Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on October 18, 2018 with No comments
'स्व' देसी
केश बिखरे है
नूर चेहरे पर नही
कुछ कालिख भी
लगी हुई है।
ये सब देख
एक सैनिक ने पूछा
है 'भारत माता' तेरी
ये हालत
कैसे हुई है??
हम करते है रक्षा तेरी, फिर भी
बताओ किसी
तत्व बाहरी ने की है ?
किस की हिम्मत
जो मुझे छिन्न करे
माता क्रोधावेश में आयी।
बस कोई 'स्व' देसी ही
है जिनसे मैंने
ये चोटें खायी।
वो कैसे??
सरकार चुनकर जनता रोए,
आँखो में आँसू मेरे लाये।
मैं मुश्लिम, तू हिन्दू
की भावना मुझे अन्दर से
कुरेदती जाये।
जख्म करे मेरे हृदय में
जब बेटा माँ को वृद्धाश्रम
छोड़कर आये।
ऐसी हालत ना हो मेरी
गर कोई 'स्व' देसी
मुझे यूँ न चोट पहुँचाये।
-:-स्वरचित-:-
सुखचैन मेहरा

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