Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on November 20, 2018 with No comments
शरारतें
कुछ शरारतें है मन मे, कुछ आशाएं भी पाली है।
उतरी हुईं है जहन में, एक अवसर की ताक में हूँ।
मन विचलित हो उठा है तेरी शरारती नजरें देख
मिलने को करता मन, हां उस पल की ताक में हूँ।
कभी कभी डर भी लगता है, ये मेरा बहम ही न हो
वो कभी आकर मिलेंगे, इसी आशा की ताक में हूँ।।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014

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