आक्रन्ति ???
*अजन्मी बेटी*
मैं कोई अपराधी हूँ क्या माँ
ज़रा मुझे एक बात समझा।
सज़ा-ए-मौत की हकदार..
मैं हुई कैसे ? ज़रा ये तो बता.
*मां*
ना बेटी, ना ही अपराधी है तु
और ना ही सजा की हकदार
तेरे दादा जी ही का हुक्म है..
बेटी नहीं बेटा हो अबकी बार।।
*अजन्मी बेटी*
गलती क्या है..?फिर मेरी
क्यूँ कोख में रही है मार..?
क्यों तेरे लिए हुक्मदार बना
ये नीच सोच का सरदार*
*=दादा जी
*मां*
चुप रह कैसे जुबान चलाती है
ये नीच सोच के नहीं ये बड़े है।
जो बड़े कहेंगे वो ही हम करेंगे
खानदान के कायदे थोड़े कड़े है।।
*अजन्मी बेटी*
कायदे के पीछे क़ातिल बनेगी?
क्यों तुम पे नीच सोच भारी है..
किस काम के वो तुगलकी कायदे
जिनसे पैदा हुई **ये बीमारी है ।।
** भ्रूण हत्या।
*मां*
बस कर बेटी अब मत रूला
मैं जीवनदाती, नहीं जीवनन्ति
मैं भूल गयी थी कर्तव्य मेरा..
रखूंगी मैं तेरा नाम आक्रन्ति
*अजन्मी बेटी*
मां समझ गयी तु मेरी बात
शुक्र गुजार तेरी रहूंगी...।
दुनियां देखती रह जायेगी
इक ऐसी उड़ान भरूंगी।।
*मां*
बेटा सोच बदल दी तूने मेरी..
मैं जन-जन को जा बताउंगी
मां जीवनदाती है जीवनन्ति नहीं
मैं सब जन को समझाऊंगी।
लेखक : सुखचैन मेहरा # 9460914014

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