October 14, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on October 14, 2018 with No comments

वो पागल थी तो दुनियां की नजरों में मेरी तो वो जिंदगी थी..। लोग कहते थे अब तो ये सारी उम्र कुँवारी ही रहेगी कौन करेगा इस पगली से शादी..??? लेकिन मुझे पता नहीं ऐसा क्यूँ लग रहा था कि वो एक दिन जरूर ठीक हो जाएगी। ऐसा हो भी गया लेकिन खुदा को कुछ और ही मंजूर था।

(चलो पढ़ते है एक पागल लड़की 'कुसुम' की प्रेम कहानी...)

कुसुम की मानसिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण उनके माँ-बाप ने कुसुम के लिए डॉक्टर का इंतजाम किया। कुछ ही दिनों में कुसुम की पगलाई हरकतों से तंग आकर वह इलाज पुरा किये बगैर चला गया । इस तरह उन्होंने कई डॉक्टरों का इंतजाम किया लेकिन सभी ने इलाज बीच में ही छोड़ दिया।

फिर एक दिन मेरे पास फोन आया। मैंने उन्हें कल उनके घर आने को कहा।

दूसरे दिन जब उनके घर गया तो मेरा स्वागत पानी की बाल्टी से हुआ। मेरे सारे कपड़े भीग गए वो मुझे देख ताली मारकर हँसने लगी।

जब मैंने उसे देखा उसे देखकर हैरान हो गया ( क्योंकि यह वही लड़की थी जो एक बार मेरे साइकिल की हवा निकालकर भाग गई थी और मैं उस दिन रात को नो बजे पहुँचा था। माँ के पूछने पर मैंने बताया 'माँ, एक पागल सी लड़की ने मेरी साइकिल की हवा निकाल दी थी । मुझे क्या पता था कि वो सच में पागल थी । )

'आओ बेटा अंदर आओ' की आवाज ने मुझे अपने से बाहर निकाला।

हां मांजी...मैंने अपने कपड़ों को झड़काते हुए कहा।

'बुरा मत मानना बेटा, तूने इसी का ईलाज करना है..' उस लड़की की माँ ने क्षमा भाव से कहा।

'नहीं, मांजी आप चिंता न करें बहुत जल्द ठीक कर दूंगा ..' मैंने एक गहरी सांस लेते हुए कहा.

मैंने कपड़े चेंज किये और थोड़ा बाहर आ गया, देखा कि सिर्फ मेरी कार के अलावा वहां खड़े सारे वाहनों की हवा निकली हुई थी।

मैंने पीछे खड़ी माँ की ओर देखा तो वो बोली 'बेटा..मौका पाते ही वाहनों की हवा निकाल देती है..'

इतने में शीईईईईईईईईईईईईए  की आवाज मेरे कानों में पड़ी देखा तो सामने खड़ी बहुत खुश हो रही थी....

'नाम क्या है माँ इसका......?.' (मेरे मुँह से अनायास ही माँ शब्द निकल गया क्योंकि माँ से मिले पुरा एक साल हो गया था जब से डॉक्टर बना हूँ बस एक बार ही मिल पाया माँ से तो)

'अ... ब....मैं आपको...माँ कहकर पुकार सकता हूँ न...?' मैंने सकूँचाते हुए बोला।

हा, बेटा क्यूँ नहीं.... बेटा 'कुसुम' है उसका नाम....

मैंने कहा...' कुसुम इधर आओ..'

नहीं.. नहीं..तुम मुझे मारो गे ना.. मुझे सब मारते है...वो बच्चों की तरह बोल रही थी...

अरे बाबा नहीं मारूंगा...चल अपने दूसरे वाहनों की हवा निकलते है...

उसकी माँ हैरानी से मुझे देखने लगी ...

मैंने इशारा कर कह दिया कि कोई चिंता की बात नहीं...

फिर हम दोनों नॉन पार्किंग जॉन में चले गए.. जहाँ उसने वहां खड़े दूसरे वाहनों की हवा निकाल दी...लोग इसे पागल न समझे इस लिए मैंने इसे इशारे से चुप करा दिया। वह थोड़ी देर चुप रही फिर वैसे ही कूदने लगी..

लोग गुस्सा हो कर उसकी ओर आ रहे थे(उनके वाहनों की हवा जो निकाल दी थी) मैंने उन्हें समझाते हुए कहा कि ' इसे कुछ मत कहना ये अपने नये डी. एस. पी. साहब की बेटी है...'

सब उल्टे पैर लौट गए...

वो कूदती बहुत थी बस एक यही बात मुझे भी नहीं अच्छी लगती थी. पर क्या करता सहना मज़बूरी थी...

हम घर लौट आये...लेकिन मैं अपने घर नहीं जा सकता था हवा जो निकाल दी थी...ओर जल्दी-जल्दी मैं किसी मैकेनिक को भी नहीं बुला पाया...


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