November 09, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
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भैया दूज व बालक तृष्णा

एक नन्हा बालक
हठ कर बैठा।
भैया दूज की
कहानी सुनकर।
माँ दीदी के हाथ का
खाना खाऊंगा।
खाना खा कर
धनवान बन जाऊंगा।
माँ कहां से लाती
उसकी बहन को,
बहन है ही नहीं थी
कैसे शांत करती
उसकी तृष्णा गहन को।
बालक हठ से कौन..
जीत पाया भला।
लिया है एक
लड़की को बुला।
बोला ये बहन नहीं
ये तो है रुबा।(लड़की का नाम)
फिर माँ ने एक ऒर
जुगत लडाई।
कपड़े की एक
गुड़िया बनाई।
उसके हाथ से है
खीर बनवाई।
हां अब जाकर
तृष्णा शांत हो पाई।
वो बालक कोई ऒर नहीं
मैं खुद 'सुखचैन' था भाई..

स्वरचित
सुखचैन मेहरा #9460914014


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