Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on September 18, 2018 with No comments
आशीष
एक राही की तमन्ना
भूखे को रोटी खिलाऊँ
उसकी भूख मिटाकर
आशीष उससे पाऊँ।
लेकिन ढूंढ रहा है एक
साफ सुथरा भूखग्रस्त
साथ में कैमरा है हाथ में
सेल्फी लेने की चाह बस।
काफी निर्धन नजरअंदाज
हो गए है उनकी और देखते हुए।
पर साफ सुथरा भूखग्रस्त कहाँ मिले
राही ने आशीष भी जरूर लेनी है।
एक फोटो लेते हुए।
एक सामने आ ही गया
एक बालक, बाबू जी भूख लगी है।
कपड़े फ़टे है साफ भी नही।
नजरें अभी भी सुथरा ढूंढने में लगी है।
आँखो में देख निर्धनता के
उतरा भूत स्वार्थ पन का
मोबाईल जेब में रह गया।
और आशीष की अभिलाषा
भी नहीं रही।
-:-सुखचैन मेहरा-:-

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