Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on March 01, 2019 with No comments
कुछ मुक्तक -2
कैसे भुल सकता हूँ उस काली रात को
जिसके बाद सवेर भी अंधेर में बदल गई।
लोक दिखावे के लिए खुश रहता हूँ मैं
खुशी तो हमें कब से छूकर दूर निकल गई।
बार बार समझाने की गलती अब ना कर
है मेरे सैनिक अब तू घर में घुसकर बार कर।
दुश्मन के बहम को मिटा दे अब अवसर है
मिटा दे हर दुश्मन को, माथे पर गोरी मार कर।।
वीर जवान जो नही रहे उनका बदला लेना है
बर्दाश्त नही है कुछ भी ना कुछ कहना, सुनना है।
उड़ा देंगे अब जो भी आगे आया, पाक बचाव में
पत्थरबाजों के पत्थर का जवाब गोली से देना है।।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा

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