Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on September 04, 2018 with No comments
मैं गुरु हूँ दीपक सा
मैं गुरु हूँ दीपक सा
चाहे खुद मैं जलता रहूँ।
पर जिंदगी की कठिनाइयों में
तुझे आंच तक न आने दूँ।।
मैं मानुस हूँ सुलझा सा
ना तुझे उलझाना चाहूं।
सब तेरे फायदा का होगा
चाहे तुझे डपटकर पढ़ाऊँ।।
कुछ ऐसा मत करना तुंम
कि लोग मुझे भी बुरा कहे।
कुछ ऐसा मत करना बेटा
सम्मान तेरा भी ना रहे।।
गुरु-दक्षिणा यही होगी मेरी
तेरी प्रसिद्धि का समाज धरूँ।
तुंम करना कुछ ऐसा बेटा कि
तुझे शिष्य बताकर मैंनाज करूं।।
मैं गुरु हूँ दीपक सा
चाहे खुद मैं जलता रहूँ ।
पर संघर्ष भरी जिंदगी में
तुझे आंच तक न आने दूँ।।
सुखचैन मेहरा # 9460914014

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