होली के घाव
आज चारों और रंग ही रंग था सब हँसी खुशी होली का आनंद ले रहे थे। बच्चा बच्चा खुश था।
लेकिन इनके बीच एक बच्चा निराश हताश बैठा था। उम्र कोई होगी 12-13 साल । मैंने उसके पास जाकर पूछा 'क्या हुआ'?
उस लड़के ने कोई जवाब नही दिया
दुबारा पूछने पर भी कोई जवाब नही आया।
मैंने थोड़ा जोर देकर पूछा तो भी कुछ नही बोला।
बस वो देखे जा रहा था
मैंने उसके सर् पर लिया कपड़ा उतार दिया।
उसके सर् से खून आ रहा था हल्का हल्का सा।
मैंने सामने से उसके कंधे पर हाथ रख झझकोरते हुए पूछा ये किसने किया
उसने अपनी जीभ निकालकर इशारा किया कि बोल नही सकता।
ये देख मेरा मन करुणा से भर गया ।
वो भी थोड़ी दूर बैठे अपने छोटे बहन भाई की कोर इशारा करते हुए अपनी आंखें मसलने लगा।
मैंने देखा वहा छः साल का बच्चा और लगभग तीन साल की बच्ची बैठे रो रहे थे।
मैंने उससे इशारा कर पूछा वो कौन है ? और तेरे ये सिर पर चोट कैसे लगी।
उसने मुझे इशारे से पूछा कि कलम है ?
हा...
मैंने उसे अपनी पॉकेट में से कॉपी पेन निकाल कर दिया।
उसने जो लिखा उसे पढ़कर मैं अपनी आंखों में आंसू रोक नहीं पाया।
पता चला कि वो बच्चे उसके भाई बहन है। माँ बाप नहीं है।
इसके बाद मैं उसके हर एक इशारों को भली भांति समझने लगा। मुझसे पढ़ा नही जा रहा था। मैंने उससे कागज वापिस ले लिया। बस उसके इशारों को समझते गया।
उसने सब कुछ समझा दिया इशारों इशारों में और लिखकर। यथा:-
मैं जब 5 वी में पढ़ता था तब एक हादसे में मेरी जीभ कट गई थी।
वो मेरे छोटे भाई बहन है भाई ने रंग लाने के लिए जिद्द की ।
माँ बाप नहीं रहे।
मेरे पास रंग के लिए पैसे नहीं थे लेकिन मैं अपने भाई बहन की आंखों में आंसू नही देख सकता।
मैं एक दुकानदार के यहाँ से एक रंग की पुड़िया चुरा लाया लेकिन उसके बेटे ने मुझे देख लिया।
इस बीच छीना झपटी में मेरे ये चोट लग गयी।
लड़के ने अपनी व्यथा का बहुत ही मार्मिक चित्रण किया।
मैंने अपने आंसू पोंछते हुए उसकी रोटी छोटी बहन को उठाया और भाई को भी साथ ले लिया।
वो लड़का आगे आगे चल रहा था मुझे उस बनिये की दुकान पर ले आया।
मैंने बनिये को पूरी स्थिति से अवगत करवाया।
(अंत मे) चोर ओर मजबूर में अंतर होता है सेठ। वरना किसका जी चाहता है दस रुपये रंग की पुड़िया के बदले सिर पर घाव खाये।
बनिया सेठ को अपनी गलती का अहसास हो गया।
उसने बच्चों से हाथ जोड़ कर माफी भी मांगी। और रंग भी दिया ।
अब उन बच्चों के बड़े भाई को घाव का दर्द कम बल्कि अपने भाई बहन को रंग से खेलते खुशी ज्यादा हो रही थी।
मैं भी उसको सलाम करते हुए विदा हो गया।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा

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