बाद में कभी भी।

कोमल ये सुनते ही आर्यन को एक तमाचा लगा वहां से चली आयी।

रमा के पूछने पर सब बताया दिया कोमल ने।  रमा बोली 'इसमें दिक्कत क्या है? मैंने भी किया था।'

(रमा शादीशुदा थी)

'अरे! मजे मार ले शादी के बाद सब खुहाइशें अधूरी रह जाती और पराग को कौनसा पता चलने वाला है ।'

(अब कोमल ने जो कहा सुनने लायक था)

'तू अपने दिल पर हाथ रखकर सोच कि तू किसी की पत्नी कहलाने के लायक है या नहीं।'

'अगर हम अपने होने वाले पति के लिए अपनी इज्जत बचा के नहीं रख सकते तो हम किस मुँह से उसे अपना पति परमेश्वर कहेंगे।'

(रमा बस चुप चाप सुन रही थी।)

क्या परमेश्वर के दरवार पर जूठा प्रसाद चढ़ा है कभी?

'अरे! हम सब इक्कठे पढ़ें है, इस लिए सोचा कि, शादी से पहले एक टूर शेयर कर ले एक दूसरे से।'

शादी से पहले मजे लेने का मतलब ये नही है कि, 'अपनी इज्जत तक दांव पर लगा दे। इक्कठा होने की खुशी ही कुछ अलग होती है यार।'

(रमा अपने आप के लिए शर्मिंदा थी और उसे कोमल की सोच पर नाज भी हो रहा था।)

वह सब अपने अपने घर लौट आये। कोमल ने उस बात को एक बुरा वक्त मान कर छोड़ दिया।

शादी से ठीक एक दिन पहले आर्यन का एक मैसेज आया कि, 'मुझे मिलो नही तो तेरी सारी तश्वीरें तेरे मंगेतर को दे दूंगा।'

कोमल ने उसका प्रतिउत्तर देते हुए लिखा कि, 'तूने जो करना है कर ले जब तक मैं सही हूँ मुझे डरने की कोई जरूरत नहीं।

(कोमल ने आर्यन को ब्लॉक कर दिया। आर्यन ने इससे ख़फ़ा हो कर वो सारी सेल्फियां, फोटोज पराग को सेंड कर दी )

पराग ने फोटोज देख कर जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं किया। पराग ने उसकी बहन (पड़ोसी बहन) को कोमल से बात करने का संदेश दिया।

फिर दोनों ने पापा के व्हाट्सएप्प नंबर पर बात करने का फैसला किया।

तकरीबन रात 10.14 मिंट पर बात शुरु हुई ।

पराग: हेलो जी।

कोमल: जी

पराग: आपके किसी फ्रेंड ने ये फोटोज भेजी है....

(फोटोज प्रेषित करते हुए लिखा)

कोमल: हा, ये मेरे साथ कॉलेज में पढ़ता है।

पराग: यदि कोई ऐसी वैसी बात है तो बता दो। कहीं आप दोनों एक दूसरे से प्यार तो नहीं करते? यदि ऐसी बात है तो मैं बीच मे से हट जाता हूँ।

कोमल: नही, ऐसी कोई बात नही है।

पराग: यदि कोई ऐसी बात है तो बता दीजिए क्योकि मैं किसी के प्यार को नहीं छीन सकता क्योकि आज तक किसी का प्यार छीनकर कोई खुश नहीं रह पाया।

कोमल: नहीं, आप यकीन मानिए ये मेरे साथ कॉलेज में पढ़ता है । हम एक ही क्लास में पढ़ते है। हम सिर्फ एक सहपाठी है।( टूर पर हुआ वो सब बता दिया।)

पराग: ठीक है, आप चिंता न कीजियेगा। मुझे आप पर पूरा यकीन है।

कोमल: ओके, थैंक्स। ऐसी कोई बात होगी तो सबसे पहले आपको बताऊंगी।

पराग: ओके, कोई बात नहीं। कहीं मरा मत देना जी। जिंदगी का सवाल है अपने दोनों की।

कोमल: आपको यकीन नहीं है अभी भी।

पराग: गुस्ताखी माफ कीजिएगा। मजाक कर रहा था।

कोमल: ओके, और बताओ

पराग: बस ठीक है...

(इस तरह जो भी बात थी क्लियर हो गई।)

शादी की सब तैयारिया हो चुकी थी

अब समस्या तब खड़ी हो गयी जब ये बात कोमल के माँ बाप को पता चली।

वो सोचने लगे कि ये सब टूर के दौरान हुआ है। ना टूर पर भेजते और ना ये बात होती।

जब पराग को पता चला कि कोमल के घर वाले उसे गलत समझ रहे है तो पराग ने कोमल के माता पिता से बात करके सब समझा दिया।

अगले दिन राहुल बैंड बाजा लेकर आ गया। कोमल के पास बहुत से उपहार इक्कठे हो गए। सब खुश थे।

शादी बड़ी धूमधाम से हो गयी।

उन उपहारों में से एक उपहार आर्यन का भी था। (उस उपहार पर उसका संक्षिप्त नाम A. K. (आर्यन कुमार) लिखा था)

कोमल उपहार को सबके सामने  खोलना नहीं चाहती थी।

कोमल की चचेरी बहन: खोलो ना दीदी......

एक अन्य: ये भी खोलो ना.....

कोमल की सहेली:- कोमल खोल इसे भी...

लेकिन कोमल उसे अभी भी खोलना नहीं चाहती थी। सोच रही थी कि कुछ गलत ना  हो इसमें ...

आखिर कोमल ने उस उपहार को खोल ही लिया। उसमें जो लिखा था पढ़कर कोमल का सारा डर छूमंतर हो गया।

उपहार में आर्यन का माफी नामा था। कोमल ने उसे सब के सामने पढ़ना उचित नहीं समझा। लेकिन उसमें लिखी एक एक बात आर्यन के सुधर जाने  की गवाही दे रही थी।

आज कोमल का जीवन बहुत हँसी खुशी बसर हो रहा है। जैसा पति कोमल को मिला वैसा पति भगवान सब को दे।

और.......

जैसी पत्नी पराग को मिली वैसी पत्नी भगवान सब को दे।

मेरे ख्याल से ऐसी जोड़ियां दुनियां की सबसे बेहतरीन जोड़ियों में से एक होती है।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


March 07, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

कहाँ बाँधोगी राखी को ??

भाई

बहना मेरी कलाई सलामत नहीं
तुम कहां बन्धों गी राखी को।
बिन हाथों के कैसे रक्षा करूँगा
क्या निभा पाऊँगा मैं साखी को।।

बहन

भाई तुम उदास ना हो इस दिन
पैरों पर बांध दूंगी मैं राखी को।
मेरी रक्षा तेरे दिए संस्कार करेंगे
हां ऐसे निभाएगा तू साखी को।।

भाई

फिर भी कमी तो कमी होती है
असफल हूँ कुछ भी करने में।
जब कोई मुसीबत आती है तो
विश्वास रखता हूँ मैं डरने में ।।

बहन

कोई कमीं नहीं दिखती तुझ में
किस्मत समझती हूँ तेरी बहन।
हार मत मान यूँ मेरे प्यारे भैया
आग उगले सदा जहरि जहन।।

भाई

छोटी है पर होंसले में है बड़ी
जिद्दी भी हो तु हमेशा से ही।
सही कहता हूं बिल्ली तुझको
काटती है जो मेरी बात कही।।

बहन

बिल्ली मत कहा कर भाई मुझे
आगे से मैं तुझे उल्लू नई कहूंगी।
पर लड़े बगैर नींद नहीं आती है
कभी कभी तो जरूर लड़ा करूंगी।।

भाई

ठीक, बांध दो राखी मेरे पैरों पर
सदा मुस्कराती रह दुया यही है।
आज से वो सब तुम करती जाओ
जो तेरे और सब के लिए सही है।।

बहन

ठीक है भैया, तेरे बताए रास्ते पर
सदा चली हूँ, आगे भी चलती रहूंगी।
तेरे जैसे मन का भाई रब सबको दे
बस रब से सदा यही दुया करूंगी।।

सुखचैन मेहरा #9460914014


March 01, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments

कुछ मुक्तक -2

कैसे भुल सकता हूँ  उस  काली  रात को
जिसके बाद सवेर भी अंधेर में बदल गई।
लोक  दिखावे  के  लिए  खुश  रहता हूँ मैं
खुशी तो हमें कब से छूकर दूर निकल गई।

बार  बार  समझाने  की   गलती   अब  ना कर
है मेरे  सैनिक  अब  तू  घर में घुसकर बार कर।
दुश्मन के  बहम  को  मिटा दे   अब  अवसर है
मिटा दे हर दुश्मन को, माथे पर गोरी मार कर।।

वीर जवान  जो नही  रहे  उनका बदला  लेना  है
बर्दाश्त नही है कुछ भी ना कुछ कहना, सुनना है।
उड़ा देंगे अब जो भी  आगे आया, पाक बचाव में
पत्थरबाजों के पत्थर का जवाब गोली से देना है।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


Bookmark Us

Delicious Facebook Favorites More Stumbleupon Twitter

Search