Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on July 15, 2018 with No comments
*वाह! रे चोर तूने जन्म ही क्यूँ लिया।*
*गीत चोर*
मेरा लिखा गीत तूने अपना बना लिया
वाह! रे चोर तूने जन्म ही क्यूँ लिया
*दिल चोर*
कुछ नहीं छोड़ा सिवाए शरीर के
तूने हमारा दिल भी चुरा लिया
वाह! रे चोर तूने जन्म ही क्यूँ लिया।
*घरेलू चोर*
तूने चंद पैसों के लिए जमीर बेचा
घर मैं ही डाका डाल लिया।
वाह! रे चोर तूने जन्म ही क्यूँ लिया।
*लेखन चोर*
मुश्किल से चली थी कलम मेरी
तूने मेरी कलम को ही चुरा लिया।
वाह! रे चोर तूने जन्म ही क्यूँ लिया।
लेखक: सुखचैन मेहरा # 9460914014

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