September 14, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on September 14, 2018 with No comments

हार्ड डिस्क भाग-2 के बाद की कहानी...

दिशा का भूत

आज वही काली रात थी जिस रात मधु ने दिशा का न चाहते हुए भी कत्ल कर दिया था।
मैं मधु को अपने बेड पर न पाकर परेशान हो गया और ढूंढने लगा इधर उधर लेकिन कहीं नहीं मिली। मैं पसीने से लथपथ बुरी तरह से घबरा गया। क्योंकि मधु आज सुबह से ही अजीब सी बातें कर रही थी जैसे- आज मैं दूर चली जाऊँगी...आज मैं दूर चली जाऊंगी।
सोचा था नहीं सोऊंगा आज लेकिन आंख लग ही गयी।
अब कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ?? कहाँ ढूंढू उसे ।
इतने में मधु की आवाज आई, 'यहाँ क्या कर रहे हो आधी रात के?'
एक दम से समझ नहीं आया कि मधु ने बोल क्या दिया। मैं स्तब्ध था कि ये कहाँ से आ गयी मैं तो इसे हर जगह ढूंढ आया था। मधु ने मुझे झझकोरते हुए मुझे अपनी गहरी सोच बाहर निकाला।

हाँ....हां...कुछ नई वो... ऐसे ही।

मधु थोड़ा अजीब सी लग रही। बातें भी अजीब ही कर रही थी।

चलो अंदर चलते है....मधु की आवाज जैसे मुझे डरा रही थी।

मैंने कहा चलो आप मैं आता हूँ...वो चली गयी।

मैं ऊपर छत पर चला गया। आगे जाकर देखा बैठक की लाइट जल रही थी। मैं मधु को यहाँ देखकर अचम्भित हो गया। मधु तो यहां सो रही है तो वो कौन थी।

मैंने मधु को जल्दी से जगाया....

क्या है.....सोने दो मुझे ....मुझे जाना है।

कहां जाना है आपको?? मैंने मधु को झझकोरते हुए कहा।

वो होश में आयी तो अपने आपको छत पर पा कर अचंभित हो गयी। कहने लगी मैं यहां कैसे आयी ??

मैं मधु को नीचे आने को कहा लेकिन वो ही नहीं है थी। थोड़ी देर बाद मधु आ ही गयी नीचे। मेरे जिद्द करने पर।

मैं झट से नीचे उतरा और उसको ढूंढने लगा जो मधु के रूप में नीचे थी। लेकिन वो कहीं नहीं दिखी।

मधु और मैं अपने रूम में आकर सो गये।आंख लगी गिलास गिरने की आवाज से जागा।

मेरी मां हाथ में तकिया देख हैरान हो गया । वो मधु की और बढ़ रही थी मेरे से बिना डरे। मैंने कहा मां आप ये कर रही है । मां कुछ नहीं बोली । लैंप की धीमी लो को तेज किया तो मुझे ऐसा लगा की मां नहीं दिशा है।

मैंने कहा,- दिशा तुंम??

हां मैं, मां में प्रवेशित दिशा ने कहा। तेरी मां ने रास्ते में कहा था 'आजा' तो मैं इसके पीछे-पीछे आ गयी।

तुं अब क्या चाहती है????

तुंम दोनों की मौततत.... । दिशा ने गुर्राती नजरों से हम दोनों की ओर देखते हुए कहा।

मेरी गलती है तो मुझे कुछ कहो कुछ प्लीज इसे कुछ मत कहो...

नहीं....नहीं...नच्च्च्च्च्च कभी नहीं ??भगवान भी नहीं तुंम दिनों कोooo.

मैंने रिश्तेदारों को फ़ोन लगाने के लिए जैसे ही खड़ा हुआ उसने सारी लाइटें बन्द कर दी अंधेरा ही अंधेरा हो गया कमरे में ।

चालाकी करेगा तुं ???? हैं हहहहहहह चालाकी करेगा tunnnnnnnnnnnnn हहहहहहह हैं.. कर चालाकी क़ीक़ीक़ीक़ीक़ गला रोंद के रखखख... दूंगी कहते हुए मेरे गले छाती आ बैठी..।

(मधु मुझे छुड़ाने की बार-बार नाकाम कोशिश कर रही थी...)

मेरी सांसे बंद हो रही थी सांस तक नहीं आ रहा था

वास्तव मैं अभी कुछ नहीं कर पा रहा था मैंने थोड़ा ओर आगे होते हुए दराज खोल दी। दराज खुलते ही वो बुरी तरह चिल्लाने लगी।

बंद कर इसेaaaaaa..मैं कहती हूँ बंद कर रररर दे।

पता नहीं ऐसा क्या था उसमें ।

एक दम मां को होश आया और कहने लगी क्या हुआ बेटा आप दोनों घबराए हुए क्यों हो? और मैं आपके कमरे में कैसे आयी....

नहीं मांअअ.. कुछ नहीं.. कुछ नहीं...मैंने सहज होने की कोशिश करते हुऐ कहा ।

मां अपने कमरे में चली गयी ।

अब जाकर मधु और मैंने चैन की सांस ली।

मेरी गलती की सजा आप सबको मिल रही -(मधु ने आंखे नम करते हुए मेरे कंधे पर खिल)

'अरे, नहीं दोनों एक साथ खुशी गम  सहें गे' मैंने भी उसके बालों में हाथ घूमाते हुए ।

सुबह होते ही हम दोनों एक बाबा जी के पास गए । रास्ते में मधु ने बताया कि ये वही रास्ता है जहां मेरे से  दिशा का कत्ल हो गया था। कोई और रास्ता नहीं है क्या??? मुझे तो बहुत डर लग रहा है।

मैं तो कहती हूं लौट चलते है घर वापिस- मधु ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.....

मेरे नहीं मानने पर मधु मेरा गला दबाने लगी। मैं कह रही हूँ लौट जा..जाजजज हूं

देखते ही देखते कभी दिशा तो कभी मधु का चेहरा दिखने लगा मुझे। मैंने गाड़ी रोक दी।

ओह! गॉड ये वही जगह थी जो मैंने उस हार्ड डिस्क में देखी थी। मैंने कुछ देर ओर यहां रखना मुनासिब नहीं समझा। मैं कार को आगे बढ़ाने लगा। मैंने जैसे कार में पड़ा हनुमान जी का लॉकेट हाथ लिया वैसे ही वो तिलमिलाकर चली गयी।

मधु को होश आने पर वो अपना सर पकड़कर बैठ गयी।  

आखिर में हम जैसे तैसे बाबा जी के पास पहुंच ही गये ।

(बाबा काफी देर हमसे पूछताछ करते रहे।)

अंत में उन्होंने वो दराज मैं देखना चाहूंगा जिसे बाहर निकालने पर वो वहां से जाने के लिए मजबूर हो गयी ।

जी जरूर....

वो हमारे साथ चल पड़े

बाबा ने आकर दराज देखना चाहा । लेकिन दिशा ने आकर उसे एक जोरदार  झटका दे मारा और गिरा दिया। जब बाबा ने दिशा पर वार करना चाहा तो उन्हें याद आया कि वो कुंठ (बाबा की आक्रमण करने की एक छोटी सी छड़ी) अपने भवन में ही छोड़ आये।

उन्होंने कहा आपके पास जो लॉकेट है वो मधु को दे जाओ और आप मेरा कुंठ जो मंदिर गृह में पड़ा है जल्दी करना मैं सिर्फ इससे 30 मिंट से ज्यादा नहीं टकरा सकता उसके बिन।

मधु लगातार उस दराज को खोलने का प्रयत्न कर रही थी । लेकिन दिशा उसे बार-बार दराज से दूर फेंकती रही।

बाबा ने वो लॉकेट मधु को दे दिया। लेकिन लॉकेट का दिशा पर कुछ असर नहीं हो रहा था सिवाय बाबा के मंत्रों के।(बाद में मधु के बताए अनुसार)

अब आधा घण्टा बीत चुका था । मैं अभी रास्ते में ही था । देर हो गयी मुझे पहुंचने में रास्ते में मुझे एक दबी सी आवाज  आई बचाओ...बचाओ.... ।लेकिन मुझे तो आगे देरी हो गयी थी तो मैं उस चीख को नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ गया।मैं घर पहुंचा।

बाबा लड़ते लड़ते बेहोशी की हालत में आ गए थे वो मुझे इशारा करके कुछ बताना चाह रहे थे लेकिन मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था

जब मैंने मधु को वहां न देखा तो दिमाग की टेंशन ओर बढ़ गयी।

मैंने हड़बड़ाहट में उस कुंठ को हाथ पर जोर से मार जिससे कि उस दिव्य कुंठ से एक तेज रोशनी निकली।

बाबा उस रोशनी को अपनी तरफ करने को कहा मैंने कर दिया तब जाकर बाबा को होश आया ।

बाबा बोला, 'वो तुम्हारी पत्नी को यहां से ले गयी है ....

इतना सुनते ही मेरे तो होश उड़ गए। मैंने बाबा जी को भी साथ चलने को कहा। लेकिन वो कहने लगे बेटा तुं अभी तुरन्त पहुँच जा नहीं तो बहुत देर हो जाएगी।उसने उस गली की इशारा कर दिया।

मैं अपनी कार लेकर उसी रास्ते की ओर चल पड़ा। रास्ते में मां का फ़ोन आया कि वो अभी 5-6 दिन ओर गांव से नहीं लौटेगी। ठीक है कह कर फ़ोन काट दिया।

रास्ते में मधु मिल गयी । मैंने उसे कार में बैठाकर घर की ओर चल पड़ा। मेरे फोन पर बार-बार रिंग आ रही थी । लेकिन मैंने नहीं उठाया क्योंकि मैं अभी घर पहुंचना चाहता था बस।

आखिर मैंने फोन उठा ही लिया वो किसी ऒर  का  नहीं  बल्कि उसी व्यक्ति का था जिसने मुझे वो हार्ड डिस्क दि थी।

वो कहने लगा जो तुम्हारे साथ है वो मधु नहीं है..और...। इतना सुनते ही मेरे हाथ से फोन गिर गया...

अब वो(दिशा) मुझे देख कर हंसने लगी.. हा ही  हीहीहीही.... मैंने मधु को तो मौत के घाट उतार दिया हाईई इईई हा हा हा.. अब तुझे भी इईई मरना होगा hihi.. हहाहहा हा...।

मैंने कहा मार दो मुझे भी अब मैं जिंदा रहकर क्या करूँगा..?? मार दो मुझए भी...मैं रोने लगा ।

इतनी आसानी से नहीं मारूंगी तुझेझेझे....वहीं लेजा कर मारूंगी जहां मैंने तुम्हारी प्यारी मधु को मारा है...

मैं बिना किसी विरोध के उसके साथ चल पड़ा......

हम गन्तव्य स्थान पर पहुंचे.. ये देख तेरी मधु.......उसने पेड़ के नीचे हाथ करते हुए कहा .... लेकिन वहां तो कोई नहीं था..। मैं समझ गया कि मधु जिंदा है मैं भी वहाँ दे भागने लगा लेकिन उसने मुझ पर अपने नुकीले नाखूनों से हमला कर दिया।

उसने मेरा गला जोर से दबा दिया.. मेरा सांस बन्द होने को थे..तुझे तो आज मैं मारकर ही छोडूंगी मैं.. एं....वो पता नहीं कैसे बच गई ईईई...

मैं बताता हूँ कैसे बची ये???

(दिशा ने एक दम से बाबा की ओर देखा)

जब दीपक(मैं) वो कुंठ लेकर मेरे पास पहुंचा तो मैंने उसे तेरी तरफ भेज दिया ताकि तेरा सारा ध्यान इस पर रहे और जिसे तुम मधु समझ रही थी वो मेरा ही एक छलावा था। मधु को मैंने तेरी आँखों में धूल झोंक यहीं इसी घर में रख लिया। ताकि हम दोनों उस दराज में क्या था वो देख सकें ।

(मधु भी वहां आ गयी )

दिशा ने अपने पूरे जोर से मेरा गला दबा दिया बस मेरे प्राण बस जाने को थे लेकिन मधु ने उस दराज से निकाला हुआ ताबीज उसके सामने कर दिया जो  कभी दिशा ने मुझे ये कह कर दिया था कि,"ये ताबीज़ मैं तेरे लिए लाई हूँ ये मुसीबत में तुम्हारा साथ देगा। कोई भी तुझे नुकसान पहुंचाना चाहेगा उसका पहले नाश हो जायेगा।

ओर हुया भी ऐसे  जैसे-जैसे मधु उस ताबीज़ को उसके नजदीक लाती गयी वैसे-वैसे वो चीखती चिल्लाती हुई मिट्टी में विलीन हो गयी इस लिए वो माता रानी का वरदान खुद के लिए ही श्राफ बन गया ।

आयो चलते है... मधु ने कहा

है भागवान, मेरा नाम ले लिया कर नहीं तो मां की तरह किसी ऒर भूत को पीछे लगा लेगी।

हम सब हंस पड़े।

इस तरह दिशा के भूत का अंत हो गया और मैं और मधु एक बार फिर पहले जैसा खुशी भरा जीवन जीने लगे।

लेखक: सुखचैन मेहरा  # 9460914014


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