July 22, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
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                      रिश्तों की गली

'रिश्तों की गली' जितना सुन्दर उस सुनसान रास्ते(गली) का नाम था, उतना ही डरावना व भयंकर उसके बारे में सुना था मैंने । लेकिन मुझे विश्वास नहीं है कुछ इस तरह की बातों पर।
एक अमावस्या की शाम मैंने अपने दोस्त को कहा कि, चल चलते है 'रिश्तों की गली'।
(वो भयंकर तरीके से डर गया था ये सुनते ही। जैसे कि पहले ही जा आया हो वहां, भुगत भोगी हो) ना... भाई मैं नहीं जाऊंगा वहां तेरे साथ वो तुझे भी मार डालेगी ।( उसका गोल-गौरा चेहरा डर के मारे पसीने से लथपथ हो गया था।) उसकी ये हालत देख कर तो ऐसा लगा कि मुझे भी नहीं जाना चाहिए वहां। पर मुझ पर तो निडरता का भूत सवार था। मुझे तो देखना था कि कोई डरावनी काया होती कैसी क है....
मैं घर पर कोई बहाना लगाकर चला गया, वहां।

'रिश्तों की गली' में प्रवेश करते ही मेरे नकारात्मक मस्तिष्क ने सोचना शुरू कर दिया, जहन में अलग अलग आकृतियां बनने लगी। थोड़ा सा पत्ता भी हिलता तो किसी के आने का अंदेशा लगता ।सामने कोई नहीं था फ़िर भी किसी इंसान की उपस्थिति महसूस हो रही थी। पहले तो वापिस घर जाने के लिए तैयार हो गया । लेकिन बाद में मैंने सोचा चलो आगे जा कर देखूं  तो सही..।
मैं काफी आगे निकल गया। सुनसान रास्ते में रोशनी का तो नामोनिशान नहीं था चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा था ।
थोड़ा ओर आगे गया तो  किसी ने पीछे से आकर  मेरे कंधों पर हाथ रख दिया(मेरी चीख़ निकलते निकलते बची) डर तो मैं गया ही था, धड़कनें भी  तेज हो गयी थी मेरी..लेकिन वो कोई साया नहीं, आदमीं(हुलिया बताऊं तो, एक दम पागलों जैसा)था। मेरी सांसे अभी भी नॉर्मल नही हो पा रही थी।
वो आदमीं कहने लगा, चला जा यहाँ से... चला जा...बेमौत मारा जाएगा....हां... बेमौत मारा जाएगा। लेकिन पलक झपकते ही वो आंखों से औझल हो गया । अंधेरा बहुत गहरा रहा था। मैंने सोचा अब इतना अंधेरा हो गया है ओर थोड़ी देर यहां रुकना मूर्खता ही होगी। दो तीन बार किसी चीज से अटक कर गिरते-गिरते बचा। पता नई क्या था वो। कमबख्त मोबाइल ने भी साथ छोड़ दिया।  मैंने भी आगे जाना उचित नहीं समझा। जब वापिस आने के लिए पलटा तो पता चला कि मैं 'रिश्तों की गली' के अंतिम छोर पर खड़ा हूँ, क्योकि आगे रास्ता बंद था और वाहनों की आवा- जावी साफ दिखाई दे रही थी। इस गली में आगे (वापिस जाने के रास्ते में) जाकर रोशनी नामोनिशान  नही था। कानों को तरह तरह की आवाजें व चीखें सुनाई देने लगी।
"हे रुको..." की आवाज मेरे कानों में पड़ी लेकिन मैंने अनसुना कर दिया। मैं वहां से दौड़ पड़ा... मैं वास्तव में डर गया था। ऐसा लग रहा था कि कोई मेरा पीछा कर रहा है। पलट कर देखा तो कोई नहीं । मैं किसी ना किसी तरह घर पहुंचा। रात को बस वो चीखें, आवाजे ही सुनाई दे रही थी। मुझे पूरी रात नींद नही आयी। सुबह 4 बजे नींद ने ही मुझे अपने आगोश में ले लिया।
सुबह जब में लेट उठा तो माँ ने कारण पूछा तो बता दिया कि 'माँ रविवार है इसलिए।'
मेरे जहन में अभी उस राज को जानने की कश्मकश चल रही थी और डर भी लग रहा था। आख़िरकार मैंने 'रिश्तों की गली'  की ओर रुख कर लिया। मैं रिश्तों की गली के भीतर तक चला गया । वही आवाजों व चीख़ों ने मेरे कान पर डेरा डाल लिया।
"मेरी बात सुन ध्यान से... "की आवाज मेरे बिल्कुल नजदीक से सुनाई दी और मैं पलटा तो सामने एक बदशक्ल  औरत मेरे सामने थी, मैं एकदम से घबरा गया और डरकर  वहां से भागने लगा,  (क्योंकि वो बहुत ही डरावनी लग रही थी) मैं किसी  से अटक कर गिर गया। वो किसी आदमी की डेड बॉडी ही थी। इसे देखकर मैं ओर डर गया था।
फिर उसने मुझे कहा डरो मत मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाऊंगी । मैं नहीं रुका। उसने मेरे सामने से आकर मेरा गला पकड़ लिया। मैंने समझा आज तो मेरी खेर नही । वो मेरा डरा हुआ चेहरा देखकर अजीब तरीके से हँसने लगी (ही.. ही.. ही.. हा.. हा) मुँह से बहुत गंदी बदबू आ रही थी उसके । मेरे गिड़गड़ाने से उसने मेरा गला छोड़ दिया। कहने लगी, ' मेरी बात ध्यान से सुन तुम ही हो जो मुझे इंसाफ़ दिला सकते हो ...

कौनसा इंसाफ़...??कैसा  इंसाफ..???मैंने दबी हुई आवाज में पुछा।
बताती हूँ...' आज से पांच साल पहले मेरा पति मुझे व्याह कर इस रास्ते से लेकर जा रहा था। लेक़िन कुछ दरिंदो ने पूरी बारात पर गोलियां बरसा दी ... सब लोग मारे गये, सिवाए मेरे । वो मुझे भी मरना चाहते थे लेकिन मैं यहां से भाग निकलने में कामयाब हो गयी पुलिस के आ जाने से वो दरिंदे भाग गए ..पुलिस ने सारी डेड बॉडीज को एम्बुलेंस में डाल कर ले गयी लेकिन में उनसे बदला लेने के लिए आज भी यहीं गली में घूम रहीं हूं और जो मेरी सहायता करने से मना कर देता है तो मैं उसे यहीं मार डालती हूँ। (उसने हथियार दिखाते हुए कहा)
ये हथियार कहाँ से आये... मैंने पूछा।
उन दरिंदो ने छुपाके रखे थे यहाँ...
वो बात समझाए जा रही थी लेकिन मेरे डर के मारे सांस सूखे जा रहे थे। क्योंकि वास्तव में बहुत डरावनी लग रही थी।

मैं डरा हुआ तो था ही लेकिन उसकी दर्द भरी कहानी सुनकर मैं उनकी सहायता करने के लिये हां कह दी।
वास्तव में उस दिन उसके कई रिश्तों का कत्लयाम हो गया था..

क्या करना होगा मुझे..? मैंने उससे पूछा।
आज से महीने बाद वो जैल से रिहा होने वालें है ।(पहुँच वाले होने के कारण जल्दी रिहा होने वाले थे)। वो यहां अपने हथियार लेने जरूर आएंगे।
'बस तुम मेरा साथ देना'...उसने कहा।
'ठीक है...' मैंने जवाब दिया।

          (एक महीने बाद)

उनके कहे मुताबिक वो हथियार लेने आये तो हमने उन पर गोलियों की बरसात कर दी और एक इंतक़ाम को अंजाम दे दिया।
इसके बाद उसने अपना मुखोटा(डरावना) उतारा। तो दंग रह गया उसके गोर चिट्टे रंग को देख कर। लेकिन वो सांसो की दुर्गंध तो अभी भी आ रही थी.।।

तो दोस्तों इस तरह से वापिस 'रिश्तों की गली' में रौनक़ आ गयी थी लोगों का आने-जाने से....
उसकी मुखोटा पहने सुरत आज भी डरा कर हँसा देती है।

लेखक : *सुखचैन मेहरा* # *9460914014*


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