Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on November 25, 2018 with No comments
संघर्ष
मेरा तो सारा जीवन
संघर्षों से भरा पड़ा है
जब छोटा था तो
स्कूल जाता लेकिन
लिखने के लिए
पेंसिल नहीं थी
पेंसिल के लिए संघर्ष
छीना झपटी में
माथे पर घाव भी सहे
घर आता तो बीमार माँ
को संभालने की जिम्मेदारी
भगवान के आगे हाथ जोड़े
शायद भगवान तक
पहुंची नहीं मेरी बात
मैने तो थे तरले तोड़े।
बचपन में मेरी जिम्मेदारियां बड़ी
मैं था छोटा।
गरीबी में भी संघर्ष जारी था
नहीं रुका।
बड़ा हुआ तो
अपने ही हक के लिए
संघर्ष किया।
साहूकारों ने था, हमारी भूमि पर..
कब्जा किया।
और आज तो
संघर्ष करने की
आदत सी पड़ गई है
जिंदगी एक संघर्ष है ये
खुद जिंदगी भी समझ गई है।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014

0 comments:
Post a Comment