July 04, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on July 04, 2018 with No comments

बाबुल की पगड़ी( एक होनहार बेटी की कहानी)

ले बेटी दही खाले तेरा आज कॉलेज में पहला दिन है ...

लायो माँ मुझे देर हो रही है। (दही खाने के बाद सिमरन जाने लगी)

एक मिनट..... वहां से किसी से कुछ भी लेकर मत खाना , सीधी कॉलेज से घर और घर से कॉलेज जाना, रास्ते में कहीं भी रुकना मत... माँ के चेहरे पर एक असहज सी चिंता साफ दिखाई दे रही थी...

जो अक्सर जवान बेटी और जमाने को देखकर हो ही जाती है।

बेटी ने हँसकर जवाब दिया.. नहीं माँ मैं जैसे आपने बताया है वैसे ही करूंगी आप चिंता न करो। कॉलेज चली गयी।

शुरुआती दिन अच्छे से बीत गए लेकिन कुछ दिन बाद कॉलेज में दो ग्रुपों में तकरार हो गयी ।

उनमें से एक ग्रुप में सिमरन भी थी और उसने अपने ईमानदार व सादगी भरे रवैये के चलते बहुत कम समय मे ग्रुप में धाक जमा ली।

लेकिन जब सिमरन शाम को अपने घर गई तो आगे माँ और बाप दोनों गुस्से से तमतमा रहे थे..अच्छे से बुलाया भी

बुलाते भी कैसे ? बात ही कुछ ऐसी थी।

जब सिमरन ने माँ के हाथ में तस्वीरें देखी तो उसे सारी बात समझ मे आ गई।उसने फट से स्टूडियो वाले को फोन मिला सारी बात साफ कर दी कि वह कृत्रिम फोटोज थी।

अपने पापा को कहा आपकी पगड़ी का ख्याल है मुझे.. पर आपकी चिंता करना भी जायज है जमाना बहुत खराब है ।

पर पापा मैं कभी कुछ ऐसा नहीं करूंगी जिससे आपका सर् शर्म से झुक जाए...सिमरन के पापा की क्रोधी आंखों में आँसू बहने लगे।

सिमरन की बात सुनकर.. जैसे ही  वो थोड़ा नीचे की ओर झुके (माफी के लिए) तो सिमरन ने आपने पापा की गिरती हुई  पगड़ी को संभाल लिया और बड़ी शान से अपने पापा के सर् पर वापिस सजा दी ..। सब के चेहरे खुशी से खिल उठे....
वास्तव में दोस्तो *बेटी हो तो ऐसी* जो *बाबुल की पगड़ी* का पूरा ख्याल रखे।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा

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