Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on October 25, 2018 with No comments
ये है आज की 'कृत्रिम खुशी'
लम्हें बीत जाने का डर है बस।
सब मिलकर एक स्वचित्र लें,
रह जाएंगी ये चार यादे बस।।
आज का जमाना अन्तरजाल का
मन की भावनाएं हो रही है अस्त।
मिलकर रहना, सपना हुआ अब
सब है घर अपने-अपने में मस्त।।
कृत्रिम खुशियों के सहारे कब तक
जीवन व्यतीत करते रहेंगे हम सब।
असल खुशी में शरीक होते रहेंगे,
हमें मौका मिलेगा हजूर जब जब।।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा

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