November 06, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
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कुसुम: भाग दूसरा

आज वो दिन आ ही गया था जब मैं अपने लक्ष्य में कामयाब हो गया और आज कुसुम के घर को विदा करना था...

मैं कुसुम को बताए बिना ही चला गया...
(पहले भाग से निरंतर.........)

इसके बाद तो वो बिल्कुल गुम सुम सी रहने लगी लेकिन मैं अपने काम मे व्यस्त हो गया।

वो फिर पहले की जैसी हरकतें करने लगी लेकिन घर वालों ने उसकी नॉटंकी समझ कर मुझे कोई सूचना नहीं दी।

फिर कई बार मैंने कुसुम की माँ से भी पूछा तो उन्होंने सत्य को छुपाया कहते रहे 'कुसुम बिल्कुल ठीक है...'

काफी समय बाद मेरे पास कुसुम की माँ का फोन आया कि 'कुसुम की हालत बहुत खराब हो गयी है।'
मैंने उन्हें एक दो रुक बाद आने का बोला। तब तक मेरी लिखी हुई टेबलेट्स देते रहने को कहा।

लेकिन मैं लगभग एक सप्ताह बाद वहां गया । जिस हालत में उसे छोड़कर गया था उससे कहीं ज्यादा हालत खराब थी

अब तो उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि वह सचमुच पागल है। बाल बिल्कुल बिखरे हुए और..और कोई उसके पास भी नहीं जा रहा था।

मैंने उसके पास जाने की कौशिश की तो उसने पास पड़ी एक बोतल उठा ली मुझे पर फेंकने की धमकी देने लगी....

मैं लगातार उसके नजदीक जा रहा था...आखिर में उसने मेरी तरफ बोतल फेंक ही दी लेकिन गनीमत रही कि वो मेरे नीचे बैठ जाने से सर को छूती हुई निकल गयी और दीवार से टकराकर चूर हो गयी...

अरे! कुसुम मैं डॉक्टर....

कौनसा डॉक्टर...तू डॉक्टर है मुझे तो मरीज़ लग रहा है?

मरीज???(मन में)

मरीज हो ना तुम..?

हां मैं ....मरीज हूँ.. उसे अपने सीने लगाते हुए कहा....

तब जाकर शांत हुई वो..

धीरे धीरे कुसुम मुझे पहचानने लगी जब भी दूर जाता वो रो पड़ती।

लेकिन घर के बाकी सभी सदस्यों के साथ उसका पहले जैसा ही व्यवहार करती।

एक दिन मैंने उससे पूछ ही लिया कि तुम मुझे घर क्यो नही जाने देती...

कहने लगी 'मुझे पता नहीं...'

(कुसुम का मेरे साथ खुश रहना और अपनी माँ व अन्य से अलग व्यवहार करना कुछ समझ नही आ रहा था..)

वो कहीं ना कहीं मानसिक बीमारी की शिकार जरूर थी..

और रिपोर्ट आई कि इस बीमारी मे सुधार आना तो मुश्किल है लेकिन इसे यही जरूर रोका जा सकता है। क्योंकि बीमारी का समय रहते इलाज नही करवाया यदि उसकी माँ जब में उनसे मिला था तभी बता देते तो शायद सुधार होने की सम्भावना थी। अब कुछ नहीं हो सकता था।

कुसुम की माँ काफी समय से हमारी हर प्रतिक्रिया पर ध्यान रखे हुई थी...

उन्होंने बिना देर किए... मेरे माता पिता से मेरी और कुसुम की शादी की बात कर ली। सब सच सच बता दिया कुछ भी नही  छुपाया यहां तक कि लोग उसे क्या क्या कहते है बता दिया।

लेकिन मेरे माँ बाप को ये रिश्ता पसन्द नहीं आया, क्योंकि कुसुम अपने से कोई भी काम नहीं कर सकती थी...

मना करने पर कुसुम की माँ ने भी मुझे गुस्से में रोज आना जाना करने के लिए कह दिया मतलब अब वो मुझे रात को अपने घर रुकने नहीं देना चाहती थी।

कुसुम के घर जब मैं जाता, तब भी वो रोती और वहाँ से वापिस घर आता तब भी।

रोज रोज ऐसा होना मेरे लिए असहनीय था। अब मुझ नहीं रहा जा रहा था...।मैंने किसी न किसी तरह अपने माँ बाप को मना लिया।

हमारी शादी हो गयी। हमने अपने घर पर एक काम वाली बाई जी रख ली जो मेरी अनुपस्थिति में कुसुम का खूब अच्छे से ध्यान रखती।  मेरे घर आ जाने पर ही बाई जी अपने घर जाती।

कुसुम पागल थी तो दुनियां की नजरों में मेरी तो वो जिंदगी थी और हमेशा रहेगी..। लोग कहते थे अब तो ये सारी उम्र कुँवारी ही रहेगी कौन करेगा इस पगली से शादी..??? लेकिन मुझे पता नहीं ऐसा क्यूँ लग रहा था कि वो एक दिन जरूर ठीक हो जाएगी। ऐसा हो भी गया लेकिन खुदा को कुछ और ही मंजूर था। वो ठीक हो कर भी फिर से उसी बीमारी से गंभीर ग्रस्त हो गई ।

आज कुसुम जैसी भी है मेरी जिंदगी है और हम दोनों खुश भी हैं। एक नन्हा सी/सा महमान भी आने वाला/वाली है।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


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