Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on April 12, 2020 with No comments | Categories: कविताएं
मेरा गांव
सूरज की आभा महान
रोज सो कर उठता इंसान
चिड़िया चहके उन्मुख गगन
मनोहारी होती जहां की सांझ
मुझे याद आया मेरा गांव ।
जहा मिलती थी ठंडी छांव
पनिहारिन की मोहनी मुस्कान
खिलते हुए खेत खलिहान
मुझे याद आया मेरा गांव
वो चंपू अंकल की दुकान
चुरा लाते थे चुपके से समान
स्वच्छ हवा, स्वच्छ आसमान
मुझे याद आया मेरा गांव।
खुली सड़के, खुले मैदान
जिंदगी जीते है लोग जहां
गौ है माता जहां की
पत्थर भी है पूजनीय वहां
मुझे याद आया मेरा गांव।
अनुभव है चौपालों की शान
सलाम करता हर इंसान
आदर, सत्य, और संस्कार
कूट कूटकर भरे है जहां
मुझे याद आया मेरा गांव।
हर गरीब अमीर के चेहरे पर मुस्कान
असंतोष नही पल भर का जहां
खुश रहते है परिवार में रहकर
है नहीं जहा दुख का नाम
मुझे याद आया मेरा गांव।
स्वरचित
-:-सुखचैन मेहरा-:-

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