Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on October 17, 2018 with No comments
रूठना
तेरी हर एक अदा
हम है फिदा प्रिये ।
तू ही मेरी हर खुशी
तू ही है खुदा प्रिये।।
कभी मत रूठना
तू ही सहारा प्रिये
डूबती मझधार में
तु ही किनारा प्रिये।।
रूठे को मनाना
नहीं आता प्रिये।
जब रुठ जाते हो
कुछ नही सुहाता प्रिये।।
जवाब
नहीं कभी ना रूठूँ
तेरा साया बन रहूँ
मेरे हमसफर सदा
तुझे रजामंद रहूँ।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा

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